हॉकी के जादूगर मोहम्मद शाहिद को अंतिम विदाई | खेल | DW | 21.07.2016
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खेल

हॉकी के जादूगर मोहम्मद शाहिद को अंतिम विदाई

करीब सौ साल के हॉकी के खेल के इतिहास में शायद किसी ने मोहम्मद शाहिद से बड़ा ड्रिब्लर नहीं देखा. आज हॉकी के इस सितारे को अंतिम विदाई दे दी गई.

भारत की प्राचीन मोक्ष नगरी वाराणसी को बिसमिल्लाह खां, पंडित रविशंकर, गिरिजा देवी, किशन महाराज और सितारा देवी के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है. भारतीय शास्त्रीय संगीत में बनारस के संगीत घराने के योगदान को दुनिया सिर आंखों पर रखती है, लेकिन खेल की दुनिया भी अपने बनारसी योगदान के लिए जानी जाएगी, मोहम्मद शाहिद के नाम से जिसे हॉकी के जादूगर ध्यानचंद के बाद का सबसे बड़ा खिलाड़ी होने का गौरव प्राप्त है.

दुनिया के सर्वश्रेष्ठ ड्रिबलर और रिवर्स फ्लिक के बादशाह, फॉरवर्ड मोहम्मद शाहिद उसी बनारस में 14 अप्रैल 1960 को पैदा हुए जिससे महज डेढ़ सौ किलोमीटर दूर इलाहाबाद की मिट्टी ने 1905 में हॉकी के पहले जादूगर ध्यानचंद को पैदा किया था. मोहम्मद शाहिद के शानदार हॉकी खिलाड़ी के रूप में भारत सरकार ने उन्हें 1986 में पद्मश्री से नवाजा. भारतीय हॉकी का यह दूसरा जादूगर भी उत्तर प्रदेश की माटी का लाल था, वाराणसी के खजुही मोहल्ले से भारतीय हॉकी के इस दूसरे जादूगर का गुरुवार को जब जनाजा उठा तो सबकी आंखें नम थीं. पूर्व कप्तान धनराज पिल्लै और आरपी सिंह सहित हॉकी के सैकड़ों प्रेमी जनाजे में शामिल हुए. शाहिद को टकटकपुर के उनके पुश्तैनी कब्रिस्तान में दफन किया गया.

धनराज पिल्लै ने कहा कि चमन में शाहिद की कमी को पूरा नहीं किया जा सकता. शाहिद को करीब एक माह पूर्व डेंगू हो गया था और वाराणसी में उनका इलाज चलता रहा लेकिन फिर पीलिया हो गया तो उन्हें दिल्ली के पास गुड़गांव के मेदांता अस्पताल में शिफ्ट किया गया जहां उन्होंने 20 जुलाई 2016 को आखिरी सांस ली.

वाराणसी के कमिश्नरी मैदान की ऊबड़ खाबड़ जमीन अभी भी शाहिद की बचपन की हॉकी स्टिक की गवाह है. पूर्व हॉकी कप्तान जफर इकबाल उनके लेफ्ट आउट जोड़ीदार हुआ करते थे, उनके अनुसार नए दौर के ध्यानचंद थे मोहम्मद शाहिद. बताते हैं कि उम्र में उनसे कम होने के बावजूद उनकी मौत पर वह बेहद रंजीदा हैं. जफर इकबाल और मोहम्मद शाहिद की जोड़ी ने उस दौर में पाकिस्तान की हॉकी टीम को पानी पिला रखा था. शाहिद के घर के लिए मशहूर था कि अगर पाकिस्तान से हार गए तो उनके घर में खाना नहीं पकता था.

यूपी सरकार में खेल निदेशक आरपी सिंह हॉकी के जाने माने खिलाड़ी हैं और मोहम्मद शाहिद के साथ उन्होंने लेफ्ट हाफ के रूप में कई मैच खेले हैं. शाहिद को याद करते हुए बताया कि अगर सामने वाली टीम तगड़ी होती थी तो बोलते थे कि 'ठाकुर आज गोल मारने वाली हॉकी लेकर आया हूं.' और अगर सामने वाली टीम कमजोर होती थी तो हमसे कहते थे 'ठाकुर आज छकाने वाली हॉकी लेकर आया हूं' आरपी सिंह ने बताया कि 1988 में पाकिस्तान गई भारतीय टीम में हमारी टीम पहले हाफ में एक गोल से पीछे हो गई तो दूसरे हाफ में हमसे बोले कि 'ठाकुर हमने हॉकी बदल ली है और गोल करने वाली निकाल ली है, तुम बस क्रास दो, मैं गोल कर दूंगा, और वैसा ही हुआ, मेरे पास पर शाहिद ने मैच के अंतिम क्षणों में गोल कर मैच एक एक से बराबर कर दिया.

लेकिन उनको सदमा लगा 1986 में, उसके बाद उन्होंने हॉकी को अलविदा कह दिया. भारत और जापान के बीच चल रही श्रृंखला में कप्तान के नाते उन्होंने एक मैच अपने गृह जनपद वाराणसी में भी रखवा लिया था. लेकिन इसी ने उन्हें रुला दिया. इस मैच के प्रायोजकों में झगड़े के कारण मीडिया ने इसका बायकाट कर दिया और मौसम की मार ने खिलाड़ियों की सांस फुला दी. नतीजा यह कि जापानी खिलाड़ियों समेत कई भारतीय खिलाड़ियांे ने मैदान से वाकआउट कर दिया. कुदरत भी शायद रूठी थी सो आंधी आ गई. तब शाहिद पवैलियन के पास आंसुओं से रोते हुए देखे गए.

1980 में मास्को में स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम में शाहिद के रोल को भुलाया नहीं जा सकता. उसके बाद से 36 साल हो गए, भारत को स्वर्ण नहीं नसीब हुआ. शाहिद के बाद कोई भी खिलाड़ी ऐसा नहीं आया जिसने हालैंड और जर्मनी के हॉकी खिलाड़ियों को चकमे पर चकमे दे कर छकाया हो. अपने करियर में शाहिद ने भारत के लिए 167 मैच खेले और 66 गोल किए. शाहिद जब तक टीम में रहे भारत ने हॉकी का विश्व कप ही नहीं जीता बल्कि भारतीय हॉकी टीम ने लगातार स्वर्ण पदक प्राप्त किए.

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