63 साल में पहली बार महासभा में बोले सऊदी शाह | दुनिया | DW | 24.09.2020
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दुनिया

63 साल में पहली बार महासभा में बोले सऊदी शाह

यूएन महासभा में हर साल दुनिया भर के नेता अपनी कामयाबियों, चुनौतियों और उपलब्धियों पर भाषण देते हैं. लेकिन इस बार बीते 63 साल में पहली बार किसी सऊदी शाह ने महासभा को संबोधित किया है. आखिर इसकी क्यों जरूरत पड़ी?

सऊदी शाह सलमान ने बुधवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित किया. अपने भाषण में उन्होंने अपनी सरकार की बुनियादी नीतियों और सऊदी अरब की अहमियत पर जोर दिया. खासकर उन्होंने फलस्तीनियों के बारे में अपनी वचनबद्धता को दोहराया और खुद को इस्लाम के सबसे पवित्र धार्मिक स्थलों का संरक्षक बताया. इसके साथ ही उन्होंने मध्य पूर्व में अस्थिरता के लिए मुख्य रूप से अपने प्रतिद्वंद्वी ईरान को जिम्मेदार ठहराया.

पहले से रिकॉर्ड अपने भाषण के जरिए शाह सलमान ने शायद संदेश देने की कोशिश की है कि सऊदी अरब की उच्च स्तरीय नीतियों पर उन्हीं का नियंत्रण है. यह शायद इसलिए भी जरूरी है क्योंकि दुनिया की नजर में सऊदी अरब को असल में उनके बेटे और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ही चला रहे हैं.

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भाषण की अहमियत

पूरे साल में चंद मुद्दों पर ही सार्वजनिक तौर पर बोलने वाले शाह सलमान का संयुक्त राष्ट्र महासभा में संबोधन अपने आप में एक विरली घटना कहा जाएगा. ऐसा करने वाले वह सिर्फ दूसरे सऊदी शाह हैं. इससे पहले 1957 में उनके भाई और सऊदी शाह सऊद ने महासभा को संबोधित किया था.

अपने भाषण में शाह सलमान ने कहा, "मुस्लिम दुनिया में हमारे स्थान के कारण, सऊदी अरब में हमारी विशेष और ऐतिहासिक जिम्मेदारी बनती है कि हम अपने सहिष्णु इस्लामी धर्म को इसे विकृत करने वाले आतंकवादियों संगठनों और चरमपंथी समूहों से बचाएं." उन्होंने अपने भाषण में इस बात को सबसे प्रमुखता से पेश किया कि वह उस जगह से बोल रहे हैं जो "इस्लाम की जन्मस्थली है".

उनके इन शब्दों के पीछे राजनीतिक लक्ष्य छिपा था क्योंकि आजकल मुस्लिम दुनिया में यह संघर्ष छिड़ा है कि वैश्विक तौर पर मुसलमानों का नेतृत्व कौन करेगा. इस सिलसिले में सऊदी अरब को तुर्की और ईरान से कड़ा मुकाबला करना पड़ रहा है.

अरब जगत में सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था सबसे बड़ी है और यह देश दुनिया में तेल का सबसे बड़ा उत्पादक भी है. लंबे समय से सऊदी अरब के रिश्ते अमेरिका के साथ बहुत अच्छे रहे हैं और वह उसका रणनीतिक साझीदार भी है. हालांकि अमेरिका में बहुत से लोग अब इस बात को लेकर चिंतित हैं कि क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के आक्रामक रैवेये को देखते हुए पता नहीं आगे संबंध किस दिशा में जाएंगे.

वीडियो देखें 03:30

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बदलते समीकरण

अपने भाषण में शाह सलमान ने फलस्तीनियों के लिए अपने समर्थन को फिर दोहराया. उन्होंने कहा कि फलीस्तीनी राष्ट्र के निर्माण से पहले सऊदी अरब इस्राएल को मान्यता नहीं दे सकता है. यह बात इसलिए भी अहम है क्योंकि जब हाल में संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन ने इस्राएल के साथ राजनयिक संबंध कायम किए तो कयास लगाए जा रहे थे कि क्या सऊदी अरब भी इस दिशा में आगे बढ़ रहा है. वैसे, शाह सलमान ने अपने भाषण में अरब दुनिया में कायम होने वाले इन नए राजनयिक संबंधों का जिक्र नहीं किया. 

लेकिन अपने भाषण में उन्होंने इस बात को जरूर साफ किया कि ईरान को लेकर उनके देश के रवैये में कोई बदलाव नहीं आया है. उन्होंने पिछले साल सऊदी तेल संयंत्रों को मिसाइलों और ड्रोन से निशाना बनाए जाने के लिए ईरान को जिम्मेदार बताया. उन्होंने कहा, "इससे पता चलता है कि वहां की सरकार वैश्विक अर्थव्यवस्था में स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की आपूर्ति में स्थिरता की कोई परवाह नहीं करती है."

सऊदी तेल संयंत्रों पर हुए हमलों की जिम्मेदारी यमन के हूथी बागियों ने ली थी और ईरान ने इसमें अपना हाथ होने से इनकार किया था. लेकिन संयुक्त राष्ट्र की एक जांच में पता चला कि मिसाइलें ईरानी मूल की थी. शाह सलमान ने कहा कि ईरान हूथी बागियों की हिमायत कर यमन में हस्तक्षेप कर रहा है. इन बागियों ने 2014 में अंतरराष्ट्रीय मान्यता वाली यमनी सरकार को राजधानी सना से भागने पर मजबूर कर दिया था. इसके बाद सऊदी अरब के नेतृत्व में कई अरब देशों के गठबंधन ने यमन में सैन्य कार्रवाई की. शाह सलमान ने कहा कि सऊदी अरब ने कई साल तक ईरान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाने की कोशिश की, "लेकिन उसका कोई फायदा नहीं हुआ."

84 साल के शाह सलमान का जुलाई में गॉल ब्लैडर का ऑपरेशन हुआ है. उसके बाद वह पहली बार सार्वजनिक तौर पर बयान देते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा को अपने संबोधन के दौरान ही दिखे हैं.

एके/आरपी (एपी)

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