दंगा कराने के आरोप में पकड़े गए, थाने में पीटे गए और 22 दिन बाद अदालत से बाइज्जत बरी हुए | भारत | DW | 05.07.2022

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भारत

दंगा कराने के आरोप में पकड़े गए, थाने में पीटे गए और 22 दिन बाद अदालत से बाइज्जत बरी हुए

यूपी के सहारनपुर में गत 10 जून को जुमे की नमाज के बाद हुई हिंसा के मामले में गिरफ्तार किए गए लोगों में से आठ को कोर्ट ने बरी कर दिया है. इनमें से कुछ वो युवक भी थे जिनकी थाने में पिटाई का वीडियो वायरल हुआ था.

Indien Uttar Pradesh Polizei

प्रतीकात्मक फोटो: यूपी पुलिस

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में पिछले महीने 10 जून को जुमे की नमाज के बाद हुई हिंसा में गिरफ्तार किए गए आठ अभियुक्तों को कोर्ट ने सबूत न मिलने के कारण बरी कर दिया है. इस हिंसा के बाद पुलिस ने गिरफ्तारी अभियान चलाया था और शक के आधार पर 100 से ज्यादा लोग गिरफ्तार किए गए थे. यह हिंसा बीजेपी की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा द्वारा पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ की गई कथित आपत्तिजनक टिप्पणी के विरोध में हुई थी. सवाल उठता है कि गिरफ्तारी, थाने में पिटाई और फिर 22 दिनों की जेल के दौरान उन युवकों को जो मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी, उसका जिम्मेदार कौन है और क्या उन जिम्मेदार लोगों को इसकी सजा मिलेगी?

सहारनपुर पुलिस ने इन आठ अभियुक्तों के खिलाफ दंगे में साबित होने का कोई सबूत नहीं पाया और अदालत में अर्जी दी कि सबूतों के अभाव में उन्हें रिहा कर दिया जाए. इसके बाद अदालत ने उन सभी आठ अभियुक्तों को रिहा कर दिया. इनमें वो युवक भी शामिल हैं जिन्हें गिरफ्तारी के बाद पुलिस थाने में जमकर पीटा गया था और पिटाई का वीडियो बनाकर उसे वायरल भी किया गया था. युवकों की पिटाई के इस वीडियो को बीजेपी विधायक शलभ मणि त्रिपाठी ने यह लिखते हुए ट्वीट किया था- "बलवाइयों को रिटर्न गिफ्ट.”

हालांकि सहारनपुर पुलिस ने शुरू में इस बात से इनकार किया था कि ये वीडियो वहां का है लेकिन बाद में उन्हें स्वीकार करना पड़ा. कोर्ट के आदेश के बाद अली, आसिफ, मोहम्मद, गुलफाम, मेहराज, फुरकान, सुभान और अब्दुस समद को 50-50 हजार रुपये के बॉन्ड पर रिहा किया गया है. अभियुक्तों के वकील बाबर वसीम के मुताबिक, अदालत को जब भी ज़रूरत होगी तो अभियुक्त कोर्ट के सामने पेश होंगे.

सहारनपुर के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक राजेश कुमार के मुताबिक, पुलिस ने कोर्ट में सीआरपीसी की धारा 169 के तहत अर्जी दी थी कि इन लोगों के खिलाफ कोई सबूत नहीं हैं इसलिए इन्हें रिहा कर दिया जाए. डीडब्ल्यू से बातचीत में वो कहते हैं, "इन लोगों के परिजनों ने कहा था कि ये लोग घटना में शामिल नहीं थे. हमने उसकी जांच की, सीसीटीवी फुटेज से मिलान किया गया और पाया गया कि घटना के दिन ये लोग वहां नहीं थे. इसी आधार पर हमने कोर्ट में अर्जी दी थी जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया.”

