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मेटावर्स में बच्चों के पीछे पड़े हैं पीडोफाइल

१४ मार्च २०२३

अगर जल्दी ही मेटावर्स में बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए कदम नहीं उठाए गए तो पीडोफाइल वहां उनको और आसानी से शिकार बनाते रहेंगे. कंपनियों से लेकर, कानून के जानकारों और माता-पिता को लेनी होगी जिम्मेदारी.

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मेटावर्स के वर्चुअल स्ट्रिप क्लबों में बच्चों से दुर्व्यवहार की शिकायतें
मेटावर्स के वर्चुअल स्ट्रिप क्लबों में बच्चों से दुर्व्यवहार की शिकायतेंतस्वीर: Artgrid/Omri Ohana

फेसबुक की वर्चुअल दुनिया मेटावर्स में बच्चों पर पीडोफाइलों की नजर गड़ी है. बच्चों का यौन शोषण करने के इरादे से इस आभासी दुनिया में ऐसे लोग आज भी किसी नकली पहचान के पीछे छुप पाते हैं. जो बच्चे अनजाने में या जानबूझ कर मेटावर्स में मौजूद वर्चुअल स्ट्रिप क्लबों में पहुंचते हैं उनके साथ कई बालिग लोग वर्चुअल सेक्स करते हैं. इसकी मिसाल शायद आप 'वीआर चैट' जैसे लोकप्रिय ऐप में देख भी चुके होंगे.

ऐसी घटनाओं के कारण मेटावर्स को कुछ जानकार 'पीडोफाइल-पैराडाइज' यानि बच्चों का यौन शोषण करने वालों की जन्नत बता चुके हैं. वीआर हेडसेट लगाने के बाद जब कोई उस वर्चुअल दुनिया में डूब जाता है तो वहां सब कुछ सच ही लगता है. आपका शरीर और दिमाग जो देख रहा होता है वही उस पल उसकी सच्चाई होती है. यानि एक ओर जो हरकतें कई बड़ों को बेहद रोमांचक अनुभव लगती हैं, वही दूसरी ओर बच्चों को गहरा सदमा भी लगा सकती हैं.        

कैसे खतरे हैं मेटावर्स में 

आईटी कन्सल्टिंग कंपनी काबुनी में मेटावर्स रिसर्च विभाग की निदेशक नीना जेन पटेल कहती हैं, "जब हम मेटावर्स में यौन उत्पीड़न की बात करते हैं तो ये समझना चाहिए कि हम पूरी तरह उसमें डूबे होते हैं. उस डिजिटल माहौल में पूरी तरह मौजूद होते हैं. वो वीडियोगेम जैसा नहीं रहा जिसे हम बस देखते हैं. जब मेटावर्स में आपसे कोई गलत यौन हरकत करवाता है तो उसका आपके दिमाग और शरीर पर गंभीर असर होता है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

रिसर्च दिखाती है कि चूंकि बच्चों का दिमाग अभी विकसित हो रहा होता है, वो हमेशा असल और वर्चुअल में फर्क नहीं कर पाता. पता चला है कि किसी वर्चुअल सेक्स दुर्व्यवहार का अनुभव बच्चों के दिमाग में एक दर्दनाक याद बन कर दर्ज हो जाता है. लेकिन बच्चे इस चंगुल में फंसते कैसे हैं?

कैसे होती है बच्चों की 'ग्रूमिंग'

वीआर और वीडियो गेमों की दुनिया इस समय बच्चों के लिए पूरी तरह सुरक्षित नहीं है. मेटावर्स में घुसने के पहले कोई आपकी उम्र चेक नहीं करता इसलिए बच्चे वहां तरह तरह के बड़ी उम्र के लोगों से आसानी से मिल पाते हैं. ज्यादातर वर्चुअल प्लेटफॉर्म्स में लोगों के अवतार दिखते हैं. ऐसे अवतारों के पीछे अपनी असली शक्ल छुपाने की सुविधा से पीडोफाइल्स को बहुत फायदा होता है. वीआर चैट रूम्स में बच्चों के साथ गलत हरकतें करने के इरादे से गए लोग इसका पूरा फायदा उठाते हैं.

