जर्मनी में भी एशियाई लोग नस्लवाद और हिंसा के निशाने पर | दुनिया | DW | 22.03.2021
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दुनिया

जर्मनी में भी एशियाई लोग नस्लवाद और हिंसा के निशाने पर

पहले 'अजीब' और 'स्पा-गर्ल' जैसे नामों से पुकारे जाने वाले चीनी नैन नक्श वाले लोग पिछले कुछ महीनों में 'कोरोना फैलाने वाले' कहलाए हैं. जर्मनी में भी एशियाई लोगों को ऐसी नस्लीय टिप्पणियों और हिंसा से दो चार होना पड़ा है.

जर्मनी में पढ़ने वाले विदेशी छात्रों का एक समूह.

जर्मनी में पढ़ने वाले विदेशी छात्रों का एक समूह.

"ऐ चीनी, एशियन, तुम यहां क्यों हो?" जर्मन राजधानी बर्लिन में रहने वाले इंडोनेशियाई स्टूडेंट जैकी को सड़क चलते ऐसी बातें कई बार सुननी पड़ी हैं. एक बार तो एक आदमी ने सड़क पर ही उन पर हमला भी कर दिया था. इंडोनेशिया से ही आने वाली पुष्पा जर्मन शहर बॉन में पढ़ाई कर रही हैं. एक बार नए साल की देर शाम घर लौटते समय उन पर किसी ने जलते हुए पटाखे फेंक दिए. पुष्पा को पूरा विश्वास है कि उनके हिजाब पहनने के कारण ही ऐसा हुआ.

बर्लिन में रहने वाले चीनी फिल्ममेकर पोपो फैन और उनके प्रोड्यूसर को उनके एशियाई नैन नक्श के कारण एक बार किसी ने बहुत हमलावर अंदाज में "जापान वापस लौट जाने को" कहा था. फैन बताते हैं, "हमें इतना अजीब लगा क्योंकि ना तो हम जापान से हैं और ना ही कभी वहां गए हैं. लेकिन मेरी प्रोड्यूसर तो यही सब सुनते हुए यहीं जर्मनी में पली बढ़ी है." वह कहते हैं कि बचपन से ऐसी बातें सुनने के कारण किसी के पूरे जीवन पर असर पड़ सकता है.

इतिहास में झांकते हैं

वैसे तो कोविड महामारी की शुरुआत के समय से एशियाई लोगों के खिलाफ एक तरह का नस्लवादी रवैया और ज्यादा उभरा है क्योंकि चीन के वुहान से इस वायरस की शुरुआत मानी जाती है. लेकिन सच तो यह है कि एशियाई लोगों के खिलाफ पूर्वाग्रह कई सदियों से चले आ रहे हैं.

यूरोप में 13वीं सदी से एक एक धारणा चली आ रही है कि एशियाई लोग "अलग" होते हैं, "अनोखे" और "खतरनाक" भी हो सकते हैं. यह सारी बातें जर्मन फेडरल एजेंसी फॉर सिविक एजुकेशन द्वारा हाल में भी प्रकाशित एक निबंध में लिखी हैं. इसके लेखक सबरीना मायर, क्रिस्टोफ नग्यूयेन और किमिको सूडा ने लिखा है कि औपनिवेशिक काल में प्रशिया के राजा किंग विलियम द्वितीय ने चीन में हुए बॉक्सर विद्रोह को कुचलने के लिए जर्मन सैनिक भेजे थे. वे लिखते हैं कि नाजी काल में तमाम चीनी आप्रवासियों को यातना केंद्रों में डाला गया और कइयों को जर्मनी से निर्वासित किया गया.

सन 1992 की वह अंधेरी शाम.

सन 1992 की वह अंधेरी शाम.

नाजी काल के अंत के बाद बंटे हुए जर्मनी के पूर्वी कम्युनिस्ट हिस्से ने दुनिया भर के कम्युनिस्ट शासन से संपर्क बनाए रखा जिनमें वियतनाम शामिल है. सोवियत संघ के खात्मे तक पूर्वी जर्मनी में काम कर रहे वियतनामी मजदूरों की तादाद 60,000 से भी ज्यादा हो चुकी थी. पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी के एकीकरण के करीब एक दशक बाद के काल में विदेशी-विरोधी भावनाएं चरम पर थीं. सन 1991 में नवनाजियों ने सैक्सनी प्रांत के एक शहर में वियतनामी व्यापारियों पर हमला किया था और एक प्रवासियों के शेल्टर को घेर लिया और वहां रहने वालों पर भी हमले किए. 1992 में भी ऐसे ही दंगे रॉस्टॉक-लिष्टरहागेन में भी हुए, जब एक अपार्टमेंट के बाहर सैकड़ों दक्षिणपंथियों ने इकट्ठे होकर उस पर हमला किया, जिसमें ज्यादातर वियतनामी और कुछ दूसरे प्रवासी रहते थे. वहां मौजूद हजारों प्रत्यक्षदर्शियों ने इस हरकत का समर्थन करते हुए तालियां बजाईं और पुलिस ने भी कोई कार्यवाई नहीं कर सकी.

1971 में ड्रेसडेन में वियतनामी छात्रों ने निकाली थी यादगार रैली.

1971 में ड्रेसडेन में वियतनामी छात्रों ने निकाली थी यादगार रैली.

