अमीर हो या गरीब, जलवायु परिवर्तन की मार से नहीं बचेगा कोई देश | पर्यावरण | DW | 23.07.2021
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पर्यावरण

अमीर हो या गरीब, जलवायु परिवर्तन की मार से नहीं बचेगा कोई देश

न्यूयॉर्क में रहने वाले भारतीय लेखक अमिताभ घोष का कहना है कि सभी देशों को यह सच्चाई स्वीकार करनी होगी कि जलवायु परिवर्तन से सभी लोग प्रभावित होंगे.

अमिताभ घोष

अमिताभ घोष

भारतीय लेखक अमिताभ घोष अपनी कहानियों के जरिए प्रकृति से जुड़ी जटिलताओं को सामने लाते हैं. बांग्लादेशी विरासत वाले यह भारतीय लेखक अब न्यूयॉर्क में रहते हैं. वह अपनी कहानियों में अकसर बंगाल की खाड़ी में स्थित मैंग्रोव जंगल और सुंदरवन जिक्र करते हैं. उनके उपन्यास द ग्लास पैलेस (2000), द हंगरी टाइड (2004), सी ऑफ पोपीज (2008), और हाल ही प्रकाशित जंगल नामा (2021) में प्रकृति से जुड़ी कई बातें शामिल हैं.

जंगलनामा में सुंदरवन के बारे में कहानी है. इसमें बताया गया है कि आज यह संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्र, बाघों और वनस्पतियों सहित कई दुर्लभ जीवों का घर ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से गंभीर खतरे में है.

शायद यही कारण है कि घोष जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं के प्रभावों को बेहतर तरीके से समझते और महसूस करते हैं. विशेष रूप से बाढ़ के बारे में, जिससे दक्षिण एशियाई देशों में रहने वाले करोड़ों लोग हर साल प्रभावित होते हैं.

अमिताभ घोष ने न्यूयॉर्क के अपने अपार्टमेंट से बात करते हुए कहा, "जर्मनी में हाल में आई बाढ़ की वजह से प्रभावित हुए लोगों की टिप्पणियों से मुझे काफी ज्यादा चोट पहुंची. उदाहरण के लिए, एक महिला ने कहा कि आपको पता है, हम जर्मनी में ऐसा कुछ होने की उम्मीद नहीं करते हैं. ऐसे हालात तो गरीब देशों में होते हैं."

जलवायु परिवर्तन हकीकत है

घोष कहते हैं कि इस तरह टिप्पणियों से पता चलता है कि लोग यह नहीं समझ पा रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन हकीकत है. वह कहते हैं, "एक चीज स्पष्ट तौर पर दिख रही है कि हम ऐसे युग में जी रहे हैं जहां इतिहास की हमारी अपेक्षाएं वाकई लागू नहीं होती है. उदाहरण के लिए, यह अकसर कहा जाता है कि संपन्नता और बेहतर बुनियादी ढांचा भीषण प्राकृतिक आपदाओं से लोगों का बचाव करेगा. हालांकि, मुझे लगता है कि हकीकत इससे अलग है."

घोष अपने तर्क के लिए एक और उदाहरण देते हैं. वह ये है कि दुनिया के सबसे अमीर इलाकों में से एक उत्तरी कैलिफोर्निया के जंगलों में अकसर भीषण आग लग रही है. वहां के लोगों को आग की वजह से अपना घर छोड़कर दूसरी जगहों पर पलायन करना पड़ रहा है.

घोष यह भी कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन केवल उन प्राकृतिक आपदाओं तक सीमित नहीं है जिनकी वजह से लोगों की जान जाती है. वह कहते हैं, "यह इस स्तर तक प्रभावित कर सकता है जितना कि कैलिफोर्निया के अंगूर के बागों के मालिक शिकायत करते हैं कि धुंए के कारण उनका कारोबार बर्बाद हो रहा है."

देखें, जर्मनी में बाढ़ से पहले और बाद के हालात

घोष का मानना है कि कल्पना को हकीकत के साथ जोड़ने की जरूरत है. 2016 में अपनी किताब ‘द ग्रेट डिरेंजमेंट: क्लाइमेट चेंज ऐंड द अनथिंकेबल' के प्रकाशन के बाद से घोष सक्रिय तौर पर जलवायु परिवर्तन पर चर्चा कर रहे हैं, खासकर कहानियां लिखकर.

