मंदिर ही नहीं दिलों में देनी होगी दलितों को जगह | ब्लॉग | DW | 23.05.2016
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

ब्लॉग

मंदिर ही नहीं दिलों में देनी होगी दलितों को जगह

दलितों को मंदिर में प्रवेश दिलाने गए सांसद को ही लोगों ने पीट दिया. सोचिए, दलितों की क्या दशा होगी. ऐसे में दलितों को दिलों में जगह कैसे मिलेगी?

बाबा साहब भीमराव आंबेडकर की 125वीं जयंती समारोहों के बीच यह विडंबना ही है कि दलित उत्पीड़न की घटनाएं अपने भयावह रूप में सामने आ रही हैं. हैदराबाद के शोध छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या से लेकर, तमिलनाडु में दलित युवक की गैरजातीय विवाह के चलते हत्या, राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय में दलित छात्रों पर उत्पीड़न और अब उत्तराखंड में दलितों के मंदिर प्रवेश पर हिंसा.

उत्तराखंड का जौनसाब भाबर का इलाका जिसके तहत चकराता तहसील भी है, अपनी कुदरती खूबसूरती, रीति-संस्कृति, मान्यताओं और मंदिरों के वास्तुशिल्प और ऐतिहासिकता के लिए जाना जाता रहा है तो जातीय कट्टरपंथ के लिए भी कुख्यात रहा है. महाभारत से जुड़ी दंतकथाओं और किंवदंतियों के अलावा यहां स्थानीय देवताओं के भी मंदिर है, जिनके प्रति स्थानीय लोगों में गहरी श्रद्धा है. दलितों के प्रवेश को लेकर यहां आंदोलनों का भी इतिहास रहा है. लेकिन इस दिशा में कोई सार्थक निरंतरता रह पाई हो, कहना मुश्किल है. प्रशासन और आंदोलनकारियों के दबाव में दलितों को मंदिर में प्रवेश मिलने लगा है लेकिन कुल मिलाकर समाज में अभी भी एक अदृश्य दीवार खिंची हुई है. दलितों के पक्ष में ऐसी ही एक कोशिश के तहत बीजेपी के राज्यसभा सांसद तरुण विजय यहां पिछले कुछ समय से सक्रिय रहे हैं.

इस मामले में नया मोड़ तब आ गया जब अपने अभियान के तहत तरुण विजय चकराता के पोखरी गांव के मशहूर शिल्गुर देवता मंदिर में गए. स्थानीय सूत्रों का कहना है कि उनके साथ दलितों का एक समूह भी था, लेकिन उन्हें वहां स्थानीय लोगों के एक झुंड के भारी विरोध का सामना करना पड़ा. बात बिगड़ती गई और तरुण विजय और उनकी टोली पर पथराव कर दिया गया. उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने घटना की निंदा करते हुए गढ़वाल के मंडलायुक्त को घटना की जांच करने का आदेश दिया. कुछ गिरफ्तारियां भी हो गई हैं. लेकिन सवाल यह है कि जब एक दलित लड़की आईएएस की परीक्षा में टॉप कर रही है और 21वीं सदी में हर दूसरे व्यक्ति के हाथों में मोबाइल फोन और इंटरनेट है, तब ऐसे में भारतीय समाज किन रूढ़ियों में जकड़ा हुआ है. मंदिर में प्रवेश तो दूर की बात है, दैनंदिन जीवन में दलित लगभग समाज के हाशिए पर ही हैं. और इस लिहाज से यह स्थिति सिर्फ किसी क्षेत्र विशेष तक महदूद नहीं है. देश भर में दलित समुदायों की स्थिति चिंताजनक ही है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक 2014 में दलितों के खिलाफ होने वाले अपराधों में 19 फीसदी वृद्धि हुई है.

