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समाजभारत

आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं से फिल्मोद्योग में दहशत का माहौल

प्रभाकर मणि तिवारी
३१ मई २०२२

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में बीते दो सप्ताह के दौरान छोटे परदे की तीन उभरती अभिनेत्रियों और एक मॉडल की आत्महत्या की घटनाओं से दहशत का माहौल है.

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Indien West Bengal | Bengali Filme
तस्वीर: Payel Samantha/DW

इनमें से ज्यादातर मामलों को फिल्मी दुनिया की चमक-दमक के नीचे पसरे अंधेरे की वजह से बढ़ते मानसिक अवसाद से जोड़ कर देखा जा रहा है. हालांकि एकाध मामलों में असफल प्रेम प्रसंग को भी जिम्मेदार बताया जा रहा है. लेकिन इन चारों की मौत की मूल वजह मानसिक अवसाद ही है. अचानक होने वाली इन घटनाओं ने फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों के अलावा मनोवैज्ञानिकों को भी चिंता में डाल दिया है.

कैसे हुई शुरुआत

सबसे पहले छोटे पर्दे की उभरती अभिनेत्री पल्लवी दे ने अपने घर पर गले में फंदा डालकर आत्महत्या कर ली. बीती 15 मई को उनका शव बरामद किया गया था. तब वे अपने लिव-इन पार्टनर सांग्निक चक्रवर्ती के साथ रह रही थीं. लेकिन उनका शव बरामद होने के बाद परिजनों ने हत्या का आरोप लगाया था. पल्लवी के पिता की शिकायत के आधार पर पुलिस ने दो दिनों बाद सांग्निक को गिरफ्तार कर लिया. फिलहाल पल्लवी छोटे परदे के बांग्ला धारावाहिक मन माने ना (मन नहीं मानता) में मुख्य भूमिका निभा रही थीं. वह आमी सिराजेर बेगम (मैं सिराज की बेगम हूं), रेशमा जापी, कुंजो छाया और सरस्वती प्रेम जैसे धारावाहिकों में भी अहम भूमिका निभा चुकी थीं.

पल्लवी की मौत पर एक अन्य अभिनेत्री विदिशा दे मजूमदार ने हैरत जताते हुए अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा था, ”यह क्या है? मैं इस पर भरोसा नहीं कर पा रही हूं.” लेकिन दस दिन बाद यानी 25 मई को विदिशा ने भी आत्महत्या कर ली. उनका शव भी कोलकाता के दमदम इलाके में स्थित फ्लैट से बरामद किया गया. हालांकि मौत के बाद छन कर आने वाली खबरों में कहा गया है कि उसने अपने समलैंगिक पार्टनर, जिसे वह अपनी पत्नी बताती थी, के कारण आत्महत्या की है. लेकिन पुलिस या विदिशा के घरवालों ने इसकी पुष्टि नहीं की है.

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आत्महत्या का रास्ता चुनने के कारणों में मानसिक अवसाद भी तस्वीर: Nerijus Liobe/Zoonar/picture alliance

उसके बाद 27 मई को विदिशा की एक नजदीकी मित्र मंजूषा नियोगी ने भी इसी तरीके से आत्महत्या कर ली. मंजूषा बांग्ला धारावाहिक कांची में काम कर रही थी. उसकी मां ने बताया था कि विदिशा की मौत के बाद मंजूषा गहरे मानसिक अवसाद में थी. वह लगातार विदिशा के बारे में ही बात कर रही थी.

अब ताजा मामले में सरस्वती दास नामक एक उभरती मॉडल ने भी इसी तरीके से जान दे दी है. उसने इसी साल दसवीं की परीक्षा दी थी और साथ ही मॉडलिंग की दुनिया में पांव जमाने का भी प्रयास कर रही थी. सरस्वती की दादी जयंती बताती है, "शनिवार को वह मेरे पास सोई थी. सुबह उठने पर वह बिस्तर पर नहीं थी. मैंने तलाश शुरू की तो देखा वह दूसरे कमरे में फंदे से लटक रही है. पुलिस के मुताबिक, सरस्वती नाकाम प्रेम प्रसंग के कारण मानसिक अवसाद में थी.”

कोलकाता पुलिस के एक अधिकारी कहते हैं, "मंजूषा मनोरंजन उद्योग में खुद को जल्दी स्थापित करना चाहती थी. लेकिन संभवतः उम्मीद के अनुरूप कामयाबी नहीं मिलने के कारण वह अवसाद में थी.”

