18 साल का एमपी-एमएलए, क्यों नहीं? | ब्लॉग | DW | 27.11.2018
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ब्लॉग

18 साल का एमपी-एमएलए, क्यों नहीं?

भारत में भी अब 18 साल यानी वयस्क होने की उम्र के बाद युवाओं को चुनने के साथ चुने जाने का भी अधिकार दे दिया जाना चाहिए. महिलाओं के आरक्षण के सवाल पर राजनीतिक दलों के रवैये को देखते हुए उन पर दबाव डालना भी जरूरी है.

भारत में सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ने की उम्र घटाने की याचिका को खारिज कर दिया है और कहा है कि इस पर संसद में विचार होना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट का फैसला सही है कि इस पर कानून बनाने का अधिकार और दायित्व पूरी तरह संसद का है. मतदान की उम्र घटाने के फैसले के तीन दशक बाद अब समय आ गया है कि संसद इस पर विचार करे और मतदान के साथ चुने जाने की आयु भी एक कर दे. संसद के अलावा इस पर राजनीतिक पार्टियों, युवा संगठनों, गैर सरकारी संगठनों, स्कूलों और कॉलेजों तथा मीडिया में भी बहस होनी चाहिए.

1988 में राजीव गांधी की सरकार के दौरान युवाओं को 18 साल की आयु में मतदान का अधिकार देते समय कहा गया था कि युवा पीढ़ी पढ़ी लिखी है और इस फैसले से उन्हें राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा बनाने में मदद मिलेगी. ये दलील आज भी उतनी ही सही है. इस बीच भारत में न सिर्फ साक्षरता बल्कि उच्च शिक्षा पाए युवाओं की तादाद भी बढ़ी है. देश की आबादी का आधा हिस्सा 25 वर्ष की आयु से नीचे है है यानी सिर्फ 50 प्रतिशत आबादी को लोगों का प्रतिनिधित्व करने का हक है.

भारत की मौजूदा प्रतिनिधि सभाएं देश की आबादी और उनके विचारों का सही प्रतिनिधित्व नहीं करती. चुने जाने की उम्र घटाकर आबादी के एक बड़े हिस्से को उनके सरोकारों के प्रति जागरूक किया जा सकता है और उसे लोकतांत्रिक राजनैतिक प्रक्रिया में शामिल किया जा सकता है. एक उम्र जिसमें इंसान वयस्क हो जाता है और कानूनी जिम्मेदारी का हकदार बन जाता है, सरकारी नौकरी में जाकर जिलों का अधिकारी बन जाता है, तो कोई वजह नहीं कि उस उम्र में उसे विधानसभाओं या लोकसभा में प्रतिनिधित्व से वंचित रखा जाए.

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महेश झा

अगर राजनीतिक परिपक्वता कोई दलील है तो 18 साल की उम्र में चुनाव लड़ने का अधिकार युवाओं को राजनीतिक व्यवस्था के बारे में ज्यादा जानने को प्रेरित करेगा. व् सुरक्षित बचपन, सबको मुफ्त शिक्षा, रोजगार और सुरक्षित पर्यावरण जैसे अधिकारों के लिए संवैधानिक तौर पर लड़ पाएंगे. और आजादी के सत्तर साल बाद भी अगर युवाओं को 18 साल तक की उम्र में वयस्क बनाने में सफलता नहीं मिली है तो सरकार और समाज पर भी इसके लिए दबाव बनेगा. जर्मनी सहित कई यूरोपीय देशों के उदाहरण दिखाते हैं कि युवाओं के संसद में आने से राजनीतिक प्रक्रिया में उनकी भागीदारी बेहतर होती है.

युवाओं के लिए चुनाव लड़ने जाने की उम्र कम करने का असर यह भी होगा कि ज्यादा लड़कियां राजनीति में दिलचस्पी लेंगी और कानून बनाने वाली संस्थाओं में महिलाओं की भी हिस्सेदारी बढ़ेगी. इन मुद्दों पर हर स्तर पर बहस की जरूरत है. संसद और राजनीतिक दलों पर दबाव बनाने की भी है क्योंकि महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें रिजर्व करने के मुद्दे पर भी अभी तक कुछ नहीं हुआ है. कांग्रेस और बीजेपी जैसी बड़ी पार्टियां चाहें तो साथ मिलकर अगले चुनावों से पहले ही ऐसा फैसला ले सकती हैं. लेकिन वे इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर भी साथ आने को तैयार नहीं हैं. असल ससमस्या यह है कि हर पार्टी में महिला और युवा कार्यकर्ताओं का अभाव है. उन्हें अगर मुख्य धारा से जोड़ना है तो सत्ता उनके साथ बांटनी ही होगी.

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