उत्तराखंड की कुल आबादी में दलितों की संख्या 18 प्रतिशत है. अधिकांश दलित ग्रामीण इलाकों में रहते हैं. पहाड़ की संस्कृति में जन्म से लेकर मृत्यु तक दलितों की बहुत बड़ी भूमिका है, मिसाल के लिए उत्तराखंड में ढोल दमाऊं बजाकर गुजारा करने वाली एक दलित उपजाति है जिन्हें “औजी” कहा जाता है. औजियों के ढोल की ‘नौबतों' यानी अलग अलग अवसरों पर अलग अलग थाप देने की करामात के बिना मेले, तीज त्योहार, रस्में सब फीकी ही नहीं अशुभ भी मानी जाती हैं. लेकिन इन औजियों की कला और जीवन के संरक्षण के लिए कोई ठोस प्रयास कभी नहीं किए गए. जलसों समारोहों में चमकदार पोशाकें पहनाकर उनका स्वागत सत्कार और उनकी कला की दाद तो ज़रूर दी गई लेकिन ये भी एक रस्म अदायगी रही है. ढोल वादन की पारंपरिक कला के अलावा सामाजिक विकास के भी सवाल थे जो पीढ़ी दर पीढ़ी विकट ही हुए हैं.

सच्चाई यह है कि यहां दलितों के साथ भेदभाव और उनके उत्पीड़न की जड़ें बहुत गहरी हैं. भले ही उत्तर प्रदेश और बिहार की तरह दलितों को मारने या जलाने की भयावह घटनाएं यहां नहीं होती हों लेकिन रोजमर्रा के जीवन और सामाजिक अवसरों पर उनके प्रति अमानवीय व्यवहार देखने को मिलता है. आज भी अधिकांश इलाकों में दलितों को साथ नहीं बैठाया जाता, उन्हें चाय और खाना भी अलग बर्तनों में दिया जाता है. उन्हें अपने बर्तन खुद धोने होते हैं. और लगता है कि दलितों ने भी इस स्थिति को स्वीकार लिया है और शिक्षा और शहरीपन के विकास के बावजूद दलितों के प्रति दृष्टिकोण में कोई बदलाव नहीं आया है. पहाड़ के प्रेमचंद कहे जाने वाले हिंदी कथाकार विद्यासागर नौटियाल की रचनाओं में इसके दस्तावेजी प्रमाण मिलते हैं. जानेमाने दलित लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि देहरादून में ही रहते थे जिनका उपन्यास “जूठन” दलित साहित्य में मील का पत्थर माना जाता है, वो भी हमेशा ही कहा करते थे कि पहाड़ से कभी कोई दलित आत्मकथा नहीं आ सकी.

और बात सिर्फ दलित चेतना या मंदिर प्रवेश के अधिकार की नहीं है, गहरे पसरे हुए ब्राह्मणवाद और कठमुल्लापन को भी उखाड़ने की जरूरत है. यह सही है कि आधुनिक विचार अख्तियार कर दलितों की नई पीढ़ी बाहर निकल रही है. निकलेगी ही. लेकिन समस्या उस ब्राह्मणवाद की है जो अपनी वैचारिक सड़ांधों से छुटकारा पाने से इंकार करता आया है. दलितों के मंदिरों में प्रवेश को लेकर एकबारगी कानून भी होंगे, उनके अधिकारों की हिफाजत तो संविधान में लिखी ही हुई है, समाज में भी एक बार ऊंची जातियां मान लेंगी लेकिन उस विमुखता को कैसे दूर करेंगे जो पीढ़ी दर पीढ़ी अगड़ों और पिछड़ों के बीच मन में जड़ जमा चुकी है? माना मंदिरों में आने देंगे लेकिन दिलों में कब उतारेंगे? वैचारिक आधुनिकता आए बिना तो इस समस्या का निर्णायक हल होने से रहा. बेशक कानून ने कुछ नकेल कसी है लेकिन कानून का डर और दलितों के प्रति सम्मान होता तो उन पर अपराधों का ग्राफ यूं न बढ़ रहा होता.

ब्लॉग: शिवप्रसाद जोशी

DW.COM

संबंधित सामग्री