1. कंटेंट पर जाएं
  2. मेन्यू पर जाएं
  3. डीडब्ल्यू की अन्य साइट देखें
कुछ ऐसा दिखता है एचआईवी वायरस
तस्वीर: National Institutes of Health/StockTrek Images/imago

एड्स कार्यक्रम को पटरी पर लाने के लिए अरबों डॉलर की जरूरत

फ्रेड श्वॉलर
१२ अगस्त २०२२

साल 2021 में करीब 15 लाख लोग एचआईवी से पीड़ित हुए और यह संख्या अनुमान से दस लाख ज्यादा है. विशेषज्ञों का कहना है कि कोविड की वजह से एड्स कार्यक्रमों को नुकसान हुआ है जिन्हें वापस पटरी पर लाना होगा.

https://www.dw.com/hi/aids-need-billions-in-funding-to-avoid-deep-trouble/a-62791331

कोरोना महामारी ने लोगों के जीवन को बहुत ही कम समय में बहुत ज्यादा बदल दिया. बदलाव के इस क्रम में एचआईवी और एड्स के खिलाफ वैश्विक रणनीति भी शामिल है जिसमें हम काफी अच्छा काम कर रहे थे. जेनेवा में UNAIDS की इक्जीक्यूटिव डायरेक्टर विनी ब्यानिमा डीडब्ल्यू को भेजे एक ईमेल में लिखती हैं, "पश्चिम और मध्य अफ्रीका समेत कुछ कैरेबियाई देशों में संक्रमण में काफी गिरावट आ रही थी. दुनिया भर में करीब दो करोड़ साठ लाख एचआईवी पीड़ित लोगों का इलाज चल रहा है जो कि ज्यादातर गरीब देशों से आते हैं. यह एक ऐसी उपलब्धि है जिसे कुछ साल पहले तक असंभव समझा जाता था.”

एचआईवी संक्रमण की बढ़ती दर

UNAIDS ने जुलाई के आखिर में एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिससे पता चलता है कि 2021 में एचआईवी संक्रमण के मामलों में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है जो कि अनुमान से करीब दस लाख ज्यादा है. रिपोर्ट में इस बात का खासतौर पर उल्लेख हुआ है कि एचआईवी संक्रमण में यह बढ़ोत्तरी पूर्वी यूरोप, मध्य एशिया, मध्य पूर्व, उत्तरी अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों में हुई है. साल 2021 में एड्स की वजह से होने वाली मौतों की संख्या 6 लाख पचास हजार है. इसका मतलब यह हुआ कि एड्स की वजह से दुनिया भर में हर एक मिनट में एक से ज्यादा मौत हो रही है.

कनाडा में वर्ल्ड एड्स कॉन्फ्रेंस
कनाडा में वर्ल्ड एड्स कॉन्फ्रेंसतस्वीर: THE CANADIAN PRESS/Ryan Remiorz/empics/picture alliance

UNAIDS का कहना है कि संक्रमण दर इसलिए भी तेजी से बढ़ीं क्योंकि वैश्विक स्तर पर जिन संसाधनों का इस्तेमाल एड्स से बचाव पर खर्च हो रहा था उन्हें कोविड महामारी की ओर मोड़ दिया गया. UNAIDS के डिप्टी इक्जीक्यूटिव डायरेक्टर मैथ्यू कावनाघ कहते हैं, "कई देशों में, एड्स की बीमारी पर खर्च होने वाले संसाधनों को कोविड से लड़ने में खर्च किया जाने लगा. इससे कोविड से निपटने में तो काफी सहायता और सफलता भी मिली लेकिन एक ही समय पर कोविड और एड्स, इन दोनों पर ध्यान देना मुश्किल हो गया. इसका परिणाम यह हुआ कि एड्स बचाव कार्यक्रम बुरी तरह प्रभावित हुए.”

लेकिन एचआईवी संक्रमण दर को प्रभावित करने में लैंगिक, आर्थिक और नस्लीय असमानताएं अपनी भूमिका निभा रही हैं. मसलन, नए संक्रमित लोगों को देखा जाए तो महिलाएं और किशोर उम्र की लड़कियां, खासकर अफ्रीकी देशों की युवा पुरुषों की तुलना में ज्यादा संक्रमित हो रही हैं. अफ्रीकी देशों में युवा महिलाओं में एचआईवी होने की संभावना तीन गुना ज्यादा होती है.

अमीर देशों में गोरे रंग वाले लोगों की तुलना में अन्य रंग वाले लोगों में एचआईवी की संक्रमण दर ज्यादा होती है. ये बातें अमेरिका और यूनाइटेड किंग्डम के लिए सही हैं जिसमें ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और अमेरिका के स्वदेशी समुदाय भी शामिल हैं. UNAIDS की रिपोर्ट से यह भी पता चला है कि पुरुषों के साथ यौन संबंध रखने वाले पुरुषों में एचआईवी का खतरा उन लोगों की तुलना में 28 गुना ज्यादा होता है जो समान उम्र के हैं और पुरुषों के साथ सेक्स नहीं करते हैं.

