भारत में अलग क्यों है लड़के और लड़की की शादी की उम्र | भारत | DW | 22.08.2019
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भारत

भारत में अलग क्यों है लड़के और लड़की की शादी की उम्र

दिल्ली उच्च न्यायालय में दाखिल एक याचिका में कहा गया है कि भारत में लड़की और लड़के की शादी के लिए न्यूनतम उम्र को समान यानी 21 साल किया जाना चाहिए. भारत में धर्म के हिसाब से शादी की उम्र अलग-अलग है.

फिलहाल देश में लड़कियों के लिए शादी की न्यूनतम उम्र 18 साल और लड़कों के लिए शादी की न्यूनतम उम्र 21 साल है. याचिकाकर्ता भाजपा नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय ने विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा है कि 20 साल की उम्र से पहले शादी करने पर गर्भवती होने की स्थिति में यह महिला और उसके बच्चे के लिए खतरनाक साबित होता है. साथ ही कम उम्र में शादी होने से लड़कियों की पढ़ाई बीच में छूट जाती है और उन्हें कई सामाजिक और व्यक्तिगत समस्याओं का सामना करना पड़ता है. अपनी याचिका में उन्होंने कहा है कि शादी की उम्र में अंतर का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. यह रूढ़िवाद को बढ़ावा देता है. साथ ही यह संविधान में दिए गए समानता के अधिकार का भी उल्लंघन है. दिल्ली हाईकोर्ट ने भारत सरकार को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है.

यूनिसेफ के आंकड़ों के मुताबिक भारत में 27 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 साल की उम्र से पहले और सात प्रतिशत लड़कियों की शादी 15 साल की उम्र से पहले हो जाती है. भारत के कुछ राज्यों और समुदायों में बाल विवाह होना अब भी आम है. बाल विवाह को रोकने के लिए भारत में कड़े कानून हैं. लेकिन फिर भी ऐसे मामले अकसर सामने आते रहते हैं. विवाह की न्यूनतम उम्र को लेकर भारत में लंबी बहस चलती आई है. अंग्रेजों के समय में शादी को लेकर पहली बार भारत में कानून बने थे. इन कानूनों में समय-समय पर बदलाव कर इसे 21 और 18 साल की उम्र तय किया गया है.

अदालत में शादी के हैं तीन प्रकार

सुप्रीम कोर्ट में वकील प्रज्ञा पारिजात सिंह के मुताबिक, "भारत में कानूनी तौर पर तीन प्रकार माने गए हैं. पहली है वॉइड मैरिज जिसे शून्य विवाह कहा जाता है. ये एक ऐसी परिस्थिति है जिसमें हुई शादी पूरी तरह अमान्य होती है. इसका कोई कानूनी आधार नहीं होता है. जैसे कानूनी तौर पर मान्य निम्नतम आयु से कम उम्र में किए गए विवाह अमान्यकरणीय होते हैं. अदालत में इनकी वैधता नहीं होती. बाल विवाह इसी के तहत आते हैं. वैलिड मैरिज या मान्य विवाह- कानूनी तौर पर सारी जरूरतों को पूरा कर रहीं शादियां इसके तहत आती हैं. तीसरा स्वरूप वॉइडेबल मैरिज यानी अमान्यकरणीय विवाह. ये एक ऐसी परिस्थिति होती है जिसमें विवाह के आधार शून्य विवाह वाले हो सकते हैं लेकिन परिस्थितियों को देखने के बाद कोर्ट तय करता है कि यह वॉइड मैरिज है या वैलिड मैरिज है."

