ऑनलाइन प्लैटफॉर्म्स के कारण क्या खत्म हो जाएंगे परंपरागत सिनेमा हॉल? | लाइफस्टाइल | DW | 29.05.2020
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लाइफस्टाइल

ऑनलाइन प्लैटफॉर्म्स के कारण क्या खत्म हो जाएंगे परंपरागत सिनेमा हॉल?

कोरोना महामारी ने अर्थव्यवस्था की कई शाखाओं को नुकसान पहुंचाया है. उनमें फिल्म उद्योग भी है जहां लॉकडाउन के कारण सिनेमा हॉल बंद हैं. परंपरागत सिनेमा थिएटरों के पूरी तरह बंद हो जाने का खतरा पैदा हो गया है.

शुरुआती दौर की फिल्मों का शूटिंग से स्क्रीनिंग तक का सफर एक लंबी रील में हुआ करता था, जो सिनेमाघरों तक एक डिब्बे में पहुंचाई जाती थी. उस कई फुट लंबी रील को मैकेनिकली घुमाया जाता था जिसके बीच से एक तेज लाइट निकल कर पर्दे पर जाती थी. और उस लाइट से जो दृश्य पैदा होता था उसमें नजर आती थी बॉलीवुड की वो आईकॉनिक फिल्में, जिन्हें देखने के लिए लोगों की लंबी लाइनें लगा करती थीं. पिछले कुछ दशकों में फिल्मों और सिनेमाघरों ने एक लंबा सफर तय किया है. फिल्में अब शूटिंग से लेकर स्क्रीनिंग तक लगभग पूरी तरह एक डिजिटल प्रोडक्ट हैं. आज आप 3डी स्क्रीन से लेकर थिएटर और मोबाइल तक कहीं भी फिल्म देख सकते हैं. जहां एक तरफ देश में इंटरनेट के सस्ते होते दामों ने ऑनलाइन प्लैटफॉर्म्स को एक बड़ा मार्केट दे दिया है, वहीं सिंगल स्क्रीन की जगह मल्टीप्लेक्स ने ले ली है. 80 और 90 के दशक के छोटे-अंधेरे हॉल से अब बड़े हॉल, बेहतर साउंड-वीडियो क्वालिटी और खाने के तमाम ऑप्शन, ये सब चीजें मल्टीप्लेक्स में फिल्म देखने के अनुभव का हिस्सा हैं.

लेकिन लगातार नए विकास के दौर से गुजर रहे सिनेमा बिजनेस में थिएटरों को शायद ही कभी ऐसी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा होगा जैसी आज है. कोरोना वायरस ने बॉलीवुड और सिनेमाघरों को आमने-सामने ला दिया है. लगभग दो महीने से चल रहे कोरोना लॉकडाउन ने बाकी सभी इंडस्ट्री की तरह फिल्म इंडस्ट्री को भी मुसीबत में डाल दिया है. सभी फिल्मों की शूटिंग रुकी हुई है और लॉकडाउन के कारण कई फिल्मों की रिलीज टलती जा रही है. रणवीर सिंह की कपिल देव पर बनी बायोपिक '83' और परिणीति चोपड़ा और अर्जुन कपूर की फिल्म ‘संदीप और पिंकी फरार' जैसी बड़ी फिल्में रिलीज के इतजार में हैं. जाहिर है कई प्रोड्यूसर्स और फिल्मों में काम करने वाले लोगों का पैसा भी रुका हुआ है. जहां एक तरफ लॉकडाउन के चौथे फेज में सरकार कई सेक्टरों को खोलकर राहत दे रही है, वहीं कोविड-19 के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. ऐसे में जब सोशल डिस्टेंसिंग खुद को और अपने परिवार को सुरक्षित रखने का एकमात्र तरीका हो तो बाहर जाकर सिनेमा देखने का रिस्क कितने लोग लेंगे ये भी कारोबारियों के लिए चिंता का विषय है. ऐसे में आने वाले वक्त में भी सिनेमाघरों के खुलने या सामान्य रूप से बिजनेस कर पाने के आसार कम हैं.

