एक फ्लाइट जो कहीं नहीं जाएगी, आप टिकट खरीदेंगे? | दुनिया | DW | 14.09.2020

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दुनिया

एक फ्लाइट जो कहीं नहीं जाएगी, आप टिकट खरीदेंगे?

कोरोना महामारी ने बहुत से कारोबारों पर असर डाला है. पर्यटन और विमान सेवा तो खास तौर से इसकी चपेट में आया है. सिंगापुर एयरलाइंस ने "नो डेस्टिनेशन" यानी कहीं न जाने वाली फ्लाइट का टिकट बेचने का फैसला किया है.

स्ट्रेट टाइम्स ने खबर दी है कि कोविड-19 का दबाव झेल रही सिंगापुर एयरलाइंस कहीं न जाने वाली उड़ान शुरू करने पर विचार कर रही है. ये उड़ान अगले महीने से शुरू होगी. विमान चांगी एयरपोर्ट से उड़ान भरेगा और वहीं लैंड भी करेगा. एयरलाइंस सूत्रों के हवाले से अखबार ने कहा है कि घरेलू यात्रियों के लिए ऑफर की जाने वाली नो डेस्टिनेशन उड़ानों के साथ होटल में रहने और एयरपोर्ट पर खरीदारी करने के वाउचर के पैकेज ऑफर किए जा सकते हैं. हर उड़ान तीन घंटे की होगी. एक सर्वे में करीब 75 फीसदी यात्रियों ने नो डेस्टिनेशन उड़ानों के टिकट खरीदने की इच्छा जताई है.

दबाव में एयरलाइंस

दुनिया भर में एयरलाइनों को इस समय कोरोना महामारी के कारण लागू प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है. इन प्रतिबंधों के कारण अंतरराष्ट्रीय ट्रैवल तकरीबन रुका हुआ है. राष्ट्रीय प्रतिबंधों के अलावा दूसरे देशों के प्रतिबंध हैं, जिनकी वजह से कारोबारी यात्री भी कोई योजना नहीं बना पा रहे हैं और ज्यादातर काम ऑनलाइन संसाधनों से करने की कोशिश कर रहे हैं.

सिंगापुर एयरलाइंस बहुत लोकप्रिय एयरलाइंस है और कंपनी में सिल्क एयर और बजट एयरलाइंस स्कूट भी शामिल है. कंपनी इस समय मांग में कमी के कारण कोरोना महामारी शुरू होने के पहले की क्षमता की सिर्फ 7 फीसदी उड़ानें चल रही हैं. कंपनी ने 4,300 कर्मचारियों की छंटनी करने की घोषणा की है.

सिंगापुर एयरलाइंस दुनिया की पहली एयरलाइंस नहीं है जिसने कहीं न जाने वाली उड़ानें चलाने का फैसला किया है. इससे पहले जापान की ऑल निप्पन एयरलाइंस भी 90 मिनट की साइट सीइंग उड़ान चला चुकी है. इस उड़ान के लिए उसने एयरबस के ए 380 विमानों का इस्तेमाल किया जो सिर्फ लंबे और व्यस्त रूटों पर चलाए जाते हैं और आम यात्रियों को दुनिया के सबसे बड़े विमान से यात्रा का मौका नहीं मिलता.

Deutschland, Airbus A321 geparkte Flugzeuge der Lufthansa

160 देशों के लिए यात्रा चेतावनी

सरकारी मदद से राहत

कोरोना की वजह से मांग में भारी कमी के कारण दुनिया भर की एयरलाइंस दबाव में हैं. जर्मन विमान कंपनी लुफ्थांसा तो पूरे ए 380 फ्लीट को रिटायर करने पर विचार कर रही है. इसी तरह वह बोइंग 747-400 और एयरबस ए 340 फ्लीट को भी रिटायर करना चाहती है. लुफ्थांसा के पास इस समय 14 ए 380 विमान हैं जिनमें से 6 को पहले ही फ्लीट से निकाला जा चुका है जबकि मांग नहीं होने के कारण बाकी 8 को भी प्लीट से निकाल दिया जाएगा. लुफ्थांसा ने पहले ही कह दिया है वह कम से कम 2022 तक उनका इस्तेमाल नहीं करेगी. इससे पहले एयर फ्रांस ने भी ए 380 को फ्लीट से हटाने का फैसला कर लिया है.

जर्मनों को कारोबारी यात्राओं और पर्यटन का चैंपियन माना जाता है. लेकिन कोरोना महामारी और सरकार की यात्रा चेतावनियों के कारण शुरू में विमानन कारोबार पूरी तरह ठप्प हो गया था, लेकिन अब ढील दिए जाने के साथ विमानन उद्योग फिर से ग्राहकों को लुभाने की कोशिश कर रहा है. लुफ्थांसा को बचाने के लिए जर्मन सरकार उसे 9 अरब यूरो की मदद दे रही है. कोरोना से पहले जर्मनी की राष्ट्रीय एयरलाइंस फायदे में चल रही थी. उसे स्वस्थ कंपनी माना जाता है और कंपनी में 138,000 लोग काम करते हैं. अब आर्थिक दिक्कतों के कारण हजारों नौकरियां खतरे में हैं.

कोरोना महामारी का असर भारत की राष्ट्रीय एयरलाइंस एयर इंडिया पर भी हुआ है. घाटे में चलने वाली कंपनी को सरकार बेचना चाहती है. सरकार ने इसके लिए बोली लगाने की तारीख 30 अक्तूबर तक बढ़ा दी है. पहले यह समय सीमा 31 अगस्त तक थी. मोदी सरकार ने 2018 में एयर इंडिया का 76 फीसदी शेयर बेचने की कोशिश की थी लेकिन कंपनी के बारी कर्ज के कारण कोई खरीदार उसे खरीदने के लिए तैयार नहीं हुआ. अब सरकार ने उसे 100 फीसदी बेचने का फैसला किया है, लेकिन कोरोना महामारी ने इसमें बाधा खड़ी कर दी है.

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