अफ्रीका के कई देशों में एचआईवी एक बड़ी मुश्किल है
अफ्रीका के कई देशों में एचआईवी एक बड़ी मुश्किल हैतस्वीर: BARBARA DEBOUT/AFP

एचआईवी रोकथाम के कुछ कार्यक्रम अब भी सफल हैं

ब्यानिमा कहती हैं कि कोविड के दौरान तमाम असफलताओं के बावजूद, एचआईवी कार्यक्रम चलते भी रहे और सफल भी होते रहे. मसलन, आइवरी कोस्ट, मलावी और केन्या में एंटीरिट्रोवायरल इलाज सफलतापूर्वक चलते रहे और इनकी वजह से इन देशों में नए एचआईवी संक्रमण में काफी गिरावट दर्ज की गई.

ब्यानिमा कहती हैं, "कोविड-19 की वजह से कई रुकावटों के बावजूद दक्षिण अफ्रीका और नाइजीरिया जैसे देश एचआईवी संक्रमण दर को कम करने में सफल रहे. दूसरी ओर, एड्स कार्यक्रमों कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग, प्रयोगशालाएं और सार्वजनिक स्वास्थ्य शिक्षा की वजह से कोविड-19 से निपटने में भी मदद मिली. एड्स के उपचार के लिए हुए निवेश ने यह साबित कर दिया कि किसी भी दूसरी महामारी से बचाव में यह कितना फायदेमंद है. इसका फायदा न सिर्फ गरीब देशों को बल्कि दुनिया के सबसे अमीर देशों को भी मिला है.”

एचआईवी के रोकथाम की नई दवा

कावनाघ बताते हैं कि एचआईवी की रोकथाम के लिए एक नई दवा आई है जो कि लंबे समय तक असर करती है. केबोटीग्राविर या CAB-LA नाम की यह दवा इंजेक्शन के तौर पर दी जाती है और एचआईवी संक्रमण से बचाव के लिए इसे हर दो-तीन महीने पर लिया जा सकता है. यह दवा एचआईवी जीनोम को ब्लॉक कर देती है, जिससे वायरस मानव डीएनए में प्रवेश नहीं कर पाता है और नुकसान पहुंचाने में असमर्थ हो जाता है. तो इस दवा की वजह से यह न तो शरीर में फैल सकता है और न ही नुकसान पहुंचा सकता है.

जानकारों को उम्मीद है कि CAB-LA का उत्पादन PrEP यानी प्री-एक्सपोजर प्रोफाइलिक्सिस की सफलता पर निर्भर करेगा. PrEP एक गोली है जो कि सेक्स अथवा इंट्रावेनस ड्रग के इस्तेमाल से होने वाले एचआईवी संक्रमण को कम करती है. केन्या में हुए एक नए शोध से पता चलता है कि PrEP की वजह से एचआईवी संक्रमण की दर में 74 फीसद तक की कमी आई है. लेकिन दिक्कत यह है कि यह दवा सिर्फ पुरुषों के मामले में ही प्रभावी है. शोध बताते हैं कि PrEP की तुलना में CAB-LA बेहतर दवा साबित हो सकती है क्योंकि यह पुरुषों और महिलाओं दोनों में ही प्रभावी है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ ने देशों को सलाह दी है कि वो CAB-LA को एचआईवी संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए बनाई गई अपनी रणनीति में शामिल करें. लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि CAB-LA बहुत ही महंगी दवा है और सभी लोग इसे खरीद नहीं सकते हैं. कावनाघ कहते हैं, "यदि इस दवा की कीमत कम और मध्यम आय वर्ग के लोगों की पहुंच में आ जाती है तो हम इसे दुनिया भर में उन लोगों तक पहुंचा सकते हैं जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है. इससे असमानता को भी कम किया जा सकता है.”

जानकारों की निगाह फिलहाल एचआईवी की वैक्सीन पर भी है क्योंकि मार्च 2022 में एमआरएनए वैक्सीन के तीन ट्रायल हो चुके हैं.

एचआईवी की दवाई को तरसे मरीज

राजनीतिक इच्छाशक्ति

ब्यानिमा और कावनाघ का कहना है कि HIV/AIDS कार्यक्रमों को नए सिरे से समर्थन की जरूरत है, खासकर राजनीतिक समर्थन की. कावनाघ कहते हैं, "एचआईवी की रोकथाम के लिए नई तकनीक और रणनीति के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है ताकि हम इसके लिए फंड जुटा सकें.”

एड्स, टीबी और मलेरिया से लड़ने के लिए वैश्विक स्तर पर 18 अरब डॉलर के फंड की मांग की जा रही है ताकि इन बीमारियों से बेहतर तरीके से लड़ा जा सके. यदि अगले कुछ महीनों में दुनिया के तमाम देश इतनी धनराशि मुहैया करा देते हैं तो यह बड़ी सफलता मानी जाएगी क्योंकि दुनिया के तमाम देश इस वक्त आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं.

कावनाघ कहते हैं, "यदि वे ऐसा करते हैं तो हम एचआईवी के लिए चलाए जा रहे कार्यक्रमों को वापस पटरी पर लाने में सक्षम हो जाएंगे, लेकिन यदि ऐसा नहीं हो पाता है तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी. तब हमें एक और महामारी का सामना करना पड़ेगा. यह कह पाना मुश्किल है कि इसे कितनी जल्दी इतनी प्रमुखता से लिया जाता है.” 

डीडब्ल्यू की टॉप स्टोरी को स्किप करें

डीडब्ल्यू की टॉप स्टोरी

इटली में संसदीय चुनाव

इटली में आम चुनाव, यूरोप का इम्तिहान

डीडब्ल्यू की और रिपोर्टें को स्किप करें

डीडब्ल्यू की और रिपोर्टें

होम पेज पर जाएं