ऑनलाइन प्लैटफॉर्म्स का बढ़ता महत्व

लॉकडाउन में लोगों के घर में फंसे रहने से ऑनलाइन प्लैटफॉर्म्स की व्यूवरशिप काफी बढ़ी है और अब वो गेम चेंजर का काम कर रहे हैं. ऐेसे में कुछ फिल्मकारों ने फैसला लिया है कि वो अपनी फिल्म को सीधे ओटीटी प्लेटफॉर्म पर ही रिलीज करेंगे. बॉलीवुड अभी तक थियेटर और डिजिटल रिलीज के बीच 8 हफ्तों का अंतर रखता था, जिससे स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म को भी ऑडियंस का रिस्पॉन्स देखकर फिल्म चुनने का मौका मिल जाता था. हालांकि, लॉकडाउन के कारण अब बदले हालात में कई बड़े फिल्ममेकर्स भी शायद थिएटर्स से उम्मीद लगाए नहीं बैठना चाहते. ऑनलाइन रिलीज होने वाली कुछ बड़ी फिल्मों में अमिताभ बच्चन और आयुष्मान खुराना की फिल्म ‘गुलाबो सिताबो' शामिल है जो अमेजन प्राइम पर रिलीज होगी, तो वहीं अक्षय कुमार की हॉरर-कॉमेडी ‘लक्ष्मी बॉम्ब' डिजनी+हॉटस्टार पर रिलीज होने के लिए तैयार है. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई और फिल्में भी स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर रिलीज हो सकती हैं. विद्या बालन की ‘शकुंतला देवी', जाह्नवी कपूर की ‘गुंजन सक्सेना - द कारगिल गर्ल', अमिताभ बच्चन की ‘झुंड' और ‘चेहरे', अनुराग बसु की मल्टीस्टारर फिल्म ‘लूडो' भी आने वाले समय में स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर रिलीज हो सकती हैं. टी-सीरीज भी अपनी फिल्मों, ‘इंदु की जवानी' और ‘चालान' के लिए नेटफ्लिक्स के संपर्क में है. साथ ही दक्षिण की कई फिल्में भी सीधे OTT पर रिलीज़ के लिए तैयार हैं.

हालात को देखते हुए फिल्ममेकर्स का अपनी फिल्मों को ओटीटी पर रिलीज करने का फैसला ज्यादा चौंकाने वाला नहीं होना चाहिए पर इनॉक्स, पीवीआर और कार्निवल जैसी बड़ी मल्टिप्लेक्स कंपनियों के पिछले कुछ दिनों में आए बयानों से ऐसा लग रहा है कि ये कंपनियां इस बदलाव के लिए बिलकुल तैयार नहीं थी. इन सभी कंपनियों ने धमकी भरे अंदाज में फिल्ममेकर्स को आगे का सोचने को कहा. इनॉक्स ने एक बयान में इस फैसले पर निराशा जाहिर करते हुए प्रोड्यूसर्स को ‘फेयर-वेदर फ्रेन्ड्स' बता डाला जिन्हें इस मुश्किल के वक्त में उनके साथ खड़ा होना चाहिए था. सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इसका मजाक भी उड़ाया तो कुछ फिल्ममेकर्स ने भी इसका जवाब दिया.

ओटीटीपर रिलीज से क्या बदला?

जब कमल हासन ने 2013 में अपनी फिल्म ‘विश्वरूपम' को थिएटर के साथ डीटीएच पर भी रिलीज करने की बात की थी तो थिएटर मालिकों ने फिल्म को पर्दे से उतारने की धमकी दी और हासन को कानूनी रास्ते अपनाने के बाद भी उनकी बात माननी पड़ी. सच ये है कि लॉकडाउन ने जिस बदलाव की रफ्तार तेज कर दी वो बदलाव आने की तैयारी पिछले कुछ सालों से हो रही थी. फिल्म प्रोड्यूसर्स और सिनेमाघरों के बीच की खींच-तान भी कोई बिलकुल नई बात नहीं, बल्कि फिल्म व्यवसाय का एक बड़ा हिस्सा है. थिएटर कभी कम पैसे में फिल्म के राइट्स खरीदने या फिल्म चलाने के लिए कंटेंट में बदलाव या फिर एक्शन, डांस या सेक्स सीन बढ़ाने की भी डिमांड करते रहे हैं. बड़ी कमर्शियल फिल्मों के बराबर पैसे और अहमियत ना मिलने के कारण छोटे बजट की फिल्में और आर्ट सिनेमा थिएटर के अलावा दूसरे विकल्प तलाशता ही रहा है. और ओटीटी के जरिए उन्हें अपने लिए बेहतर प्लैटफॉर्म मिल जाता है. कुछ साल पहले तक फिल्में कई हफ्तों तक थिएटर में लगी रहती थी. आज बड़ी से बड़ी फिल्में भी 2-4 हफ्ते का वक्त ही ले पाती हैं. जिसमें भी बिजनेस का सबसे बड़ा हिस्सा पहले वीकेंड में ही मिल जाता है. लेकिन इस वक्त ठप पड़े बिजनेस और भविष्य को लेकर बढ़ती अनिश्चितता बड़ी फिल्मों को भी थिएटर से दूर खींच रही हैं.