मूवमेंट थेरेपिस्ट नीना जेन पटेल का कहना है, "ये समझना होगा कि आजकल जो सिस्टम है उसमें नई टेक्नॉलजी विकसित करने में बच्चों की जरूरतों को तवज्जो नहीं दी जाती है. यही कारण है कि हमारे बच्चों को नुकसान पहुंच रहा है, दरिंदे उनका शिकार और शोषण कर पा रहे हैं."

ऑनलाइन गेम में गंदी फोटो मांगना  

मेटावर्स के सबसे लोकप्रिय गेम्स में से एक रोबलॉक्स की मिसाल देखिए. इसमें सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग का ऐसा क्रॉसओवर मिश्रण है जिससे यूजर खुद अपने हिसाब से नये नये खेल खेल सकते हैं. रोजाना करीब 6 करोड़ लोग ऐसा कर रहे हैं. जिनमें से ज्यादातर 13 साल से कम उम्र के हैं.  रोब्लॉक्स अपने प्लेटफॉर्म पर कॉन्डोज कहलाने वाले सेक्स गेम्स को बढ़ावा नहीं देता. अमेरिकी संस्थान कॉमन सेंस मीडिया ने पाया कि "रोबलॉक्स पर कई छोटी उम्र के बच्चे नाचते हैं और सेक्शुअल हरकतें करते हैं. वे प्लेटफॉर्म से बाहर कहीं अपनी नंगी तस्वीरें भी भेजते हैं ताकि बालिग लोगों से ‘रोबक्स' पा सकें, जिन्हें असली पैसों में बदला जा सकता है." 

हाल के सालों में यौन उत्तेजना बढ़ाने वाली ऑनलाइन तस्वीरों और वीडियो की तादाद कई गुना बढ़ी है. ऐसा ही वीआर ऐप्स में हुआ है. इसमें भी सेक्स अब्यूज से जुड़ी करीब तीन चौथाई सामग्री खुद बच्चों की बनाई हुई है. केवल 2021 के दौरान ही इसमें 28 फीसदी बढ़ोत्तरी दर्ज हुई. इनमें से ज्यादातर में 10 से 13 साल के बीच की लड़कियां दिखती हैं. एक वैश्विक अध्ययन में पाया गया कि करीब 34 फीसदी बच्चों से कभी ना कभी ऑनलाइन कोई यौन हरकत करने की मांग की गई.   

प्लेटफॉर्म कितना गंभीर है बच्चों को बचाने में 

कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म बच्चों के लिए सुरक्षित बनाने ही होंगे. ऑनलाइन अब्यूजर्स को ब्लॉक करने और रिपोर्ट करने वाले फीचर जोड़ने होंगे. साथ ही अकाउंट बनाने की प्रक्रिया भी फूलप्रूफ बनानी होगी.  नीना जेन पटेल कहती हैं कि ऐसे तरीके और प्रोटोकॉल बनाए जाने चाहिए जिनसे किसी की ऑनलाइन पहचान पक्की की जा सके. यानि मेटावर्स में अगर कोई 50 साल का आदमी 15 साल का बनने की कोशिश करे तो उसे वहीं पकड़ा जा सके और आगे ना बढ़ने दिया जाए. इस पर मेटावर्स रिसर्चर पटेल कहती हैं, "ऐसा करना काफी आसान है और इसमें कोई बहुत बड़ी तकनीकी चुनौती भी नहीं है लेकिन शायद बाजार को देखकर अब तक ऐसा नहीं किया गया."

