65 साल का हुआ डॉयचे वेले | दुनिया | DW | 04.06.2018
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दुनिया

65 साल का हुआ डॉयचे वेले

डॉयचे वेले की स्थापना 65 साल पहले हुई. वह समय शीतयुद्ध का था. इन दिनों बहुत सी चुनौतियां फिर से सामने हैं. डॉयचे वेले के अतीत और भविष्य की संभावनाओं पर एक नजर.

जर्मन राष्ट्रपति थियोडोर हॉएस के स्वागत संदेश के साथ डॉयचे वेले का 3 मई 1953 को प्रसारण शुरू हुआ. कोलोन शहर से प्रोग्राम की शुरुआत में कहा गया कि डॉयचे वेले का लक्ष्य "विदेशों में रहने वाले श्रोताओं के लिए जर्मनी की राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक तस्वीर पेश करना है." प्रसारण की शुरुआत जर्मन में हुई लेकिन एक साल बाद 1954 में ही कई विदेशी भाषाएं जुड़ गईं. हिंदी और उर्दू का प्रसारण 1964 में शुरू हुआ. 1992 में टेलिविजन आया और बाद में ऑनलाइन जुड़ा.

स्थापना के 65 साल बाद महानिदेशक पेटर लिम्बुर्ग कहते हैं कि डॉयचे वेले इन सालों में बदल गया है, "विदेशों में रहने वाले जर्मनों के लिए शॉर्ट वेव रेडियो से लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया हाउस में जो 30 भाषाओं में डिजीटल और अनालोग सूचना देता है, जो पूरी दुनिया के लोगों तक पहुंचने की कोशिश करता है, वहां भी जहां सूचना सेंसर की जाती है और ब्लॉक की जाती है." पेटर लिम्बुर्ग कहते हैं कि स्वाभाविक रूप से शॉर्टवेव के दिन आसान थे,. दुनिया के हर कोने में पहुंचने के लिए."लेकिन यदि हम बदले न हो तो आज कहां होते." वे कहते हैं कि अब प्रोग्राम की मार्केंटिंग ज्यादा मुश्किल हो गई है. लेकिन साथ ही "इंटरनेट, सोशल मीडिया और हमारे पार्टनर नेटवर्क पहले से ज्यादा यूजर्स तक पहुंचने का मौका देते हैं."

व्यवस्थाओं का संघर्ष

डॉयचे वेले का टेलिविजन प्रोग्राम चार भाषाओं में होता है और कुल 30 भाषाओं में विभिन्न प्रकार के ऑडियो वीडियो और ऑनलाइन कंटेट. इसके अलावा सोशल मीडिया पर व्यापक गतिविधियां. स्मार्टफोन इस्तेमाल के लिए महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं. पहले श्रोता हुआ करते थे, अब ज्यादातर युवा यूजर हैं. डॉयचे वेले अकादमी दुनिया का प्रमुख मीडिया संस्थान है और 1965 से ही दुनिया भर के मीडियाकर्मियों को ट्रेनिंग दे रहा है. इसके बावजूद चीन और ईरान जैसे देशों में डॉयचे वेले को ब्लॉक भी किया जा रहा है.

स्थापना के 65वें साल में फिर से वैश्विक राजनीतिक हालत स्थापना के समय जैसी ही है. फिर से शीतयुद्ध की बात की जा रही है, दुनिया भर में अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता खतरे में है. डायरेक्टर जेनरल लिम्बुर्ग कहते हैं, "समय रुखा हो गया है , इसका मतलब है डॉयचे वेले के लिए और काम. हमें सूचना देनी है, पुल बनाने हैं, मूल्यों के बारे में बताना है. अब इसे शीतयुद्ध कहिए या मल्टीपोलर दुनिया, प्रोपेगैंडा, फेकन्यूज, आप्रवासन, जलवायु परिवर्तन और आतंकवाद की वजह से चुनौतियां बढ़ गई हैं."

फेक न्यूज के बदले तथ्य

आज डॉयचे वेले के रिपोर्टर दुनिया में जाना पहचाना चेहरा है. डॉयचे वेले के रिपोर्टर जब जॉर्डन या तुर्की के रिफ्यूजी कैंप में पहुंचते हैं, या दूसरे प्रोग्रामों के मॉडरेटर अपने इलाकों में पहुंचते हैं तो फैंस उन्हें घेर लेते हैं. पार्टनर चैनलों के माध्यम से विज्ञान पत्रिका मंथन जैसे प्रोग्राम अलग अलग इलाकों में देखे जाते हैं. मानवाधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, महिला अधिकार, भ्रष्टाचार या बेहतर शिक्षा जैसे मुद्दों पर लिखे लेख हजारों की तादाद में पढ़े जाते हैं. डॉयचे वेले ट्रंप और पुतिन जैसे नेताओं के वर्चस्व वाली दुनिया में जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल की सरकार की नीतियों के बारे में भी जानकारी देता है.

पहले भी डॉयचे वेले को लेकर कभी कभी राजनीतिक बहस हो जाती थी, लेकिन अब विश्व में अस्थिरता के जमाने में जर्मनी को डॉयचे वेले के महत्व का पता है. हाल में संसद में डॉयचे वेले के काम पर बहस हुई. 1960 से डॉयचे वेले का काम संसद के एक डॉयचे वेले कानून के आधार पर चलता है. संसद की बहस में सोशल डेमोक्रैटिक पार्टी के सांसद ने कहा, "ये मीडिया हाउस फेक न्यूज के बदले तथ्य देता है, स्वतंत्र, मूल्य आधारित और भावनाओं से भरा.

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