कई फिल्में अभी भी थिएटर खुलने का इंतजार कर रहीं हैं पर सोशल डिस्टेंसिंग की बढ़ती अहमियत के बीच अगर थिएटर ना खुलने या फुल कैपेसिटी पर फिल्में ना दिखा पाने के कारण फिल्मों को नुकसान दिखता है तो ओटीटी की तरफ जल्द ही बढ़ सकते है. हालांकि थिएटर में जाकर फिल्म देखना लोगों की वीकेंड आउटिंग का हिस्सा है और ओटीटी उसमें ज्यादा बदलाव ला पाएंगे ऐसा मुमकिन नहीं. दिल्ली यूनिवर्सिटी के 20 छात्रों से जब पूछा गया कि क्या वो लॉकडाउनखुलने के बाद भी थिएटर में फिल्म देखना बिलकुल छोड़ देंगे लगभग सबका जवाब ना था. कोरोना वायरस ने लोगों को बाहर निकल कर करने वाली हर चीज से पहले दो बार सोचने पर मजबूर तो कर दिया है लेकिन सभी को स्थिति नॉर्मल होने की उम्मीद है. 27 साल की कीर्ति तिवारी जो खुद फिल्म इंडस्ट्री में स्टाइलिस्ट का काम करती हैं उनका कहना है, "वीकेंड पर फिल्म देखना कई बार फिल्म देखने से ज्यादा दोस्तों या परिवार के साथ वक्त बिताने का कारण होता है." ऑनलाइन फिल्म देखने और थिएटर में लोगों के साथ हंसते या तालियां बजाते फिल्म देखने में काफी अंतर है. ओटीटी प्लैटफॉर्म्स के बढ़ते चलन से लोगों की फिल्म देखने की आदतों पर कितना फर्क पड़ेगा इसपर पिछले कुछ सालों से लगातार बात हो रही है. ये कहना गलत नहीं कि भारत में आज भी ज्यादातर फिल्में बड़े पर्दे को ध्यान में रखकर ही बनाई जाती हैं. लेकिन घर के आराम में किसी भी वक्त फास्ट फॉर्वर्ड और रीवाइंड कर मूवी देखने का अनुभव धीरे-धीरे ओटीटी के लिए नया मार्केट बना रहा है जो शायद लोगों को थिएटर तक जाने से भी रोके.

वीडियो देखें 04:55

पॉर्न इंडस्ट्री कोरोना के लिए तैयार

हजारों नौकरियों पर खतरा

अब तक इस इंडस्ट्री के चलते रहने का कारण रहा है भारत में लगातार बढ़ता फिल्म व्यवसाय जिसमें हर प्लैटफॉर्म के लिए कंटेंट की कोई कमी नहीं रही. भारत में 20 से अधिक भाषाओं में हर साल 1,000 से अधिक फिल्में बनती हैं और 3.3 अरब टिकटों की बिक्री के साथ भारत में थिएटरों की संख्या भी सबसे अधिक है. अब तक सिनेमाघरों के पास ओटीटी के मुकाबले जो सबसे बड़ी बढ़त हासिल थी वो थी नई फिल्मों की रिलीज. जहां नेटफ्लिक्स और अमेजन प्राइम जैसे ऑनलाइन प्लैटफॉर्म दुनिया भर से नया और पुराना कंटेंट दर्शकों के लिए लाते रहे हैं, वहीं बॉलीवुड की सभी बड़ी फिल्में सिनेमाघरों में पहले रिलीज होती रही हैं.