यूजर की पहचान को पूरी तरह से उजागर किये बिना उसकी उम्र की पुष्टि करना है चुनौती
यूजर की पहचान को पूरी तरह से उजागर किये बिना उसकी उम्र की पुष्टि करना है चुनौतीतस्वीर: Artgrid/Morten Lovechild

इस समय तो मेटावर्स में जिन कंपनियों का दबदबा है उनमें से ज्यादातर के दामन पर दाग लगे हैं. जैसे मेटा, जो फेसबुक और इंस्टाग्राम की मालिक है. हालांकि मेटा ने तो अपने क्वेस्ट वीआर हेडसेट में कुछ प्रोटेक्टिव फीचर्स जोड़े थे. जैसे माता पिता बच्चों की खरीद को कैंसिल कर सकते हैं, खास ऐप्स को ब्लॉक कर सकते हैं, स्क्रीनटाइम पर नजर रख सकते हैं और ये भी देख सकते हैं कि बच्चे ने किसे नया ऑनलाइन फ्रेंड बनाया है. फोर्टनाइट बनाने वाली कंपनी एपिक गेम्स, और लेगो ने मिलकर बच्चों की सुरक्षा के लिए दो अरब डॉलर लगाने का प्रण लिया है. लेकिन इसकी पूरी योजना का खुलासा अभी नहीं हुआ है.     

कई विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारों को इस बारे में सख्त कानून बनाने चाहिए. जैसे कि उम्र साबित करने वाली किसी आईडी का इस्तेमाल करने का आइडिया है. दूसरी तरफ से तर्क आता है कि अगर आईटी से वेरिफिकेशन होने लगा तो उन बच्चों की प्राइवेसी खतरे में पड़ जाएगी. ऐसे में मेटावर्स में बच्चों को सुरक्षित और आजाद माहौल देने में इसके इस्तेमाल के नियमों पर खास ध्यान देने की जरूरत है.    

और माता-पिता की जिम्मेदारी? 

बच्चों को वीआर सेट देकर नहीं छोड़ा जा सकता जैसे कई माता पिता टीवी या कंप्यूटर लगाकर छोड़ देते हैं. कच्ची उम्र में बच्चों को सावधानी से ही चीजें दिखानी होती हैं. आज जब बहुत सारे अभिभावकों को ही मेटावर्स के बारे में नहीं पता होगा तो वे अपने बच्चों को कैसे आगाह कर पाएंगे.

ऐसे में जरूरी हो जाता है कि माता-पिता खुद भी जानकारी बढ़ाएं, तकनीक के साथ प्रयोग करें और बच्चों से भी पूछें कि उन्हें मेटावर्स में क्या करना पसंद है. अगर किसी के टीनएज बच्चों को नये ऐप डाउनलोड करने की समझ है या हेडसेट में कोई वीआर ऐप्लिकेशन डाल सकते हैं तो अभिभावकों के लिए ये जानना जरूरी है कि वहां बच्चा किन लोगों के संपर्क में आ सकता है.

सपनों की दुनिया से लेकर दु:स्वप्न तक  

वीआर यानि वर्चुअल रिएलिटी के फायदों के बारे में तो आप सुनते ही आए हैं. पढ़ाई लिखाई, कुछ नया सीखने, नए लोगों से मिलने और एक नई दुनिया खोलने में इससे क्रांति आ रही है. लेकिन साथ ही बुरे और सदमा पहुंचाने वाले अनुभवों का रास्ता भी खुल रहा है. यहां बात सिर्फ एक और नई तकनीक या एक और नये गेम की नहीं है. असल में इसके साथ हम विकास के एक नये दौर में जा रहे हैं, जो दिखाता है कि भविष्य में हम इंसान आपस में कैसे जुड़े होंगे.

एक नई रिसर्च दिखाती है कि आज के बच्चे अपने पूरे जीवन के करीब 10 साल वर्चुअल रिएलिटी में बिताएंगे. यानि रोज के करीब पौने तीन घंटे. मेटावर्स जैसी वर्चुअल दुनिया बच्चों के लिए सुरक्षित बनाने का आजकल के इन शुरुआती सालों में ही सही मौका है.

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एडिटर, डीडब्ल्यू हिन्दी
ऋतिका पाण्डेय एडिटर, डॉयचे वेले हिन्दी. साप्ताहिक टीवी शो 'मंथन' की होस्ट.@RitikaPandey_