महिलाओं से गर्भपात का अधिकार छीनती सरकारें | दुनिया | DW | 23.10.2020
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दुनिया

महिलाओं से गर्भपात का अधिकार छीनती सरकारें

अमेरिका के चुनावों में यह मुद्दा गर्म है तो कई लैटिन अमेरिकी देशों में भी इसे लेकर आंदोलन चल रहे हैं. अब पोलैंड जैसे यूरोपीय देश में संवैधानिक ट्रिब्यूनल ने जन्मजात दोष वाले भ्रूण के गर्भपात को भी असंवैधानिक माना है.

मार्च 2018 में भी गर्भपात के कानूनों में सख्ती लाने की सरकार की योजना के खिलाफ हुए थे प्रदर्शन.

मार्च 2018 में भी गर्भपात के कानूनों में सख्ती लाने की सरकार की योजना के खिलाफ हुए थे प्रदर्शन.

पोलैंड की संवैधानिक ट्राइब्यूनल ने फैसला सुनाया है कि अजन्मे बच्चे में गंभीर जन्मजात विकृति की आशंका होने पर भी उसका गर्भपात करना संविधान के खिलाफ माना जाएगा. बीते एक साल में देश में जितने भी कानूनी गर्भपात हुए उनमें से लगभग सभी में इसे ही गर्भ गिराने की वजह बताया गया गया था.

इस आदेश के बाद पोलैंड में केवल वही गर्भपात वैध माने जाएंगे जिनमें या तो गर्भ रखने से मां की सेहत या जान का खतरा हो या फिर बलात्कार या इनसेस्ट (परिवार के किसी सदस्य से शारीरिक संबंध) जैसी हरकत के कारण गर्भ ठहरा हो. इस आदेश के पहले ही कैथोलिक-बहुल देश पोलैंड के गर्भपात कानून पूरे यूरोप में सबसे सख्त माने जाते थे.

मानवाधिकार संगठनों की नाराजगी

इस ताजा फैसले पर अंतरराष्ट्रीय संस्थानों और मानवाधिकार संगठनों ने कड़ी प्रतिक्रिया जताई है. यूरोप के मानवाधिकार परिषद की प्रमुख दुनया मियातोविच ने इस आदेश को गर्भपात पर "लगभग पूरा प्रतिबंध और मानवाधिकारों का उल्लंघन" बताया है.

सेंटर फॉर रिप्रोडक्टिव राइट्स में यूरोप की प्रमुख लिया हॉक्टर ने इसे "महिलाओं की सेहत और जान को खतरे में डालने वाला" बताया है. उन्होंने इसे पोलिश महिलाओं के लिए "यौन अधिकारों और प्रजनन से जुड़ी स्वास्थ्य सेवाओं की दिशा में पीछे धकेलने वाला" बताया.

एमनेस्टी इंटरनेशनल सुरक्षित गर्भपात के अधिकार को मानवाधिकार का मुद्दा मानता है. अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार  कानून के अनुसार, हर किसी को जीवन जीने का, स्वास्थ्य का अधिकार है साथ ही हर किसी को हिंसा, भेदभाव, प्रताड़ना और अमानवीय व्यवहार से मुक्त होने का भी अधिकार है. एमनेस्टी इंटरनेशनल की सलाहकार एस्थर मेजर इस आदेश को "क्रूर" बताते हुए कहती हैं कि इससे उन "गरीब महिलाओं पर खासतौर पर बहुत बुरा असर पड़ेगा जो गर्भपात के लिए देश से बाहर यात्रा नहीं कर सकतीं."

Polen Protest gegen PIS-Regierung

मई 2020 के एक विरोध प्रदर्शन में सत्ताधारी दल पीआईएस के कदमों पर नाराजगी जताती एक महिला.

यूरोप से दूर जाता पोलैंड

पोलैंड में आ रहे ऐसे बदलावों के कारण यह देश यूरोप के साझा मूल्यों से और दूर जाता नजर आ रहा है. पूरे यूरोपीय संघ में छोटे से देश माल्टा के अलावा केवल पोलैंड में ही अबॉर्शन को लेकर इतने सख्त कानून हैं. इसमें देश की सत्ताधारी कंजर्वेटिव 'लॉ एंड जस्टिस' पार्टी की महती भूमिका निभा रही है जो पिछले पांच सालों से लगातार ऐसे कई कदम उठा रही है.

