आरटीआई कानून की परवाह किसे है? | ब्लॉग | DW | 14.10.2019
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आरटीआई कानून की परवाह किसे है?

आरटीआई कानून अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है. कानून की 14वीं वर्षगांठ पर हुआ एक सर्वे बताता है कि सरकारें तो सरकारें, स्वायत्त समझे गए सूचना आयोग भी अपनी जिम्मेदारियों से कन्नी काटते दिखते हैं.

आरटीआई कानून की 14वीं वर्षगांठ के मौके पर देश भर में सरकारी और गैर-सरकारी आयोजन हुए. आरटीआई को मजबूत बनाने के वादे किए गए. कुछ बुनियादी चिंताओं और कठिन लड़ाइयों का जिक्र भी कई संगठनों और एक्टिविस्टों ने किया लेकिन सरकारों की ओर आरटीआई के बारे में गाल बजाने से ज्यादा हरकत नहीं देखी गई. 12 अक्टूबर को 14वीं वर्षगांठ के मौके पर ‘सतर्क नागरिक संगठन' और ‘सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज' नामक संस्थाओं की ओर से कराए गए सर्वे के आधार पर एक रिपोर्ट कार्ड तैयार किया गया है. ‘भारत में सूचना आयुक्तों के प्रदर्शन पर रिपोर्ट कार्ड' नाम के इस दस्तावेज में जनवरी 2018 से लेकर मार्च 2019 तक के आरटीआई के तहत आए मामलों का अध्ययन किया गया. पता चलता है कि सरकारी अधिकारियों पर कानून के उल्लंघन के आरोप में हजारों मामलों में कभी कोई पेनल्टी नहीं लगाई गई, उन्होंने अर्जियों को खारिज किया, वैधानिक सूचनाएं मांगी गईं लेकिन उन्हें अनदेखा किया गया. राज्यों के सूचना आयोगों और केंद्रीय सूचना आयोग में अपीलें की गईं तो 97 प्रतिशत मामलों में आयोगों ने कोई पेनल्टी लगाई ही नहीं.

सर्वे के मुताबिक जिन मामलों में ये अनदेखी हुई है वे जेनुइन और वैधानिक तौर पर सही मामले थे. तो इस तरह से आरटीआई कानून की मूल भावना से खिलवाड़ जमकर हुआ है. अधिकारियों को पता है कि कानून के उल्लंघन से कोई फर्क नहीं पड़ेगा, न सजा न पेनल्टी. आरटीआई कानून इस तरह से कमजोर किया जा चुका है. संस्थाओं ने अपने सर्वे में पाया कि 22 सूचना आयोगों ने पिछले एक साल की अवधि में एक लाख से ज्यादा मामले रफादफा किए हैं. सवा तीन करोड़ रुपये की पेनल्टी वाले 69 हजार मामलों में से सिर्फ दो हजार मामलों में पेनल्टी लगाई गई. तमिलनाडु, सिक्किम, मिजोरम और त्रिपुरा ने तो किसी भी मामले में पेनल्टी ली ही नहीं. अनुशासनात्मक कार्रवाई की संस्तुति का अधिकार भी आयोगों को है लेकिन सिर्फ दस राज्यों में इस अधिकार का इस्तेमाल हो पाया. सजा और पेनल्टी और अनुशासनात्मक कार्रवाई जैसे अधिकार तो ठंडे बस्ते में डाले ही रखे गए, इसके अलावा सरकारी कार्यालयों से कई अर्जियों पर जवाब नहीं भेजा गया या सवाल ही खारिज कर दिए गए. कुछ मामलों में जवाब दिया तो देर से और कुछ मामलों में दिया तो आधाअधूरा. ये सारी शिकायतें आयोगों के पास पहुंची और आयोगों में भी हालत कितनी दयनीय और चिंताजनक हो चुकी है, सर्वे में ये दिखा दिया गया है.

