पर्यावरण को बचाने के लिए रचनात्मक तरीके से काम कर रहे दिव्यांग कार्यकर्ता | पर्यावरण | DW | 10.09.2021
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पर्यावरण

पर्यावरण को बचाने के लिए रचनात्मक तरीके से काम कर रहे दिव्यांग कार्यकर्ता

दिव्यांग लोग जलवायु परिवर्तन से होने वाले प्रभावों से विशेष रूप से प्रभावित हो सकते हैं. ऐसे में पर्यावरण को लेकर किए जा रहे कामों में उन्हें सबसे आगे क्यों नहीं होना चाहिए?

करीब दो दशक पहले सेसिल लेकोम्टे परमाणु विरोधी आंदोलन में शामिल हुई थीं. उस समय वह नेशनल क्लाइंबिंग चैंपियन थी. उन्होंने जल्द ही अपने खेल कौशल का इस्तेमाल, पर्यावरण को बचाने के लिए किए जा रहे ट्रीटॉप प्रदर्शन के लिए किया. हालांकि, पिछले तीन साल से वह पेड़ों पर चढ़ने के लिए काफी अलग तरीके से प्रयास कर रही हैं.

लेकोम्टे की जिंदगी अब पहले जैसी नहीं रही. वह जोड़ों के दर्द से परेशान रहती हैं. यह बहुत ही दर्दनाक बीमारी है और समय के साथ बढ़ती जाती है. वह कहती हैं, "निश्चित तौर पर, मैं इसकी वजह से दुनिया को थोड़े अलग तरीके से देखती हूं."

इन दिनों उन्हें दर्द की वजह से कम घूमना-फिरना चाहिए और अपनी जिंदगी को व्यवस्थित करना चाहिए. वह कहती हैं, "मेरे लिए योजना बनाकर जिंदगी जीना काफी मुश्किल काम है. कभी-कभी ऐसा होता है कि मैं सभी काम अच्छे तरीके से कर रही होती हूं. हालांकि, कभी-कभी मैं कुछ नहीं कर पाती. हर चीज के लिए मुझे मदद की जरूरत होती है."

नई तकनीक का इजाद

लेकोम्टे कहती हैं कि अब विरोध-प्रदर्शनों में हिस्सा लेने से पहले मुझे कई सवालों से जूझना पड़ता है. जैसे, मैं वहां कैसे जाउंगी? क्या वहां सीढ़ियां होंगी? हालांकि, बीमारी की वजह से लेकोम्टे की सक्रियता पर किसी तरह का असर नहीं पड़ा है. वह आज भी पहले की तरह ही पर्यावरण को बचाने के लिए किए जा रहे कामों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती हैं.

लेकोम्टे अपने जोड़ों पर ज्यादा भार नहीं दे सकती हैं, लेकिन जब ज्यादा दर्द न हो, तो वह पैरों को हिला सकती हैं. इसलिए, उन्होंने एक तकनीक विकसित की. अब वह एक चरखी की मदद से पेड़ों पर चढ़ती हैं. इसमें उन्हें ज्यादा जोर लगाने की जरूरत नहीं होती.

वीडियो देखें 26:04

देखिए पूरा एपिसोड: ईको इंडिया 147

वह कहती हैं, "मुझे वाकई में चढ़ाई के दौरान आने वाली चुनौती पसंद है और यह देखना कि मैं अभी भी क्या कर सकती हूं." कई लोगों को यह संदेह था कि वह चढ़ाई के दौरान आने वाली चुनौतियों को झेल नहीं पाएंगी, लेकिन लेकोम्टे ऐसा सोचने वाले सभी लोगों को गलत साबित करना चाहती थीं.

वह कहती हैं, "समाज किसी व्यक्ति के अंदर की क्षमता को नहीं देखता है. लोग सिर्फ ये कहते हैं कि आप अक्षम हैं और आप कुछ नहीं कर सकते." अब वह पर्यावरण के लिए काम करने वाले अन्य दिव्यांग कार्यकर्ताओं के साथ अपनी तकनीक को साझा करती हैं.

दिव्यांग आबादी पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव

लेकोम्टे कहती हैं कि आज अगर वह आगे बढ़ रही हैं, तो इसके पीछे उनके उस नेटवर्क का हाथ है जो उन्होंने बीमार होने से पहले बनाया था. इनमें ऐसे लोग शामिल हैं जो अपनी सक्रियता को समावेशी बनाने के लिए प्रतिबद्ध थे.

