जर्मनी में कोरोना वायरस के मामलों में एक दिन में आया 60 फीसदी का उछाल | दुनिया | DW | 22.06.2020
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दुनिया

जर्मनी में कोरोना वायरस के मामलों में एक दिन में आया 60 फीसदी का उछाल

'आर-रेट' वह दर होती है जिससे कोई संक्रमित व्यक्ति दूसरों में संक्रमण फैलाता है. जर्मनी में दर्ज हुए कोरोना वायरस के इस नए उछाल के बाद काफी समय से 1 से नीचे चल रही आर रेट अचानक 2.88 पर पहुंच गई.

जर्मनी में कोरोना वायरस का आर-रेट यानि रिप्रोडक्शन रेट जिस 2.88 के आंकड़े को छू गया है वह उस दर से लगभग तीन गुना ज्यादा है जो महामारी पर काबू पाने के लिए होना चाहिए. विशेषज्ञ बताते हैं कि इसके एक से नीचे बने रहने पर ही धीरे धीरे बीमारी मिट सकती है. जर्मनी के रॉबर्ट कॉख इंस्टीट्यूट से रविवार को मिले आंकड़ों से पता चलता है कि संक्रमण के मामलों के चार दिनों के औसत को देखें तो वह भी 1.79 से उछल कर 2.88 पर आ गया है.

इंस्टीट्यूट ने जोर देकर कहा है कि इस उछाल का बड़ा कारण असल में एक खास इलाके में स्थानीय रूप से एक साथ सामने आए ढेर सारे मामले हैं. देश के सबसे घनी आबादी वाले राज्य नॉर्थ राइन वेस्टफेलिया के एक बड़े मीट प्रोसेसिंग प्लांट में हुए कोरोना संक्रमण के विस्फोट के कारण देश में कुल प्रभावितों की तादाद बढ़ गई. यहां स्थित ट्योनीज बूचड़खाने में काम करने वाले 1,300 से भी ज्यादा लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं.

मीट कंपनी का कोरोना-विस्फोट

ट्योनीज, जर्मनी की सबसे बड़ी मीट प्रोसेसिंग कंपनी है. सबसे पहले 17 जून को यहां कोरोना संक्रमण की शिकायतें सामने आई थीं. कंपनी के क्राइसिस टीम के प्रमुख ने बताया कि उसके बाद 14 दिनों के लिए फैक्ट्री को बंद कर दिया गया ताकि सभी कर्मियों को क्वारंटीन किया जा सके और उनकी कोरोना के लिए जांच हो सके.

जर्मनी के श्रम मंत्री हुबेर्टुस हाइल ने कहा है कि इतने बड़े स्तर पर हुए संक्रमण के लिए जिम्मेदार कंपनी को इसका हर्जाना भरना चाहिए. हाइल ने स्थानीय मीडिया ‘बिल्ड' से ऑनलाइन बातचीत में कहा, "कंपनी की कुछ तो सिविल लायबिलिटी होनी चाहिए." उनका कहना है कि कोरोना के नियमों का उल्लंघन कर कंपनी ने "पूरे इलाके को बंधक" बना लिया है. मंत्री ने कहा कि कंपनी ने न केवल अपने कर्मचारियों को खतरे में डाला बल्कि पूरे "सार्वजनिक स्वास्थ्य" को भी. कंपनी के मालिक क्लेमेंस ट्योनीज ने पहले तो कर्मचारियों की लापरवाही को इस हादसे के लिए जिम्मेदार ठहराया था लेकिन इस प्रतिक्रिया की काफी आलोचना होने के बाद उन्होंने इसके लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगी. हालांकि इसके लिए पद छोड़ने को वे तैयार नहीं हैं.

विदेशी कर्मचारी चपेट में

इस फैक्ट्री में काम करने वाले ज्यादातर कर्मचारी जर्मनी के पड़ोसी यूरोपीय देशों रोमेनिया और बुल्गेरिया से आते हैं. इनके कारण संक्रमण के और दूर दूर तक फैलने और नतीजतन बड़े स्तर पर फिर से लॉकडाउन की स्थिति बनने को लेकर स्थानीय प्रशासन चिंतित है. इन प्लांट में कुल 6,500 कर्मचारी हैं जो कंपनी के दिए आवासों में बहुत से दूसरे लोगों के साथ काफी मुश्किल हालात में रहते हैं. इतने पास पास रहने के कारण क्वारंटीन करना भी उनके बहुत काम नहीं आया. बाहर से आए कर्मचारियों के बारे में कंपनी ने दस्तावेज भी बहुत अच्छी तरह नहीं रखे थे, जिसके कारण जर्मन प्रशासन को इस मामले से निपटने में दिक्कतें पेश आईं. इलाके के स्कूल और डे केयर भी बंद कर दिए गए थे.

मीट की कीमतों को लेकर उठे बड़े सवाल

हाइल ने बिल्‍ड से बातचीत में इन विदेशी कर्मचारियों के बुरे हालात पर भी टिप्पणी की. उन्होंने कहा, "साफ लगा रहा है कि सेंट्रल और ईस्टर्न यूरोप के लोगों का यहां गलत फायदा उठाया गया. अब महामारी काल में उससे सार्वजनिक स्वास्थ्य पर बड़े खतरे पैदा हो गए हैं जिससे भारी नुकसान पहुंचा है. इसीलिए इस उद्योग में बड़े बदलाव लाने पड़ेंगे."

श्रम मंत्री हाइल के सहयोगी और एसपीडी पार्टी के एक बड़े नेता ने देश में मीट की कीमतें बढ़ाने की मांग की है. मीट इंडस्ट्री की इस बात को लेकर पिछले कुछ सालों से आलोचना हो रही है कि उसमें लागत ज्यादा होने के बावजूद बाजार में कीमतें बेहद कम रखी जाती हैं. इस स्थिति में कहीं ना कहीं मुनाफा कमाने के लिए कंपनियां कामगारों को सस्ते से सस्ते दामों में काम पर लगाकर उन्हें औसत से नीचे का जीवनस्तर अपनाने पर मजबूर करती हैं. जर्मनी में इसका नतीजा संक्रामक महामारी के दौर में बेहद ऊंचे संक्रमण दर के रूप में सामने आया है. 

आरपी/सीके (एएफपी, डीपीए)

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