सूचना आयोगों में काम का दबाव भी बढ़ा है. स्टाफ कम है और लंबित मामले बहुत अधिक. मार्च 2019 तक आयोगों के पास दो लाख से ज्यादा मामले पेंडिंग हैं. सर्वे के मुताबिक केंद्रीय सूचना आयोग के पास अक्टूबर के पहले सप्ताह तक लंबित मामलों की संख्या 33 हजार से ज्यादा थी. यानी किसी नई अपील पर सुनवाई का अर्थ है डेढ़ दो साल का लंबा इंतजार. केंद्रीय सूचना आयोग के 11 पदों में से चार अभी खाली बताए जाते हैं. एक ओर सूचना आयोगों में पारदर्शिता के अभाव, काम के बोझ, लंबित मामलों का दबाव, कानून के प्रभावी इस्तेमाल पर शिथिलता देखी जा सकती है तो दूसरे छोर पर सरकारी दफ्तर हैं जहां तैनात लोक सूचना अधिकारियों पर आरोप है कि वे सूचनाओं के अपेक्षित और वांछित निस्तारण की जगह उन्हें रद्द कर रहे हैं या अनदेखी कर रहे हैं या फाइलों पर जोर लगाकर बैठे हुए हैं. एक तीसरा पहलू भी है जो सीधे केंद्र सरकार और राज्य सरकारों से जुड़ता है, वहां शासन कर रहे राजनीतिक दलों से और कार्यपालिका से.

भारत के सबसे विवादित कानून

सूचना आयोगों की जर्जर हालत दिखाने वाले सर्वे के दिन ही यानी 14वीं सालगिरह पर केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा कि उनकी सरकार इतनी पारदर्शी है कि आइंदा आरटीआई दायर करने की जरूरत ही नहीं रह जाएगी. यानी आगे बढ़कर पब्लिक डोमेन में इतनी सूचनाएं सरकार खुद डाल देगी कि बिन मांगे ही सूचना मिल जाएगी. सरकार मानती है कि आरटीआई आवेदनों की संख्या में वृद्धि सरकार की सफलता की सूचक नहीं है इसलिए ऐसा सिस्टम बनाया जा रहा है. हालांकि यह तर्क गले नहीं उतरता, इस लिहाज से तो आरटीआई क्या किसी भी कानून को रखने या उस पर अमल करने की जरूरत कम की जा सकती है. सरकार अगर प्रोएक्टिव अंदाज में सबकुछ कर सकती है तो फिर ऐसे कई मुद्दे हैं जिनपर उससे सवाल पूछा जा सकता है.

आरटीआई एक्टिविस्टों का कहना है कि सरकार अगर आगे बढ़कर सूचनाएं जारी करना शुरू कर देती है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि आरटीआई की व्यवस्था को शिथिल या लचीला बना दिया जाए या उसकी जरूरत ही न रह जाए. क्योंकि आरटीआई कानून तो यही कहता है कि सरकार को ऐसी सक्रियता दिखानी ही होगी. लेकिन लोगों को वह सूचना मिलनी चाहिए जिसके वे तलबगार हैं, जिसकी उन्हें जरूरत है न कि वह सूचना जो सरकार प्रचारित कराना चाहती है. एक आंकड़े के मुताबिक 2005 से अब तक देश में आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हिंसा और उत्पीड़न के चार सौ से अधिक मामले सामने आ चुके हैं. 80 से ज्यादा एक्टिविस्ट देश के विभिन्न हिस्सों में इस दरम्यान मारे गए.

इसी साल सरकार ने आरटीआई कानून में सबसे बड़ा बदलाव किया है. इसके तहत राज्यों के सूचना आयोगों और केंद्रीय सूचना आयोग में आयुक्तों के कार्यकाल, नियुक्ति और वेतन का निर्धारण केंद्र ही करेगा. आरटीआई कानून के साथ छेड़छाड़ की आशंकाओं और घटनाओं पर उद्वेलित और चिंतित आंदोलनकारियों का आरोप है कि सरकार आरटीआई को रहने ही नहीं देना चाहती, इसीलिए उसकी स्वायत्तता भंग की जा रही है.

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