100 साल पहले ऐसे खत्म हुआ विश्वयुद्ध | दुनिया | DW | 10.11.2018
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दुनिया

100 साल पहले ऐसे खत्म हुआ विश्वयुद्ध

पहला विश्व युद्ध 11 नवंबर, 1918 को खत्म हुआ था. इस जंग में ताकत के अभूतपूर्व प्रदर्शन ने असंख्य लोगों की जान ली. युद्ध तो खत्म हुआ लेकिन मुसीबतें नहीं, यूरोप इस तबाही की आंच से लंबे समय तक उबर नहीं सका.

Erster Weltkrieg | Waffenstillstand von Compiegne (picture-alliance/dpa)

कोम्पियेने के जंगल में माथियास एर्त्सबर्गर और मार्शल फर्डिनांड फॉश समझौते पर चर्चा करते हुए.

6 नवंबर को फ्रांस की तरफ जाते जर्मन वार्ताकार की कार ने जब बेल्जियम की तरफ से सीमा पार की तो फ्रेंच सैनिकों का उत्साह बढ़ गया. सेनाएं अब भी एक दूसरे से लड़ रही थीं लेकिन चार साल से ज्यादा पुरानी जंग के अब खत्म होने के आसार दिखने लगे थे. बर्लिन से आने वाले राजनेता अपने साथ कुछ सिगरेट भी लाए थे जो शायद उन सैनिकों में शांति की ललक जगाने का काम कर सकती थीं. हालांकि जर्मन दल के प्रमुख मथियास एर्त्सबर्गर ने अपने संस्मरण में लिखा है कि उन्हें सीमा के पार एक, "धूम्रपान नहीं करने वाले शख्स" के रूप जाना पड़ा और वो "उनकी इच्छा पूरी नहीं कर पाए."

मथियास एर्त्सबर्गर भले ही सिगरेट ना ले जा पाए हों लेकिन फ्रेंच वार्ताकार मार्शल फर्डिनांड फॉश के साथ वह करोड़ों यूरोपीय लोगों की इच्छा पूरी कर सके और वो तारीख थी 11 नवंबर. ठीक सौ साल पहले पेरिस से उत्तर पश्चिम में करीब 90 किलोमीटर दूर कोम्पियेने के जंगल के पास एक रेल वैगन में इन दोनों ने जर्मनी और उसके सहयोगियों के साथ युद्धविराम पर दस्तखत किए. जर्मनी ने समर्पण किया. इसके कई महीनों बाद वर्साय महल के मशहूर डाइनिंग हॉल में दोनों पक्षों ने शांति समझौते पर आधिकारिक रूप से दस्तखत किया. 

आखिरी जर्मन हमला

पश्चिमी मोर्चे पर जर्मनी 1918 की गर्मियों में काफी आगे बढ़ गया था, मार्च और जुलाई के बीच सैनिकों की तादाद 51 लाख से घट कर 42 लाख होने के बावजूद उसने विशाल भूभाग पर कब्जा कर लिया था. जर्मनी मोर्चे पर सैनिकों की कमी पूरी करने में सफल हो रहा था. पहले घायल हुए सैनिकों को ठीक होने के बाद वापस भेजा जा रहा था. इसके साथ ही 1900 में पैदा हुए जवान सेना में भर्ती हो रहे थे और उससे भी कमी पूरी करने में मदद मिल रही थी.

Im Westen nichts Neues- Westfront, 1. Weltkrieg (picture-alliance/Mary Evans Picture Library/IBL Collections )

पश्चिमी मोर्चे पर लड़ाई एक अलग तरह की तबाही थी.

समस्या यह थी कि जर्मनों के सामने अमेरिका के रूप में एक नया दुश्मन था. अप्रैल 1917 में अमेरिकी राष्ट्रपति वूड्रो विल्सन ने युद्ध का एलान किया और बड़ी तादाद में अमेरिकी "डफबॉयज" ने अटलांटिक पार कर लिया. अमेरिकी सैनिकों या मरीन्स को अनाधिकारिक तौर पर "डफबॉयज" कहा जाता है. 1918 के पतझड़ के शुरू के दिनों में हर रोज करीब 10 हजार सैनिक आए. इतिहासकार जॉन कीगन मानते हैं कि युवा अमेरिकी सैनिक भले ही अनुभवहीन थे लेकिन,"उनका आना उनके दुश्मनों के लिए निर्णायक साबित हुआ: यह बहुत निराश करने वाली थी." आखिरकार सुसज्जित अमेरिकी सेना ने इस जंग का फैसला मित्र देशों के हक में कर दिया.

