हिन्दी में सही रवैये की जरूरत | ब्लॉग | DW | 08.09.2014
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ब्लॉग

हिन्दी में सही रवैये की जरूरत

हिन्दी के विकास को लेकर जितनी चर्चाएं और कसरतें की जाती हैं, होता उसका आधा भी नहीं. नतीजा ये होता है कि बाजार में हिन्दी मास मीडिया माध्यमों के जरिए तो धूम मचाती दिखती है लेकिन उसके अपने हाल जर्जर रह जाते हैं.

संयोग से हिन्दी दिवस (14 सितंबर) इस बार ऐसे समय में पड़ रहा है जब इस भाषा के सबसे बड़े आधुनिक कवियों में एक गजानन माधव मुक्तिबोध की 50वीं पुण्यतिथि भी है. उन्होंने हिन्दी भूभाग में संघर्ष, बीमारी और मुफलिसी से भरा जीवन बिताया. अपनी रचनाओं और विचारों में उन्होंने हिन्दी के सत्ता तंत्र, इसकी जर्जरता और बर्बरता की ओर भी इशारे किये थे. हिन्दी की बदहाली की सबसे पहली निशानी तो उसके सरकारीकरण में दिख जाती है. हिन्दी को राजभाषा का दर्जा क्या मिला वो ऐसे राजसी ठाटबाट में चली गई कि अपनी मिट्टी और अपने जन से उसका अलगाव ही हो गया. ये बनीठनी हिन्दी, अंग्रेजी के साथ होड़ करने पर आमादा है. वो भूल गई कि उसका तो देश की अन्य भाषाओं के साथ एक गहरा आत्मिक नाता था. इस तरह देश की भाषाओं के बीच सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनैतिक दीवारें खिंच गईं.

एक अनुमान के मुताबिक देश में हिन्दी बोलने वाले करीब 50 करोड़ से ज्यादा लोग होंगे. लेकिन ऐसी सघन पैठ के बावजूद हिन्दी साहित्य में एक किताब को महज 400, 500 या हजार पाठक ही मिल पाते हैं. हिन्दी भूभाग में एक बड़ा हिस्सा उस शहरी आबादी का भी है जो मध्यवर्ग और उच्च मध्यवर्ग कहलाती है और जिसके पास तेजी से धन-संपत्ति और मनोरंजन के साधन आए हैं. नयी विलासिता उन्हें हासिल हुई है. लेकिन वे अपनी भाषा और साहित्य से भी दूर हुए हैं. हिन्दी दिवस भी एक आयोजन और एक प्रतीक की तरह हर साल आता जाता है लेकिन कोई हरकत इन तबकों में नहीं होती. आखिर कितने घरों में आज प्रेमचंद, रेणु, यशपाल, निराला, मुक्तिबोध, नागार्जुन, विनोद कुमार शुक्ल, रघुबीर सहाय जैसे लेखकों की रचनाएं रखी होंगी. इनके बाद की पीढ़ी के रचनाकारों को तो छोड़ ही दीजिए. क्या ये साहित्य विमुख जनता है या इसका उलट सही है?

आप जानकर हैरान होंगे कि आज भारत में हिन्दी के अखबारों की प्रसार संख्या सबसे ज्यादा है. देश के टॉप पांच अखबारों में हिन्दी के दो या तीन अखबार अक्सर रहते हैं. अखबारों को खूब विज्ञापन मिलते हैं. जाहिर है हिन्दी का पाठक वर्ग एक विशाल उपभोक्ता वर्ग भी है. हिन्दी सिनेमा फल-फूल रहा है. कमाई की इतनी आपाधापी को विकास का पैमाना मानें तो हिन्दी का भी तो अंतरारष्ट्रीय मकाम बनना चाहिए था. वो कहां है? विश्व भाषाओं की सूची में हिन्दी का स्थान क्या है. आज के नये मीडिया में हिन्दी को कितने लोग जानते पहचानते और इस्तेमाल करते हैं. 30 और 40 के दशक को छोड़ दें तो हिन्दी की कौन सी फिल्म पुरस्कृत हुई है. किस किताब को अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली है. किसे नोबेल मिला है. क्या हिन्दी की कोई रचना नोबेल के लायक नहीं रही या हिन्दी को उस प्रतिस्पर्धा तक पहुंचाने वाली शक्तियां ही शिथिल रही हैं. ये सारे सवाल बार बार सामने आते हैं.

हिन्दी के कितने उपन्यास कहानियां कविताएं फिल्म नाटक आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न भाषाओं खासकर अंग्रेजी में अनूदित हैं और विश्व के पाठकों द्वारा सराहे जा रहे हैं. चुनिंदा रचनाएं और चुनिंदा रचनाकार बेशक हैं लेकिन मुट्ठी भर उदाहरणों से तो बात बनती नहीं. बाजार की चमक ने भाषा और साहित्य के अंधेरों को रोशन नहीं किया तो इसका एक बड़ा दोष हिन्दी की बौद्धिक बिरादरी और साहित्य के दिग्गजों पर भी है. वे दिग्गज जो हिन्दी को एक मठ की तरह चलाते हैं. दूसरी ओर हिन्दी का प्रकाशन तंत्र है जो अपनी राजनैतिक रस्साकशी में इतना उलझा रहता है कि वो लगता है अंतराष्ट्रीय स्तर पर किसी होड़ में उतरने का साहस ही नहीं कर पाता. उसमें वो नैतिक माद्दा ही मानो नहीं रह गया है. ले देकर कुछ लघु पत्रिकाएं हिन्दी के सम्मान और गरिमा को जिलाए रखने की कोशिश करती दिखती हैं लेकिन उनके पास संसाधनों और निरंतरता का अभाव है.

लेकिन हिन्दी का उत्थान उसे बाजार से या सत्ता के साथ जोड़कर ही नहीं किया जा सकता. उसे अपनी जड़ों, अपने लोक और अपने जन की ओर लौटना चाहिए. हिन्दी के लेखकों और प्रकाशकों को गुटबंदियों और अहम के टकरावों से निकलना होगा. बात एटीट्यूड यानी रवैये की है. बौद्धिक ऐंठन को त्यागना होगा. नई सोच और नये लोगों को रास्ता देना होगा. इसी में हिन्दी दिवस की सार्थकता है.

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी

संपादनः आभा मोंढे

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