हालांकि, लेकोम्टे को कार्यकर्ताओं के कुछ समूह को छोड़ना पड़ा. वह कहती हैं, "उन्हें मेरी समस्याओं की कोई परवाह नहीं थी. वह यह भी नहीं सोचते थे कि समस्याएं कहां हो सकती हैं. वे लोग किसी दिव्यांग व्यक्ति की क्षमता को कम करके आंकते हैं और उन पर संदेह भी करते हैं."

यूनाइटेड किंगडम स्थित जॉन मॉरिस यूनिवर्सिटी में भूगोल विषय की विशेषज्ञ सशा कोसनिक भी दिव्यांग हैं. वह दिव्यांग लोगों के लिए जलवायु परिवर्तन के नतीजों पर शोध कर रही हैं. उन्हें उम्मीद है कि उनके काम से, पर्यावरण के लिए काम करने वाले दिव्यांग कार्यकर्ता भी खुद के साथ सामान्य व्यवहार करने की बात रख पाएंगे.

वह कहती हैं, "मेरा उद्देश्य न सिर्फ वैज्ञानिक अनुसंधान के जरिए इस खाई को पाटना है, बल्कि नीति निर्माताओं और कार्यकर्ताओं को यह भी समझाना है कि दिव्यांग आबादी पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को बेहतर ढंग से समझने के लिए आगे क्या किया जाना चाहिए."

जलवायु परिवर्तन की वजह से तेजी से बदल रहा मौसम बुजुर्गों और दिव्यांग लोगों के लिए विशेष रूप से खतरनाक हो सकता है. उनके लिए बचाव और राहत कार्य चलाना मुश्किल हो सकता है. साथ ही, ऐसे लोग चेतावनी प्रणालियों तक पहुंचने या उन्हें समझने में सक्षम नहीं हो सकते हैं.

जब इस साल जुलाई में पश्चिमी जर्मनी में भीषण बाढ़ आई थी, तो अरवाइलर के पास जिनत्सिग में दिव्यांग लोगों की देखभाल के लिए बनाए गए सुविधा केंद्र में 12 लोगों की मौत हो गई थी, क्योंकि उन्हें समय पर वहां से निकालकर सुरक्षित जगह पर नहीं पहुंचाया गया था. ऐसे कई उदाहरण हैं.

ह्यूमन राइट्स वॉच के अनुसार, जुलाई 2020 में, जापान के कुमा में एक नर्सिंग होम में बाढ़ के दौरान 14 लोगों की मौत हो गई थी क्योंकि उन्हें समय पर वहां से नहीं निकाला गया था.

‘कमजोरी' को बना रहे अपनी ताकत

लियोन म्युलर की उम्र करीब 30 साल है. वह जर्मनी के पश्चिमी राज्य नॉर्थ राइन-वेस्टफेलिया में रहते हैं. म्युलर ने एक जलवायु कार्यकर्ता समूह एंडे गेलैंडे की तरफ से आयोजित विरोध-प्रदर्शन में भाग लिया. यह समूह सविनय अवज्ञा के रास्ते पर चलता है.

इलेक्ट्रिक व्हीलचेयर और रेस्पिरेटर के साथ म्युलर पर्यावरण कार्यकर्ता के तौर पर काफी लोगों का ध्यान आकर्षित करते हैं, लेकिन वह ज्यादा चर्चा में नहीं आना चाहते.  

एंडे गेलैंडे ने अपनी सभाओं में व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए दो साल पहले सभी के साथ समान व्यवहार करने वाले और सबको साथ लेकर चलने वाले टास्क फोर्स का गठन किया था. हालांकि, म्युलर का कहना है कि वे जिन पुलिस का सामना करते हैं, उन्हें देखकर ऐसा नहीं लगता है कि वे दिव्यांग कार्यकर्ताओं से निपटने और उनके साथ सही तरीके से व्यवहार करने के लिए पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित हैं.

वीडियो देखें 04:04

जैविक कचरे से प्लास्टिक बनाया

वह कहते हैं, "मैंने कई बार ऐसा देखा है कि पुलिस दिव्यांग कार्यकर्ताओं से बात करने में काफी असहज महसूस करती है. वह उनके अलावा किसी और से बात करना पसंद करती है."