नस्लभेद के खिलाफ काम करने वाले एक्टिविस्ट फेरात अली कोचाक बर्लिन से बातचीत में बताते हैं,  "इस तस्वीर ने ऐसे कई लोगों को बनाया है जो आज के जर्मनी में नस्लवाद के खिलाफ लड़ रहे हैं. हमारे सामने यह साफ हो गया कि भले ही हमेशा साफ साफ नजर ना आए, तब भी कई कारणों से एशिया-विरोधी नस्लवाद जर्मन समाज में गहरे से रचा बसा है."

'किस बात का इंतजार है?'

फिल्ममेकर पोपो फैन 2019 के अपने दो बहुत डरावने अनुभवों के बारे बताते हैं. बर्लिन की अंडरग्राउंड ट्रेन में जब एक इंसान ने उन्हें अपशब्द कहे तो वहां सात-आठ लोग और भी मौजूद थे. फैन बताते हैं, "कोई मेरी मदद करने आगे नहीं आया. किसी ने मेरी ओर देखा तक नहीं. वे या तो अपने फोन पर लगे रहे या फिर बस अपना सिर घुमा लिया. जब मैं ट्रेन से उतरा, तब एक आदमी ने मुझसे कहा,  'तुम्हें उस आदमी से नहीं भिड़ना चाहिए था, वह खतरनाक हो सकता था.' मेरा पूरा शरीर कांप रहा था और मैं पूछना चाहता था कि वह मेरी मदद के लिए आगे क्यों नहीं आए जब उन्हें पता था कि मैं खतरे में था. मुझे मदद की जरूरत थी."

उस घटना के बाद से फैन ने बर्लिन में पब्लिक ट्रांसपोर्ट लेना बंद कर दिया. उस पर वापस लौटना उनके दिमाग में डरावने ख्याल ले आता है. ऐसी कुछ अतियों के अलावा भी आए दिन तमाम लोगों को छोटे बड़े नस्लभेद से प्रेरित व्यवहार का सामना करना पड़ता है. फैन के साथ ही ऐसा कई बार हुआ जब कुछ लोगों ने उनकी त्वचा को छूकर जानना चाहा कि वह कितनी चिकनी है. फैन बताते हैं कि उन्हें "ऐसा महसूस हुआ कि जैसे वह कोई जानवर हों." जर्मन टेलीविजन में भी एक्का दुक्का ही एशियाई चेहरे दिखते हैं. जब उन्हें दिखाया भी जाता है तो वे भूमिकाएं भी किसी "एशियाई रेस्तरां में वेटर" या "स्पा में काम करने वाली लड़की" की होती है.

जर्मनी में कोविड महामारी के शुरुआती महीनों में एक बार फिर सार्वजनिक रूप से किसी आदमी ने फैन को "कोरोना" कह कर बुलाया. इस बारे में शिकायत लेकर वह पुलिस के पास गए और उनसे इस बारे में कुछ करने को कहा. वह बताते हैं कि "उन्होंने 2019 में भी कुछ नहीं किया था. इस बार मैंने उनसे पूछा कि आप किस बात का इंतजार करे हैं? जब कोई मुझे बंदूक से गोली मार देगा इसका?"

आगे का रास्ता

बॉन में रहने वाली एक युवा चीनी पेशेवर मिशेल से उनके दोस्त ने पूछा था, "तुम्हें तो कोविड नहीं है ना?" इस सवाल को रेसिस्ट माना जा सकता है लेकिन मिशेल का कहना है कि वह लोगों की ऐसी सोच का कारण समझती हैं. वह कहती हैं, "ये तो इंसान के साथ होता है. वायरस के चीन से शुरु होने का एक संबंध तो है ही. वह कहती हैं कि जर्मनी फिर भी चीन से बहुत अलग है. चीन के हुबेई प्रांत की एक घटना के बारे में बताते हुए वह कहती हैं कि जब पहले पहले वहां कोविड के मामले सामने आए तो लोगों ने तो संक्रमितों को उनके घर में ही बाहर से बंद कर दिया था और सामाजिक रूप से अलग थलग कर दिया था.

मोटे तौर पर उनका मानना है कि जर्मनी ने उन्हें स्वीकार किया है. वह बताती हैं कि लोग अकसर उनसे कोई पता पूछने चले आते हैं जबकि वह दिखने में ही विदेशी लगती हैं. शुरु के सालों में उन्हें भेदभाव महसूस हुआ था लेकिन उसका कारण अब वे सांस्कृतिक अंतर को मानती हैं. नस्लवाद-विरोधी एक्टिविस्ट कोचाक का भी ऐसा मानना है. डॉयचे वेले से बातचीत में वह कहते हैं, "ब्लैक लाइव्ज मैटर आंदोलन और हनाऊ के बाद हुए एंटी-रेसिज्म आंदोलनों ने कुछ तो असर दिखाया है." बीते साल जर्मनी के हनाऊ में एक शीशा बार पर हुई गोलीबारी में तुर्क मूल के कई लोगों की जान चली गई थी. वह कहते हैं, "दुनिया में अन्याय है और इसीलिए हमें कहीं ज्यादा एकजुटता दिखाने की जरूरत है. युवाओं को यह ठीक से समझ आ रहा है और इसीलिए वे सड़कों पर उतरे हैं."

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