जर्मनी के वरिष्ठ नेताओं को मानना पड़ा कि यह जंग जीती नहीं जा सकती और जर्मन मोर्चे को पूरी तरह ध्वस्त होने से बचाने के लिए युद्ध विराम ही एकमात्र रास्ता है.

"एक के बाद एक खंडहर"

11 नवंबर को युद्ध विराम पर दस्तखत होने तक यूरोप ने चार साल तक भयानक रक्तपात और भारी तबाही का सामना किया. एर्त्सबर्गर ने इस तबाही को बेल्जियम से फ्रांस तक के सफर में अपनी आंखों से देखा. उन्होंने लिखा है, "एक भी घर साबुत खड़ा नहीं था, एक के बाद एक खंडहर दिख रहे थे. चांद की रोशनी में खंडहर हवा में भूतों की तरह दिख रहे थे, कोई जीवित प्राणी नजर नहीं आ रहा था."

Französische Panzer 1917 (Archives of Renault Company)

प्रथम विश्व युद्ध में फ्रांस के टैंक

एर्त्सबर्गर ने बताया कि जंग का नुकसान उस वक्त इतिहास में सबसे ज्यादा था. तकनीकी विकास और औद्योगिकरण के कारण ऐसे हथियार बने जिन्होंने पुराने हथियारों को पीछे छोड़ दिया. लगभग अविनाशी टैंक, ऐसे बोट जो पानी के नीचे भी जा सकें, दूर तक मार करने वाले तोप, घातक गैसें इन सबने ना सिर्फ मारक क्षमता बल्कि संख्या के लिहाज से भी पुराने हथियारों की छुट्टी कर दी.  

सैन्य इतिहासकार अनुमान लगाते हैं कि पहले विश्व युद्ध में करीब 8.5 करोड़ तोप के गोले दागे गए. इस दौरान लोगों की मौत का आंकड़ा भी एक तरह से औद्योगिक स्तर पर ही था. मशीन गनों से निकली गोलियों ने करीब 1.1 करोड़ सैनिकों की जान ली. जंग लड़ने वाले देशों ने कुल मिला कर 5.6 करोड़ सैनिकों की जबरन भर्ती की थी. औसतन हर दिन लड़ाई में 6000 सैनिकों की जान गई. इसके साथ ही करीब 2.1 करोड़ सैनिक घायल हुए, उनका अंग भंग हुआ, कईयों को लकवा मार गया तो बहुतों की जिंदगी बिस्तरों में सिमट गई, किसी की नजर चली गई तो कोई सुनने के काबिल ना रहा.

"पूरा पेट ही चला गया"

Bildergalerie Ruinen des Zweiten Weltkrieges - Alt St. Alban in Köln (picture-alliance/akg-images)

जर्मन कलाकार केथे कोलवित्स ने अपने छोटे बेटे को युद्ध में खो दिया. यह कलाकृति उन्होंने उसी की याद में बनाई. इसमें एक मां बाप की पीड़ा दिखाने की कोशिश की गई.

जंग के मोर्चे से आने वाली कहानियां बहुत परेशान करने वाली थीं. जर्मन सैनिक कार्ल बाइनियर याद करते हैं, "जब छर्रे इतने अधिक वेग से मांस में घुसते तो बहुत तकलीफ होती, हमारे दो रनर रात में सीधे हमले की चपेट में आ गए. एक का सीना तो दूसरे की पूरी पेट ही चली गई. जिसका पेट गया वो तो तुरंत मर गया, दूसरा कराहता रहा." योहानेस गोएत्समन ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि वह अपने दस्ते के साथ एक भूमिगत बंकर में छिपा था, "गैरेज पर हमला हुआ तो हम उसके नीचे थे. बहुत से लोग घायल हुए, एक का तो पैर ही नहीं बचा, दोनों पैर चले गए और इतना खून बहा कि उसकी मौत हो गई."