गर्भपात के अधिकारों को सीमित करना पार्टी का लंबे समय से मकसद रहा है. हालांकि पहले के कुछ कानूनों और जनता के विरोध के कारणवह अब तक सफल नहीं हो पाए थे. दिसंबर 2019 में एक बार फिर दक्षिणपंथी सांसदों के एक समूह ने संवैधानिक ट्रिब्यूनल से गंभीर जन्मजात कमियों वाले भ्रूण के गर्भपात से जुड़े मामलों पर फैसला सुनाने की मांग की थी.

सख्ती का समर्थन करने वाले "स्टॉप अबॉर्शन" नाम के एक सार्वजनिक अभियान की सदस्य काया गोडेक का कहना है कि "आज पोलैंड पूरे यूरोप के लिए एक मिसाल बन गया है, बल्कि पूरे विश्व के लिए एक मिसाल है." यह आदेश देने वाले ट्रिब्यूनल के अधिकतर जज सत्ताधारी दल के ही चुने हुए हैं लेकिन पोलैंड की सरकार इस फैसले पर असर डालने की बात से इनकार करती है.

भारत में कैसे हैं गर्भपात कानून 

भारत में फिलहाल महिलाओं को गर्भधारण के 24 हफ्तों तक कानूनी रूप से गर्भपात करवाने का अधिकार देने की तैयारी है. इसी साल की शुरुआत में एक नए विधेयक को मंजूरी मिली जिसके अनुसार दो चिकित्सकों की सलाह पर 24 हफ्तों तक गर्भपात का प्रावधान होगा. फिलहाल इसके लिए 20 सप्ताह की समयसीमा है और किसी खास मामले में गर्भपात से पहले अदालत से आज्ञा लेनी पड़ती है.

'मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (अमेंडमेंट) बिल, 2020' में बदलाव की मांग की शुरुआत बॉम्बे हाईकोर्ट से हुई थी, जब तीन महिलाओं ने याचिका दायर कर 20 हफ्तों के बाद भी गर्भपात कराने की अनुमति देने की मांग की थी, जो उन्हें दे दी गई थी. इस मामले के बाद मद्रास हाई कोर्ट ने भारत सरकार से मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेंग्नेंसी एक्ट, 1971 में संशोधन करने के लिए कहा था, जिसका नतीजा कानून में बदलाव के रूप में दिखेगा.

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कहां है पोलैंड से भी बुरा हाल

कुछ लैटिन अमेरिकी देशों में आज भी महिलाओं के शरीर और उसके फैसलों से जुड़े बेहद कड़े कानून हैं. इनमें अल सल्वाडोर जैसे देश के सख्त गर्भपात कानून भी शामिल हैं जिसके एक ऐतिहासिक मामले में सजा काट रही महिला को हाल ही में रिहा किया गया. अदालत ने उसे गर्भपात के दोष में 30 साल की सजा सुनाई थी जिसे बाद में घटा कर 10 साल कर दिया गया था.

यहां की ज्यादातर आबादी भी कैथोलिक ईसाई धर्म को मानती है और धार्मिक मान्यताओं के कारण ही इसके गर्भपात कानून दुनिया के सबसे सख्त कानूनों में से एक हैं. पोलैंड से भी सख्त यहां के कानून में किसी महिला को तब भी गर्भ गिराने की अनुमति नहीं है जब बलात्कार या इनसेस्ट के कारण उसका गर्भ ठहरा हो या फिर भले ही गर्भावस्था से उसकी जान जाने का खतरा हो.

वैसे तो कानून में केवल गर्भपात के लिए आठ साल की अधिकतम सजा का प्रवधान है लेकिन कई मामलों में देखा गया है कि होमीसाइड यानि जानबूझ कर बच्चे को मारने का आरोप जोड़ कर महिलाओं को 30 से 60 साल तक की सजा सुनाई जाती है. हर साल केवल अल सल्वाडोर में औसतन 25,000 महिलाएं बलात्कार के कारण गर्भवती होती हैं. इनमें से ज्यादातर को किसी तरह छुप कर गर्भपात की व्यवस्था करनी पड़ती है, जो कइयों के लिए जानलेवा साबित होता है. इन तमाम कारणों से विश्व भर के मानवाधिकार संगठन देशों से लड़कियों और महिलाओं के सेक्स और प्रजनन के जुड़े अधिकारों को सुधारने की मांग करते रहे हैं लेकिन इसमें उन्हें या दुनिया की दूसरी महिलाओं को अब तक बहुत कम सफलता हाथ लगी है.

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