फिल्मों की शूटिंग रुकने से फिल्मों में हजारों की संख्या में काम करने वाले लोगों की नौकरियां तो रुकी ही हुई हैं, पर सिनेमाघरों में ताला लगने से इसमें देश भर के सिनेमाघरों में छोटी-बड़ी नौकरियां करने वाले लोगों की कमाई को भी खतरे में डाल दिया है. पिछले महीने तक गृह मंत्रालय की अडवाइजरी के मुताबिक सभी प्राइवेट बिजनेस को काम बंद होने के बावजूद भी काम करने वालों की सैलरी देनी थी, हालांकि हर बिजनेस वाले सभी कर्मचारियों को पूरी सैलरी दे रहे हों ऐसा जरूरी नहीं. फिलहाल किसी बड़े ले-ऑफ की भी खबर नहीं आई लेकिन ये सभी कंपनियां भारी घाटे से गुजर रही हैं, और अगर इन्हें जल्द राहत नहीं मिलती तो इन्हें अपने ऑपरेशन सीमित कर लोगों को नौकरियों से निकालना भी पड़ सकता है. पीवीआर का शेयर पिछले दो महीनों में 60 फीसदी के आस-पास गिर चुका है, वहीं इनॉक्स के शेयर में भी 50 फीसदी की गिरावट है. कार्निवल का जो फरवरी में 40 रुपए से ऊपर था वो अब महज 14 रुपए तक गिर गया है. केयर की रेटिंग के हिसाब से थिएटर कंपनियां लॉकडाउन में 3,500 करोड़ का बिजनेस खो रही हैं. ये कंपनियां पहले ही सरकार से मदद की गुहार लगा चुकी हैं लेकिन सरकार के स्टिम्युलस पैकेज में भी इनके लिए कोई खास अच्छी खबर नहीं.

तेजी से बदल रहा है सिनेमा का कारोबार

अब सवाल ये है कि थिएटरों से जु़ड़े रोजगारों का क्या होगा? व्यापार पहले की तरह ना खुलने की स्थिति में ये शायद कुछ वक्त की ही बात है जब ये कंपनियां ऊबर और जोमैटो की तरह कर्मचारियों को नौकरी से निकालने लगें. हालांकि इनॉक्स द्वारा सैलरी ना दिए जाने की शिकायत सोशल मीडिया पर पहले ही दिख रही है जिसमें इस शख्स की पहचान अभी स्तापित नहीं की जा सकी है. 

साथ ही थिएटरों से सीधे तौर पर ही नहीं बल्कि दुकानों के जरिए भी कुछ व्यवसाय और नौकरियां निर्भर रहती हैं, जिनको भी लॉकडाउन की मार झेलनी पड़ रही है. मल्टीप्लेक्स असोसिएशन ऑफ इंडिया ने मकान मालिकों से गुजारिश की थी कि वो थिएटर का रेंट और कॉमन मेंटेनेन्स का पैसा माफ कर दें. संस्था ने एक बयान में कहा है कि ज्यादातर बिजनेस का रेवेन्यू कम हुआ है लेकिन थिएटरों की कमाई रातों रात जीरो हो गई है, ऐसे में सैलरी और बिल भरना मुश्किल है.'

फिल्मों का कारोबार एक नए युग में जा रहा है ये कहना गलत नहीं होगा. पर भारत में परिवार और दोस्तों का साथ जाकर फिल्म देखना सालों की आदत है. और ये मान लेना कि ओटीटी का बढ़ता चलन थिएटर के बिजनेस को कम ही करेगा शायद जल्दबाजी भी हो सकती है. मल्टीप्लेक्स आने के कई सालों बाद भी मुंबई और चेन्नई जैसे शहरों में अभी भी कुछ आईकॉनिक सिंगल स्क्रीन थिएटर हैं, जो चाहे पॉपुलर ना रहे हो लेकिन अपनी एक जगह बनाए हैं. मुंबई का मराठा मंदिर जो सालों से 90 के दशक की शाहरुख खान की फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' लगातार दिखा रहा है वो अपनेआप में एक एतिहासिक उदाहरण है जो ये साबित करता है कि भारत में फिल्मों का कारोबार इतना बड़ा है कि उसमें सबके लिए जगह है. और मल्टिप्लेक्स के सिंगल स्क्रीन की तरह आउटडेटेड होने में भी अभी कई साल का वक्त है. फिल्मों की ओटीटी पर रिलीज शायद जल्द ही कॉमन हो जाए और थिएटरों और ऑनलाइन के बीच बिजनेस बंट जाए पर कहा जा सकता है कि सालाना हजारों फिल्में बनाने वाली भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में हर प्लैटफॉर्म के लिए कंटेंट बनाने की क्षमता है, और ओटीटी प्लैटफॉर्मों की ग्रोथ से फिल्मों को बेहतर मौके मिल जाते हैं.

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