176 लोगों की मौत के दाग कैसे धोएगा ईरान | ब्लॉग | DW | 15.01.2020
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ब्लॉग

176 लोगों की मौत के दाग कैसे धोएगा ईरान

दुनिया में ईरान जैसे चंद ही देश हैं जो आंखों में आंख डालकर अमेरिका को चुनौती देते हैं. लेकिन क्या मध्य पूर्व का यह ताकतवर देश एक जिम्मेदार देश भी है? यूक्रेन के विमान को मार गिराने के बाद यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए.

ईरान की राजधानी तेहरान से उड़ान भरने वाले यूक्रेन के यात्री विमान में सवार 176 लोगों की मौत के दाग को ईरान शायद कभी नहीं धो पाएगा. ईरान के राष्ट्रपति हसन रोहानी ने विमान को मार गिराए जाने की इस घटना को 'नाकाबिले माफ गलती' बताया है. लेकिन यह गलती नहीं, बल्कि जघन्य अपराध है, जिसकी उम्मीद एक आधुनिक और जिम्मेदार देश से नहीं होती.

यह विमान किसी दूसरे देश से नहीं आ रहा था जिस पर ईरानी सेना को शक होता. ईरान और यूक्रेन के बीच संबंध भी सामान्य हैं. इस विमान ने तय नियमों और मानकों के मुताबिक तेहरान के अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट से उड़ान भरी. उसने ईरान सरकार की तरफ से निर्धारित हवाई मार्ग पर ही अपना सफर शुरू किया होगा. तो फिर उड़ान भरने के चंद मिनटों के भीतर ऐसा क्या हुआ कि हड़बड़ी में ईरानी सैन्य अफसरों ने 176 बेकसूर लोगों की जान ले ली.

ईरानी सेना का कहना है कि उसने यात्री विमान को क्रूज मिसाइल समझ लिया था और इसलिए उसे मार गिराया गया. ईरानी सेना के मुताबिक विमान संवेदनशील हवाई क्षेत्र में दाखिल हो गया था, इसलिए यह गलती हुई. अगर देश की राजधानी के अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट का हवाई क्षेत्र इतना असुरक्षित है तो फिर दुनिया की कोई भी एयरलाइन वहां जाने से कतराएगी.

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अब भले ही ईरान खुले तौर पर अपनी गलती कबूल करके 'ईमानदारी' का परिचय दे रहा है. लेकिन अगर कनाडा और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों का दबाव नहीं होता, तो 176 लोगों की हत्या सिर्फ हादसे में मारे गए लोगों के तौर पर दफन हो जाती. ईमानदारी तो तब होती, जब ईरान की सरकार विमान के गिरने के तुरंत बाद अपनी गलती मानती. इसके बजाय उसने विमान के इंजन की तकनीकी खराबी बताते हुए अपने अपराध पर पर्दा डालने की कोशिश की. लेकिन जब बात खुलती चली गई तो ईरान के सामने अपनी गलती मानने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा. इससे ईरान की सरकार अपनी ही जनता की नजरों में गिर गई. कई शहरों में हजारों लोग सड़कों पर उतरे और उन्होंने अपनी सरकार को 'झूठा' करार दिया. प्रदर्शनकारी ना सिर्फ राष्ट्रपति का बल्कि ईरान के सर्वोच्च नेता का भी इस्तीफा मांग रहे हैं. 

इराक में एक अमेरिकी हमले में ईरानी जनरल कासिम सुलेमानी की मौत के बाद ईरान के लिए पैदा होने वाली थोड़ी बहुत सहानुभूति अब फुर हो गई है और हर कोई 176 लोगों की मौत पर सवाल कर रहा है. जाहिर है जांच होगी, कुछ लोग जिम्मेदार करार दिए जाएंगे, हो सकता है कि ईरान खस्ताहाल होने के बावजूद पीड़ित परिवारों को कुछ मुजावजा देने को भी राजी हो जाए. लेकिन इन सब कदमों से उन हंसते मुस्कराते चेहरों की भरपाई नहीं हो सकती है, जो यूक्रेन इंटरनेशनल एयरलाइंस के विमान पर सवार हुए थे. 

ऐसा नहीं है कि किसी यात्री विमान को मार गिराए जाने की यह पहली घटना है. कुछ साल पहले यूक्रेन-रूस संकट के दौरान मलेशिया का एक यात्री विमान यूक्रेन के हवाई क्षेत्र में गिराया गया था. इसके पहले 1980 के दशक में ईरान के एक यात्री विमान को अमेरिका ने मिसाइल से मार गिराया था. लेकिन ये दोनों ही मामले इस तरह अलग हैं कि विमान कहीं और से आ रहे थे. लेकिन ईरान ने जिस विमान को गिराया, उसने तो तेहरान से ही उड़ान भरी थी और चंद मिनटों के भीतर उसे एयरपोर्ट के करीब ही मार गिराया गया. ईरान ने जब पहली बार इसे मार गिराने की बात स्वीकारी तो इसके लिए 'मानवीय गलती' को जिम्मेदार बताया. लेकिन इस मानवीय गलती ने सिर्फ 176 निर्दोषों की जान ही नहीं ली है बल्कि ईरान की साख को बट्टा भी लगाया है. 

मध्य पूर्व में बीते कई दशक इस बात के गवाह हैं कि चाहे जितनी मुश्किलें आईं, लेकिन ईरान इस इलाके में एक दमदार खिलाड़ी है. इतना दमदार कि एक तरफ वह लगभग अकेला है और दूसरी तरफ अमेरिका, इस्राएल और अरब देशों का गठजोड़. सब ईरान की महत्वाकांक्षाओं को अपने लिए चुनौती समझते हैं. आप जितने ताकतवर होते हैं, उतना ही आपसे जिम्मेदार होने की उम्मीद भी की जाती है. लेकिन अपनी सरजमीन से उड़ान भरने वाले एक यात्री विमान को मार गिरा कर ईरान ने अमेरिका के इन आरोपों को वजन दिया है कि वह एक जिम्मेदार देश नहीं है और इसीलिए अगर ईरान के पास एटमी ताकत आ गई तो इससे विश्व शांति को खतरा होगा. ऐसे में, ईरान को वाकई सोचना होगा कि वह इस आरोप का जवाब कैसे देगा.

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