आखरी वक्त में भारत के संशोधन के साथ पास हुआ ग्लासगो समझौता | दुनिया | DW | 14.11.2021

डीडब्ल्यू की नई वेबसाइट पर जाएं

dw.com बीटा पेज पर जाएं. कार्य प्रगति पर है. आपकी राय हमारी मदद कर सकती है.

  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages
विज्ञापन

दुनिया

आखरी वक्त में भारत के संशोधन के साथ पास हुआ ग्लासगो समझौता

दो हफ्ते तक चली गहन बातचीत के बाद ग्लासगो के जलवायु सम्मेलन में प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया गया. इस प्रस्ताव में भारत ने आखिरी वक्त में कुछ बदलाव भी करवाए.

ग्लासगो के जलवायु सम्मेलन में दो हफ्ते के विमर्श के बाद जो प्रस्ताव पास हुआ, उसमें भारत के इसरार पर आखरी वक्त में संशोधन हुआ. इस संशोधन के बाद जो भाषा प्रयोग हुई है उसमें कोयले पर नरमी बरती गई.

जब पैनल समझौते के प्रस्ताव को स्वीकार करने की तैयारी कर रहा था तब भारत ने एक संशोधन का प्रस्ताव किया. इसमें कोयले को धीरे-धीरे ‘खत्म' (फेज आउट) करने की जगह धीरे-धीरे ‘कम' (फेज डाउन) कर दिया गया.

अब जो प्रस्ताव पास हुआ, उसमें कहा गया, "ऐसी कोशिशों को बढ़ाना है जिससे कोयले से बिजली को धीरे-धीरे कम किया जाए और जीवाश्म ईंधनों को मिलने वाली अप्रभावी सब्सिडी को धीरे धीरे खत्म किया जाए.”

विदेश मंत्री ने समंदर में खड़े होकर दिया संदेश

इससे पहले ईरान, भारत और कुछ अन्य देशों ने कोयले और जीवाश्म ईंधन पर मिलने वाली सब्सिडी को खत्म करने की बात पर आपत्तियां जताई थीं. हालांकि भारत के प्रस्ताव पर कई प्रतिनिधियों ने निराशा भी जाहिर की. स्विट्जरलैंड और मेक्सिको के प्रतिनिधियों ने तो इस बदलाव को नियमों का उल्लंघन भी बताया क्योंकि यह बहुत देर से हुआ. पर बाद में सभी ने कहा कि इसे स्वीकार करने के अलावा उनके पास कोई रास्ता नहीं था.

यूरोपीय संघ के जलवायु प्रमुख ने कहा, "हम अच्छे से जानते हैं कि कोयले का कोई भविष्य नहीं है. लेकिन आज के ऐतिहासिक फैसले को इसकी वजह से रोका नहीं जाना चाहिए.”

समझौते में और क्या है?

ग्लासगो में जो समझौता पारित हुआ है उसमें प्रदूषक देशों को उत्सर्जन कम करने के लिए 2022 के आखिर तक एक ज्यादा सख्त प्रण लेना होगा. प्रस्ताव में अमीर देशों से अपील की गई है कि वे "विकासशील और गरीब देशों के लिए कम से कम दोगुना धन उपलब्ध कराएं.”

विकासशील देशों की मांग थी कि कार्बन उत्सर्जन कम करने के कारण उनका जो नुकसान होगा उसकी भरपाई के लिए वित्तीय मदद उपलब्ध करायी जाए. लेकिन प्रस्ताव में इस बारे में स्पष्टतौर पर उपलब्ध कराई जाने वाली सुविधाओं की कोई बात नहीं की गई है. जी77 देशों की ओर से बोलते हुए गिनी ने कहा ये देश इस शर्त पर समझौते को तैयार हैं. प्रस्ताव में कार्बन ट्रेडिंग का रास्ता साफ कर दिया गया है.

कैसी रही प्रतिक्रिया?

सम्मेलन के अध्यक्ष आलोक शर्मा ने कहा कि यह समझौता "कोयला, कार कैश और पेड़ों पर एक प्रगति है और हमारे ग्रह व उसके लोगों के लिए कुछ अर्थपूर्ण है.” भारत के प्रस्ताव पर शर्मा ने निराशा जाहिर की लेकिन उन्होंने कहा कि पूरे समझौते की सुरक्षा भी जरूरी थी.

संयुक्त राष्ट्र महासचिव अंटोनियो गुटेरेश ने एक बयान जारी कर कहा, "हमारा नाजुक ग्रह एक धागे से लटका हुआ है. हम अब भी जलवायु प्रलय के मुहाने पर हैं.”

बहुत से पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने प्रस्ताव को नाकाफी बताया है. ऑक्सफैम की अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी निदेशक गाब्रिएला बूशर ने कहा, "यह दर्दनाक है कि कूटनीतिक कोशिशें एक बार फिर संकट के आकार के बराबर पहुंच पाने में नाकाम रहीं.”

वीके/एमजे (रॉयटर्स, एएफपी, डीपीए)

DW.COM

संबंधित सामग्री