ऐसे में यह कोई हैरानी नहीं थी कि जंग के खत्म होने की उम्मीद करने वालों में सैनिक भी शामिल थे. सैन्य नेता प्रिंस रूपरेष्ट फॉन बायर्न ने मई 1918 में लिखा, "अब यह अनोखी बात नहीं, 100 के दल में 20 लोगों ने साथ छोड़ दिया, अगर वो पकड़े जाते तो उन्हें दो से चार महीने की कैद होती. सब यही चाहते थे क्योंकि इस तरह से वो अगली जंग से बच सकते थे."

इसके बाद के महीनों में जर्मनी कमजोर पड़ने लगा. बहुत से सैनिकों ने लड़ने से इनकार कर दिया. कुछ दूसरे खुद ही अपने घर के रास्ते पर चल पड़े. सैनिक अपनी जिंदगी के बारे में क्या महसूस कर रहे थे इसके बारे में अल्फ्रेड डोएब्लिन ने अपने उपन्यास नवंबर 1918: ए जर्मन रेवॉल्यूशन में लिखा है, "तुम बिस्तर में पड़े हो और बीमार हो. तुम्हारी खोपड़ी फूटी हुई है, पेट में गोली लगी है और कूल्हे छटके हुए हैं."

जर्मन सैनिक कमजोर पड़ रहे थे. सैन्य नेता जिम्मेदारी लेने से मना कर रहे थे. 19 सितंबर 1918 को जनरल एरिष लुडेनडॉर्फ ने लिखा, "मैंने हिज मैजेस्टी से कहा है कि वो सरकार के गुटों की एसेंबली बुलाएं ताकि उन्हें हम अब तक जो कुछ हुआ है उसके लिए धन्यवाद दे सकें. हम इन लोगों का मंत्रालयों में ट्रांसफर देखेंगे. इन महाशयों को अब ऐसी बातचीत करनी चाहिए जिससे शांति जरूर आए. उन्हें अब हमलोगों को इस स्थिति में डालने का जो नतीजा है उसका सामना करना चाहिए."

"इन महाशयों" से लूडेएडॉर्फ का मतलब जर्मन शासन में संसदीय दलों के उन राजनेताओं से था जिन्होंने 1917 में शांति समझौते की वकालत की थी यानि सोशल डेमोक्रैट्स, वामपंथी उदारवादी और कैथोलिक सेंटर पार्टी.

जर्मन साम्राज्य के सबसे वरिष्ठ सैन्य अधिकारी पॉल फॉन हिंडनबुर्ग ने भी जंग से निढाल वतन की कथित बेईमानी के दावों के बारे में लिखा है. एक "अंग्रेज जनरल" के हवाले से हिंडनबुर्ग ने लिखा, "जर्मन सेना की पीठ में छूरा भोंका गया." यह संभावित जर्नल थे फ्रेडरिक मॉरिस और उन्होंने इस बात से साफ इनकार कर दिया. हालांकि उनके इनकार को किसी ने बहुत महत्व नहीं दिया. इसके साथ ही "डैगर थ्रस्ट लीजेंड" का जन्म हुआ, यह दावा किया जाने लगा कि जर्मनी  अंदरूनी "धोखेबाजी" की वजह से जंग हार गया. 1930 के शुरुआती दशक में वाइमार गणराज्य के पतन में इस किंवदंती ने बड़ी भूमिका निभाई.

Paul von Hindenburg (picture-alliance/empics)

जर्मन फील्ड मार्शल पॉल फॉन हिंडेनबुर्ग

"गुस्सा, गुस्सा, गुस्सा और कोई समझदारी नहीं"

11 नवंबर 1918 के बहुत पहले से जंग के खत्म होने की उम्मीद बनने लगी थी लेकिन इसके बाद भी लड़ाई रुकने पर तकलीफों का अंत नहीं हुआ. अभाव, कठिनाई और दुख ने लोगों का जीवन मुश्किल बनाए रखा. यह भावना भी बहुत मजबूत थी कि बिना बात के जंग लड़ी गई, बिना कुछ हासिल किए दुख झेला गया. लेखक वाल्टर सेर्नर ने अपने देशवासियों के गुस्से के बारे में लिखा है, "निरर्थकता जब अपने चरम पर हो तो गुस्सा, गुस्सा, गुस्सा ही होता है और कोई समझदारी नजर नहीं आती." इस बुरे अहसास ने जर्मनों को बाकियों की तुलना में कही ज्यादा घेर रखा था. इसी अहसास ने अडोल्फ हिटलर नाम के पूर्व सैनिक के राजनीतिक उदय की जमीन तैयार की.

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