उस अधिकारी का कहना था कि मंजूषा ने अपने पति व घरवालों से भी मानसिक अवसाद का जिक्र किया था. वह पहले भी आत्महत्या का प्रयास कर चुकी थी. लेकिन तब एक मित्र ने उसे बचा लिया था.

चमक-दमक के नीचे अंधेरा

एक पखवाड़े के भीतर हुई इन चार मौतों ने बांग्ला फिल्म और धारावाहिकों की दुनिया को कठघरे में खड़ा कर दिया है. कहा जा रहा है कि बाहरी चमक से प्रभावित होकर तमाम लड़कियां इसकी ओर आकर्षित होती हैं. लेकिन भीतर की कालिख और कीचड़ देख कर उनके सपने जल्दी ही टूट जाते हैं. पहले उनको सिर्फ इसकी चमक-दमक ही नजर आती है

बांग्ला अभिनेत्री इंद्राणी हालदार कहती हैं, "शुरुआत में फिल्मोद्योग कइयों के लिए निर्मम साबित हो सकता है. कई बार लंबे समय तक काम नहीं मिलता. वह दौर बेहद मुश्किल होता है. मैं भी उससे गुजर चुकी हूं. लेकिन मेरे मन में कभी आत्महत्या का ख्याल तक नहीं आया था.”

फैशन डिजाइनर अग्निमित्रा पाल कहती हैं, "फिल्मी दुनिया की चमक-दमक से प्रभावित होकर इसमें कदम रखने वाले युवा अचानक मिले नाम, दाम और व्यस्तता को पचा नहीं पाते. कोविड के कारण ज्यादातर लोगों के लिए काम का अकाल पड़ गया था क्योंकि नई फिल्में या धारावाहिक नहीं बन रहे थे. इससे खास कर नए लोगों में हताशा और असुरक्षा की भावना पैदा हो गई.”

मानसिक अवसाद की समस्या

अब फिल्मी दुनिया से जुड़े लोगों के अलावा विभिन्न गैर-सरकारी संगठन भी मानसिक अवसाद के लक्षणों पर निगाह रखने और समय पर इलाज करने की जरूरत बता रहे हैं. अग्निमित्रा पाल कहती हैं, "यह बेहद अहम है. ज्यादातर लोग मानसिक बीमारी को गंभीरता से नहीं लेते. यह धारणा बदलनी होगी.”

एक मॉडल शुभांगी कहती हैं, "प्रतिभावान लोगों के लिए काम की कमी नहीं है. लेकिन काम हमेशा सिर्फ प्रतिभा के आधार पर ही नहीं मिलता. ऐसे में जिनकी जान-पहचान नहीं है उनको ज्यादा काम नहीं मिल पाता. नतीजतन उनमें धीरे-धीरे मानसिक अवसाद की समस्या गंभीर हो जाती है. लेकिन आत्महत्या इस समस्या का हल नहीं है. नए लोगों को धैर्य के साथ सही मौके का इंतजार करना चाहिए.”

पेशे से मनोवैज्ञानिक डा. रीना घोष कहती हैं, "काम का दबाव, काम के घंटे का तय नहीं होना, ऊंची महत्वाकांक्षा और अक्सर किसी से समर्थन नहीं मिलने जैसे वजहें मानसिक अवसाद का कारण बन जाती हैं. कई लोग दबाव नहीं झेल पाने के कारण हार मान कर टूट जाते हैं. कई युवतियां घरवालों की मर्जी के खिलाफ जाकर इस पेशे को चुनती हैं. लेकिन कामयाबी नहीं मिलने पर यह सोच कर वे अवसादग्रस्त हो जाती हैं कि अब किस मुंह से घरवालों के पास जाऊंगी.”

मानसिक अवसाद वाले मरीजों के हित में काम करने वाले एक गैर-सरकारी संगठन के संयोजक मानस मुखर्जी कहते हैं, "कोई भी अचानक आत्महत्या नहीं करता. कुछ दिन पहले से ही इसका संकेत मिलने लगता है. अगर ऐसे लोगों पर नजदीकी निगाह रखी जाए तो कई जिंदगियां बचाई जा सकती हैं. ऐसे लोगों को आत्महत्या का रास्ता चुनने की बजाय संबंधित विशेषज्ञों से सलाह लेनी चाहिए.”