इतिहास क्या कहता है

सन 1860 में बने इंडियन पीनल कोड में 10 साल से कम उम्र की बच्ची के साथ शारीरिक संबंध बनाना गैरकानूनी बनाया गया. लेकिन शादी को लेकर इसमें कोई जिक्र नहीं था. भारत में शादी की उम्र को लेकर पहले धर्म के आधार पर कानून बनाए गए थे. इंडियन क्रिश्चियन मैरिज एक्ट 1872 में ईसाइयों के लिए लड़के की न्यूनतम उम्र 16 साल और लड़की की न्यूनतम उम्र 13 साल तय की गई. 1875 में आए मेजोरिटी एक्ट में पहली बार बालिग होने की उम्र 18 साल तय की गई थी. इसमें लड़के और लड़की दोनों की उम्र 18 साल थी. लेकिन शादी की न्यूनतम उम्र को लेकर इसमें कोई जिक्र नहीं था. 1927 में 'एज ऑफ कंसेट बिल' लाया गया जिसमें 12 साल से कम उम्र की लड़की की शादी को प्रतिबंधित कर दिया गया. 1929 में पहली बार शादी की उम्र को लेकर कानून बनाया गया. इस कानून को बाल विवाह निरोधक कानून 1929 के नाम से जाना जाता है. इस कानून के मुताबिक शादी के लिए लड़के की न्यूनतम आयु 18 साल और लड़की की न्यूनतम आयु 16 साल तय की गई.

मुस्लिमों ने इस कानून का विरोध किया. विरोध के बाद मुस्लिमों के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड शरियत एप्लिकेशन एक्ट 1937 आया. इस एक्ट के मुताबिक मुस्लिम लड़कियों की शादी की कोई न्यूनतम उम्र नहीं होगी. मासिक धर्म शुरु होने की उम्र पर पहुंचने के बाद मुस्लिम लड़कियों की इच्छा के मुताबिक किसी भी उम्र पर शादी की जा सकेगी. दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका लगाने वाले अश्विनी उपाध्याय के मुताबिक भारत में मुस्लिम लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र 15 साल है क्योंकि भारत में इसे मासिक धर्म शुरु होने की उम्र माना गया है. प्रज्ञा सिंह के मुताबिक अगर किसी मुस्लिम लड़की की शादी 15 से 18 साल की उम्र के बीच होती है और वह इस शादी के लिए रजामंद नहीं है तो शादी के खिलाफ कोर्ट जा सकती है और इसे वॉइड मैरिज माना जाएगा. दिल्ली हाईकोर्ट ने 2012 में एक 15 साल की लड़की की अपनी मर्जी से की गई शादी पर फैसला देते हुए कहा था कि इस्लामिक कानून के मुताबिक लड़की मासिक धर्म शुरु होने के बाद अपनी इच्छा के मुताबिक शादी कर सकती है. यह एक वॉइडेबल मैरिज का मामला था जिसे कोर्ट ने वैलिड मैरिज माना.

1955 में नया हिंदू मैरिज एक्ट बनाया गया. यह कानून हिंदुओं के साथ जैन, बौद्ध और सिखों पर भी लागू हुआ करता था. 2012 में सिखों के लिए अपना अलग आनंद मैरिज बिल लागू किया गया. हिंदू मैरिज एक्ट के मुताबिक शादी के लिए लड़के की निम्नतम आयु 18 साल और लड़की की निम्नतम आयु 15 साल होना जरूरी था. पारसी मैरिज एक्ट के मुताबिक लड़के की उम्र 18 और लड़की की उम्र 15 साल होनी चाहिए. 1978 में बाल विवाह कानून में संशोधन किया गया. इसमें लड़के की शादी की न्यूनतम उम्र 21 साल और लड़की की शादी की न्यूनतम उम्र 18 साल कर दी गई. यह कानून सभी धर्मों पर लागू होता है. अश्विनी उपाध्याय ने हिंदू मैरिज एक्ट, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड एक्ट, क्रिश्चियन मैरिज एक्ट और पारसी मैरिज एक्ट में बदलाव के लिए याचिका दायर की है. याचिका में उन्होंने मांग की है कि सभी धर्मों में शादी की उम्र को लड़के और लड़कियों के लिए 21 साल करने की मांग की है.

पहले भी बहस का मुद्दा रही है उम्र

शादी की उम्र भारत में पहले भी बहस का मुद्दा रही है. 2018 में लॉ कमीशन ने भी तर्क दिया था कि शादी की उम्र में अंतर रखना पति के उम्र में बड़े और पत्नी के छोटे होने के रूढ़िवाद को बढ़ावा देता है. इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. उपाध्याय ने उम्र के इस अंतर के भेदभाव को संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन बताया है. अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार और अनुच्छेद 21 सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है. उपाध्याय की याचिका पर कोर्ट 30 अक्टूबर को फिर सुनवाई करेगा.

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