20 साल बादः फुस्स पटाखा साबित हुआ क्लोनिंग! | विज्ञान | DW | 05.07.2016
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

विज्ञान

20 साल बादः फुस्स पटाखा साबित हुआ क्लोनिंग!

क्लोनिंग को 20 साल हो गए हैं. 5 जुलाई 1996 में आज ही के दिन डॉली जन्मी थी. लेकिन क्लोनिंग खत्म हो गई. अब क्लोनिंग को बंद अध्याय समझा जा सकता है.

ठीक 20 साल पहले आज ही के दिन दुनिया में तहलका मच गया था. क्लोनिंग से एक भेड़ का जन्म हुआ था. डॉली नाम की इस भेड़ के साथ एक उम्मीद भी जन्मी थी और एक डर भी. उम्मीद यह थी कि डीएनए पर इंसान की यह पकड़ भविष्य बदल देगी. चिकित्सा जगत में चमत्कार होंगे. सारी बीमारियों का इलाज हो जाएगा. और डर यह था कि इंसान अपना क्लोन भी बना लेगा. दोनों में से कुछ नहीं हुआ. ऐसा लगता है कि जिस क्लोनिंग को धमाकेदार बम समझा गया था वह फुस्स पटाखा साबित हुआ. मायामी यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट फॉर बायोएथिक्स ऐंड हेल्थ पॉलिसी के रोजारियो इसासी कहती हैं, “जितना हंगामा मचा था, क्लोनिंग वैसे नतीजे नहीं दे पाया है.”

विशेषज्ञों का मानना है कि बहुत सारी और तकनीकों ने क्लोनिंग को गैरजरूरी बना दिया. इसासी के शब्दों में, “वह पल तो यूरेका जैसा था. हमें लगा था कि आखरिकार हम इस बात को गहराई से समझ पाएंगे कि बीमारियों की पूरी प्रक्रिया क्या होती है. लगा था कि शायद नपुंसकता और बांझपन का इलाज खोजा जा सकेगा. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.”

कहा जा सकता है कि डॉली दुनिया की सबसे मशहूर भेड़ है. सोमैटिक सेल न्यूकलियर ट्रांसफर नाम की तकनीक की मदद से वह पहला ऐसा प्राणी थी जिसे क्लोनिंग के जरिये तैयार किया गया था. इस तकनीक में स्पर्म या एग के बजाय किसी और अंग का डीएनए लिया जाता है, जैसे कि त्वचा. इस डीएनए को एक ऐसे अनिषेचित अंडे में रोपा जाता है जिसमें से नाभिक निकाल लिया गया हो. डॉली के मामले में यह डीएनए स्तनों से लिया गया था.

इंसान की क्लोनिंग?

अब तक इंसान की क्लोनिंग का कोई ज्ञात मामला सामने नहीं आया है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानव क्लोनिंग को लेकर ना की आवाजें ही ज्यादा सुनाई देती रही हैं. नैतिक उलझनें तो थीं ही, मानवाधिकार संगठनों ने भी इसे लेकर कई गंभीर सवाल खड़े किये. जैसे कि इंसान की कार्बन कॉपी बनाने की सूरत में सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा. हालांकि जानवरों में भी क्लोनिंग बहुत ज्यादा सफल नहीं रही. उनमें से कुछ ही बच सके. और जो बचे, वे स्वस्थ नहीं रहे.

देखिए, कैसे काम आता है DNA

लेकिन कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि नैतिकता के नाम पर इस विचार की हत्या कर दी गई. वे कहते हैं कि इस तकनीक की संभावनाओं को नैतिकता की बहस ने इतना ज्यादा ढक लिया कि फायदेमंद तकनीकों पर बात हो ही नहीं पाई. लेकिन यह डर भी था कि कहीं वैज्ञानिक खुद को ईश्वर ही न समझने लगें. इसासी इस बात पर जोर देती हैं कि नैतिक कारणों से अगर सुरक्षित तरीके अपनाए जाएं तो फिर आप क्लोनिंग में वे नतीजे हासिल कर ही नहीं सकते जिनका दावा किया जाता है.

एक बंद अध्याय

जो भी हो, क्लोनिंग में निवेश घट रहा है. बेल्जियम, चीन, इस्राएल, जापान, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन और सिंगापुर जैसे कुछ ही देशों ने प्रयोग के तौर पर सिर्फ अंगों की क्लोनिंग की इजाजत दी. अमेरिका में भी इसे पूरी तरह अवैध करार नहीं दिया गया. लेकिन वैज्ञानिक अंगों की सफल क्लोनिंग में भी पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाए.

लेकिन क्लोनिंग ने कुछ ना किया हो, ऐसा भी नहीं है. वैज्ञानिक मानते हैं कि इस तकनीक ने कई दूसरी तकनीकों के जन्म को प्रेरित किया है. ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी के उएहिरो सेंटर फॉर प्रैक्टिकल एथिक्स के प्रमुख जूलियन सावुलेस्कू कहते हैं, “यह पूरी रिसर्च आईपीएस सेल रिसर्च की ओर चली गई है.” आईपीएस यानी स्टेम सेल एक तरह की क्लोनिंग ही है लेकिन उसमें अंग बनाने के लिए भ्रूण बनाने की जरूरत नहीं होती. जॉर्जिया टेक में बायोएथिसिस्ट ऐरॉन लेवाइन कहते हैं कि क्लोनिंग का असली प्रभाव तब नजर आएगा जब जानवरों के भीतर तैयार किए गए अंगों को इंसानी शरीर खारिज नहीं करेगा. लेकिन लेवाइन कहते हैं कि इंसान की क्लोनिंग तो अब एक बंद अध्याय ही समझिए. वह कहते हैं कि असल में इसकी इतनी मांग नहीं है और जितनी मांग है उतना तो दूसरी तकनीक भी कर सकती हैं.

वीके/आईबी (एएफपी)

DW.COM

संबंधित सामग्री