हो सकता है भारत पाक संबंध बहाल | ब्लॉग | DW | 22.01.2015
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ब्लॉग

हो सकता है भारत पाक संबंध बहाल

पाकिस्तान ने लंबे समय तक भारत और अमेरिका दबाव का सामना करने के बाद जमात-उद-दावा और हक्कानी गुट पर प्रतिबंध लगा दिया है. कुलदीप कुमार का कहना है कि यह अहम घटना है.

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता तसनीम असलम ने प्रतिबंध की आधिकारिक रूप से घोषणा की कि जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफिज सईद की विदेश यात्रा पर प्रतिबंध लगा दिया गया है उसके बैंक खाते सील कर दिए गए हैं. हक्कानी गुट के पाकिस्तान में कोई बैंक खाते नहीं हैं. यह घोषणा करते हुए वह इस बात पर जोर देना न भूलीं कि यह निर्णय पाकिस्तान ने किसी भी बाहरी देश के दबाव में आकर नहीं, यहां तक कि अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन कैरी के कहने से भी नहीं, बल्कि स्वतः अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए लिया है. दिलचस्प बात यह है कि जॉन कैरी पिछले सप्ताह पाकिस्तान की यात्रा पर इस्लामाबाद पहुंचे थे और पिछले शुक्रवार को ही अमेरिकी विदेश मंत्रालय की उप प्रवक्ता मेरी हार्फ ने पाकिस्तान द्वारा हक्कानी गुट, जमात-उद-दावा और हिंसक आतंकवाद से जुड़े दस अन्य संगठनों को प्रतिबंधित किये जाने का स्वागत किया था. हालांकि तब तक पाकिस्तान की ओर से इन संगठनों को प्रतिबंधित करने के बारे में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गयी थी. इन प्रतिबंधित संगठनों में भारत-विरोधी हरकत-उल-मुजाहिदीन भी शामिल है. पाकिस्तान सरकार का कहना है कि उसने ये कदम हाल ही में बनाई गयी राष्ट्रीय कार्य योजना के तहत उठाए हैं.

इस सिलसिले में इस तथ्य पर भी ध्यान देना जरूरी है कि दो दिन पहले ही इस आशय की खबरें आयी थीं कि अमेरिका और ब्रिटेन ने पाकिस्तान से आग्रह किया है कि भारत से संबंध सुधारने के लिए वह तत्काल लश्कर-ए-तैयबा के कमांडर जकीउर्रहमान लखवी को भारत को सौंप दे. लखवी को नवम्बर 2008 में मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले का मास्टरमाइंड माना जाता है. इस हमले में 166 व्यक्तियों की मृत्यु हो गयी थी. लखवी इस समय पाकिस्तान में जेल में बंद है लेकिन मुंबई हमलों के अभियुक्तों के खिलाफ पाकिस्तानी अदालतों में मुकदमे बहुत धीमी रफ़्तार से चल रहे हैं. हक्कानी गुट अफगानिस्तान के खिलाफ पाकिस्तान का हथियार है और उसे वहां नाटो सेनाओं, भारतीय दूतावास और अन्य ठिकानों पर हमले करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. इन्हें पाकिस्तानी सेना अपनी रणनीतिक परिसंपत्तियां मानती है. इसलिए इन पर प्रतिबंध लगना निश्चय ही एक बहुत महत्त्वपूर्ण घटना है.

दक्षिण एशिया पर चार अमेरिकी राष्ट्रपतियों के सलाहकार रह चुके पूर्व सीआईए अधिकारी और सुरक्षा मामलों के विशषज्ञ ब्रूस रीडेल का मानना है कि किसी भी समय भारत पर लश्कर-ए-तैयबा का एक और हमला हो सकता है. उधर भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल कह चुके हैं कि यदि भारत पर मुंबई जैसा एक और हमला हुआ तो पाकिस्तान को बलूचिस्तान से हाथ धोना पड़ेगा. उधर 16 दिसंबर को पेशावर में हुए आतंकवादी हमले में 132 स्कूली बच्चों की हत्या होने की पाकिस्तान में भी व्यापक प्रतिक्रिया हुई है जिसके परिणामस्वरूप प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को कहना पड़ा कि अब उनकी सरकार `अच्छे` और `बुरे` आतंकवादी में अंतर नहीं करेगी. इसमें कोई शक नहीं कि लश्कर-ए-तैयबा के मातृ संगठन जमात-उद-दावा, हरकत-उल-मुजाहिदीन और हक्कानी गुट जैसे आतंकवादी संगठनों पर प्रतिबंध लगने से भारत के साथ बातचीत के लिए बेहतर माहौल बनेगा.

लेकिन ऐसा तभी हो सकेगा जब यह प्रतिबंध पहले की तरह दिखावटी न साबित हो. पाकिस्तान पहले लश्कर-ए-तैयबा पर प्रतिबंध लगा चुका है जिसके बाद हाफिज सईद ने इसका नाम बदल कर जमात-उद-दावा कर दिया. प्रतिबंधित संगठनों के खिलाफ वहां किसी भी तरह की लगातार कार्रवाई नहीं होती जिसके कारण उनका नेटवर्क छिन्न-भिन्न हो, उनके कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया जाए, उन्हें मिलने वाले धन के स्रोतों को बंद किया जाए. यदि इस बार भी जमात-उद-दावा और अन्य आतंकवादी संगठनों के कार्यकर्ताओं के खिलाफ कड़ी और कारगर कार्रवाई न की गयी, तो प्रतिबंध को ओबामा की यात्रा के समय बजाया गया झुनझुना ही माना जाएगा. लेकिन यदि पाकिस्तान सरकार और सेना ने वाकई अपनी सोच बदली है, तो इससे भारत-पाकिस्तान संवाद बहाल होने की संभावना बनेगी. लेकिन इसके लिए जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा और भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा पर शांति बहाली भी एक जरूरी शर्त है.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

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