अक्सर, अधिकारी इन कार्यकर्ताओं से खुद बातचीत करने की जगह स्वास्थ्यकर्मियों (चिकित्सा सहायक) को भेज देते हैं. इसका नतीजा हमेशा बेहतर नहीं होता. मुलर कहते हैं, "एक बार स्वास्थ्यकर्मी मुझे व्हीलचेयर से उठा रहे थे, जबकि वे यह जान रहे थे कि मैं वेँटिलेटर पर हूं. उन्होंने सांस लेने में मदद करने वाले मेरे उपकरण को भी नुकसान पहुंचाया."

इस भारी व्हीलचेयर के फायदे भी हैं. घेराबंदी करने के लिए ये बेहतर साधन हैं. वह कहते हैं, "पुलिस इलेक्ट्रिक व्हीलचेयर नहीं ले जाती है. मुझे लगता है कि हम अपनी कथित कमजोरियों का इस्तेमाल अपने लाभ के लिए कर सकते हैं."

रचनात्मक तरीके इजाद करने की प्रेरणा

इन चुनौतियों ने अन्य दिव्यांग कार्यकर्ताओं को अपनी आवाज उठाने के लिए और अधिक रचनात्मक तरीकों को इजाद करने के लिए प्रेरित किया.

म्यूनिख के सैमुअल फ्लैच भी व्हीलचेयर का इस्तेमाल करते हैं. उनकी उम्र 29 साल है. वह लकवाग्रस्त है और कुछ समय से पर्यावरण को बचाने के लिए काम कर रहे हैं. विरोध-प्रदर्शन के दौरान, उन्हें पुलिस के सामने घेराबंदी करने के लिए आगे किया जाता है.

एक बार फ्लैच डानेनरोएडर फॉरेस्ट पहुंचे. यहां हेस्से में एक सड़क की चौड़ीकरण के लिए, पुराने जंगल के पेड़ काटे जाने थे. इन पेड़ों को बचाने के लिए पर्यावरण कार्यकर्ता यहां पहुंचे हुए थे. यहां उन्होंने कुछ अलग सोचा.

वह उन बातों को याद करते हुए कहते हैं, "मैं पेड़ पर नहीं चढ़ सकता था. मैं चल भी नहीं सकता था. ऐसे में मैंने सोचा कि मैं क्या कर सकता हूं?"

अपने दोस्तों के साथ मिलकर फ्लैच ने ‘द थिएटर ऑफ द ओप्रेस्ड' का इस्तेमाल करते हुए, क्लाइमेट जस्टिस के लिए थिएटर ग्रुप की स्थापना की. यह थिएटर ग्रुप राजनीतिक बदलाव को बढ़ावा देने के लिए, सत्ता की संरचना में बदलाव करने और उसे चुनौती देने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले इंटरैक्टिव थिएटर का एक रूप है.

फ्लैच ने डानेनरोएडर में हुए विरोध-प्रदर्शन के आधार पर ‘हाई इन द ट्रीज' नामक नाटक लिखा. इस साल अगस्त महीने में स्लोवेनिया में यूरोपीय थिएटर नेटवर्क रेजिलिएंट रिवोल्ट के साथ इसका प्रीमियर हुआ.

यह फ्लैच का तीसरा फेस्टिवल था. फ्लैच ने गौर किया कि पिछले कुछ सालों में दिव्यांग लोगों को साथ लेकर चलने की बात को लेकर सकारात्मक विकास दिख रहा है. उदाहरण के लिए, फेस्टिवल के मैदान में काफी ज्यादा व्हीलचेयर रैंप हैं. वह फेस्टिवल के आयोजकों से भी अपनी जरूरतों के बारे में पहले ही बात कर लेते हैं.

हालांकि, यह थिएटर ग्रुप का फेस्टिवल में पहला बड़ा प्रदर्शन था, लेकिन वह घबराए नहीं थे. वह कहते हैं, "मैं वहां बहुत से लोगों को जानता हूं और वे मुझे जानते हैं. अब मेरी व्हीलचेयर फोकस में नहीं है."

रिपोर्टः आंद्रिया शोने

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