पुलिस दावा कर रही है कि इन अभियुक्तों की रिहाई पुलिस के प्रयासों से हुई लेकिन वकीलों का कहना है कि जब सबूत ही नहीं थे तो सीआरपीसी की धारा 163 के तहत पुलिस को यह अर्जी कोर्ट में दाखिल ही करनी थी, वर्ना उनके खिलाफ सबूत कोर्ट में पेश करने पड़ते. जिन लोगों को रिहा करने का कोर्ट ने आदेश दिया है, उनके परिजनों के मुताबिक, घटना के दिन वो लोग सहारनपुर में थे ही नहीं. बावजूद इसके पुलिस उन्हें उठाकर ले गई और फिर जेल भेज दिया गया.

हिरासत में पिटाई के मामले यूपी या यों कहें कि पूरे देश के लिए कोई नए नहीं हैं. कई बार तो हिरासत में पिटाई के दौरान अभियुक्तों की मौत तक हो चुकी है. हिरासत में कई दिनों तक रखने और प्रताड़ित करने की खबरें अक्सर सामने आती रहती हैं जबकि कानूनन, हिरासत में लेने के 24 घंटे के भीतर किसी भी अभियुक्त को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना जरूरी है.

सहारनपुर मामले में एक बार फिर यह सवाल उठ रहा है कि बिना किसी गलती के 22 दिन तक जेल में रहने और प्रताड़ने सहने वाले इन लोगों का गुनहगार कौन है और क्या उन गुनहगारों को सजा मिल पाएगी? इलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता कमल कृष्ण रॉय कहते हैं कि पहली बात तो गिरफ्तारी ही गलत तरीके से हुई और गिरफ्तारी के दौरान प्रताड़ित करना न सिर्फ कानून के खिलाफ है बल्कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की भी अवहेलना है. उनके मुताबिक, गिरफ्तारी से पहले मेडिकल कराया जाना जरूरी है.

डीडब्ल्यू से बातचीत में कमल कृष्ण रॉय कहते हैं, "तहकीकात के नाम पर उत्पीड़न नहीं किया जा सकता है, यह क्रिमिनल ऐक्ट है. इस मामले में पुलिस के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए. मानवाधिकार उल्लंघन का मामला है और मानवाधिकार आयोग को इस बारे में खुद से संज्ञान लेना चाहिए. उत्पीड़न को लेकर सुप्रीम कोर्ट कितनी सख्त है, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि इससे संबंधित 14 गाइडलाइंस को हर थाने पर लिखवा कर टांगने का कोर्ट ने निर्देश दिया था. दरअसल, टॉर्चर पर भारत में अलग से कानून नहीं बना है और इसी का फायदा पुलिस वाले उठाते हैं. दुनिया के कई देशों में है ऐसा कानून और भारत पर भी इसके लिए अंतरराष्ट्रीय दबाव है लेकिन अब तक नहीं बन सका है.”

कमल कृष्ण रॉय के मुताबिक, सहारनपुर का मामला बहुत ही गंभीर है और इसे ‘वर्स्ट काइंड ऑफ ह्यूमन राइट्स वायलेशन' के तौर पर देखा जाना चाहिए. उनके मुताबिक, बिना किसी अपराध के अदालत ने यदि बरी किया है तो इसका उन्हें उचित मुआवजा मिलना चाहिए क्योंकि उन्हें न सिर्फ 22 दिन जेल में रखा गया बल्कि अमानवीय तरीके से पीटा भी गया. वो कहते हैं, "जब आपके पास सबूत ही नहीं थे तो गिरफ्तार कैसे कर लिए? अदालत को इन पुलिस वालों से यह भी पूछना चाहिए.”

बीजेपी से निलंबित पार्टी की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा ने एक टीवी डीबेट में पैगंबर मोहम्मद के बारे कथित तौर पर विवादित बयान दिया था. इसके विरोध में गत 10 जून को जुमे की नमाज के बाद यूपी के कई शहरों में हिंसा भड़क गई थी. सहारनपुर में भी कई जगह हिंसा और आगजनी हुई थी. पुलिस ने जल्दबाजी में कई गिरफ्तारियां की थीं जिनमें से ज्यादातर संदेह के ही आधार पर की गई थीं.