जब कल्पना हकीकत बन जाए

हाल के दिनों में जलवायु से जुड़े खतरों पर ध्यान केंद्रित करने वाले ऐतिहासिक उपन्यास लिखे गए हैं. इनमें जॉर्ज टर्नर का द सी ऐंड समर (1987), जेम्स ब्रैडली का क्लैड (2015), बारबरा किंग्सोल्वर का फ्लाइट बिहेवियर (2012), मार्गरेट एटवुड का ऑरिक्स ऐंड क्रैक (2003) और द ईयर ऑफ द फ्लड (2009), और रिचर्ड पावर का उपन्यास द ओवरस्टोरी (2018) शामिल हैं.

2019 में प्रकाशित हुई घोष की किताब ‘गन आइलैंड' ग्लोबल वॉर्मिंग और सुंदरवन में रासायनिक कचरे से खतरे में पड़ी मछली के प्रजातियों के बारे में है. हालांकि, घोष को अभी भी ग्लोबल वॉर्मिंग पर मौजूदा समय में होने वाले काल्पनिक कामों से समस्या है. ये काल्पनिक काम एक शैली हैं जिन्हें ईको-फिक्शन, क्लाइमेट फिक्शन या क्लि-फाई के तौर पर जाना जाता है.

घोष का तर्क है कि इसमें वर्तमान समय की प्राकृतिक आपदाओं को अनदेखा किया जाता है, जबकि वाकई में यह सब अभी हो रहा है. घोष कहते हैं, "मुझे वाकई में इस शैली से समस्या है. आप वास्तविकता को पूरी तरह झुठलाते हुए इसे अनदेखा करते हैं. आप इसे भविष्य में होने वाली किसी काल्पिनक घटना के तौर पर पेश करते हैं."

वीडियो देखें 02:09

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घोष उदाहरण के तौर पर बताते हैं, "न्यूयॉर्क शहर 2012 में एक भयानक चक्रवात की चपेट में आया था. इसे सैंडी तूफान नाम दिया गया था. इसने पूरे शहर को तबाह कर दिया था. न्यूयॉर्क शहर में बहुत सारे लेखक, कवि, फिल्म निर्माता, कलाकार आदि हैं, लेकिन आपको सैंडी तूफान के बारे में बहुत कम लिखा हुआ मिलेगा. वहीं, भविष्य में न्यूयॉर्क के डूबने के बारे में कई किताबें मिलेंगी."

वह कहते हैं, "इससे साफ पता चलता है कि लोग वास्तविकता में नहीं जी रहे हैं. हाल में जर्मनी में जो हुआ है वह वास्तविकता है. जर्मनी के लोग कहते हैं कि यह अविश्वसनीय है. वे इस पर विश्वास नहीं कर सकते, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ. जबकि, हकीकत यही है. यह अविश्वसनीय नहीं है. ऐसा हो रहा है."

पश्चिम का 'अहंकार'

घोष का मानना है कि पश्चिम के देशों ने उपनिवेशवाद और औद्योगीकरण के जरिए ग्लोबल वॉर्मिंग के मौजूदा संकट को पैदा किया है. इसका नतीजा है कि पूरी दुनिया में उपभोक्तावाद की नई संस्कृति पैदा हुई है और उत्पादन में वृद्धि हुई है. यही वजह है कि पश्चिमी देश लगभग हर पहलू में अंतरराष्ट्रीय नीति पर हावी हुए और कम विकसित देशों की संस्कृतियों की उपेक्षा की.

वह कहते हैं, "पश्चिम के देश अविश्वसनीय अहंकार और श्रेष्ठता की भावना से अलग-थलग पड़ गए हैं. इन देशों को दुनिया के बाकी हिस्सों से सीखने की जरूरत है. बांग्लादेश में हर साल मानसून में बाढ़ आती है, लेकिन यहां काफी कम लोग मरते हैं. वजह ये है कि लोगों को पता होता है कि बाढ़ कितनी खतरनाक हो सकती है और वे इससे बचने के लिए पहले से ही तैयारी कर लेते हैं."

घोष कहते हैं कि आखिरकार, जलवायु परिवर्तन की वजह से आने वाली आपदाओं की बढ़ती संख्या से यह स्पष्ट हो चुका है कि हम इंसान के तौर पर एक समान परिस्थितियों में रह रहे हैं. इसके बावजूद, कई देश इस हकीकत को मानने के लिए तैयार नहीं हैं. उन्हें अपनी आंखें खोलनी होंगी.

वह कहते हैं, "मुझे उम्मीद है कि जर्मनी में इस भयानक त्रासदी से लोगों ने जो सबक लिया है, वह यह है कि कोई भी बेपरवाह नहीं रह सकता. सभी इंसान अब एक तरह की समस्या का सामना कर रहे हैं. आप यह उम्मीद नहीं कर सकते हैं कि समृद्ध देश में रहने की वजह से आप पूरी तरह सुरक्षित हैं."

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