हिंसा की आग में घी का काम कर रहा है सोशल मीडिया | दुनिया | DW | 12.11.2018
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दुनिया

हिंसा की आग में घी का काम कर रहा है सोशल मीडिया

सोशल मीडिया पर फेक न्यूज या सूचनाओं को तोड़मरोड़ कर पेश करना आम हो चुका है. क्या पैसा कमाने की होड़ में ऑनलाइन कंपनियां हिंसा को बढ़ावा दे रही हैं?

म्यांमार में एक बौद्ध महिला ने दो मुस्लिम पुरुषों पर बलात्कार का आरोप लगाया और पुलिस में रिपोर्ट लिखवाई. एक स्थानीय भिक्षु ने यह जानकारी फेसबुक पर पोस्ट की और जल्द ही वहां हिंसा भड़क गई. अगले दो दिन तक मंडाले शहर में बहुसंख्यक बौद्ध और अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय के बीच हिंसक टकराव होता रहा जिसमें दो लोगों की जान भी चली गई और 19 अन्य घायल हो गए. स्थानीय प्रशासन शांति कायम करने में तब कामयाब हुआ जब मंडाले शहर में फेसबुक को अस्थाई रूप से ब्लॉक कर दिया गया.

बाद में पता चला कि जो कहानी फेसबुक पर चलाई गई थी, वह सच नहीं थी. इस मामले में पांच लोगों को अफवाह फैलाने का दोषी पाया गया जिसमें कथित रेप पीड़िता भी शामिल थी. बाद में उसने बताया कि थाने में रेप की रिपोर्ट लिखवाने के लिए उसे पैसे दिए गए थे. यह 2014 का मामला है और यह बताता है कि कैसे झूठी अफवाहों के चलते असल जिंदगी पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है.

पिछले साल करीब सात लाख रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार छोड़कर जाना पड़ा है. माना जा रहा है कि फेसबुक ने इस जातीय हिंसा को बढ़ावा देने के लिए पृष्ठभूमि प्रदान की. एक रिपोर्ट के मुताबिक म्यांमार में अल्पसंख्यकों ने फेसबुक का इस्तेमाल हिंसा भड़काने के लिए किया.

गलत तरीके से पेश किए जा रहे हैं तथ्य

एक गैर सरकारी संस्था की ओर से प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक सोशल मीडिया का इस्तेमाल तथ्यों और सूचनाओं को तोड़ने-मरोड़ने के लिए किया जा सकता है, जो बदले में विभिन्न समूहों के बीच हिंसा का कारण बन सकता है. सोशल मीडिया भले ही इस तरह के भेदभाव को इजाद ना करे, लेकिन जिस तरह से प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल भावनात्मक सामग्री को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है, वे मौजूदा पूर्वाग्रहों को बढ़ा सकते हैं. सोशल मीडिया से प्रेरित हिंसा उन देशों के लिए अनोखी नहीं है, जहां सालों से इंटरनेट पर सेंसरशिप रही है. इसके अलावा इंटरनेट पर गलत सूचना की वजह से श्रीलंका, इंडोनेशिया, भारत, मेक्सिको, अमेरिका और जर्मनी में भी हिंसक घटनाएं हुई हैं.

ब्रिटेन की वॉरविक यूनिवर्सिटी में एक अध्ययन के जरिए जर्मनी में 2015 से 2017 के बीच हुए हर शरणार्थी विरोधी हमले की पड़ताल की गई. मालूम चला कि शरणार्थियों के खिलाफ अपराध उन क्षेत्रों में होने की संभावना अधिक थी, जहां फेसबुक का इस्तेमाल अधिक किया जा रहा था. यह भी पाया गया कि कभी-कभी जब धुर दक्षिणपंथी दल अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी अपने फेसबुक पेज पर शरणार्थियों के खिलाफ पोस्ट लिखता था, तो अपराध में बढ़ोतरी होती थी.

शिक्षाविद यह कहने में सावधानी बरत रहे हैं कि कट्टरपंथी सामग्री पोस्ट करने, शेयर करने या उपभोग करने वाला विशाल समूह कभी अपराध नहीं करेगा. लेकिन बढ़ते सबूत हैं कि कुछ लोग अफवाहों और गलत सूचनाओं से इतने उत्तेजित हो जाते हैं कि वे प्रतिक्रिया देने पर मजबूर हो जाते हैं.

ऑक्सफोर्ड इंटरनेट इंस्टीट्यूट के शोधकर्ता भरत गणेश इन अफवाहों को दक्षिणपंथी गुटों से जोड़ कर देखते हैं. उन्होंने डॉयचे वेले को बताया, ''उन्होंने ऑनलाइन ऐसा नेटवर्क बनाया है जिसमें नफरत और लोगों में इंसानियत खत्म करना स्वीकार्य है." वह आगे कहते हैं, ''इस तरह की भाषा को विश्वसनीय बनाना वास्तव में एक ऐसा माहौल तैयार करना है जहां विशेष समुदायों के खिलाफ घृणा और हिंसा वैध हो.'' अगस्त 2018 में ट्विटर और फेसबुक पर फैली झूठी अफवाहों की वजह से जर्मनी के खेमनित्स शहर में करीब छह हजार लोग प्रदर्शनों में शामिल हुए.

यूट्यूब और फेसबुक का एल्गोरिदम जिम्मेदार

शोधकर्ताओं का मानना है कि जिस तरह से सोशल मीडिया कंपनियां काम करती हैं, उससे अफवाहों को बढ़ावा मिलता है. लोगों को अपनी साइट पर लंबे समय तक रोके रखने के लिए फेसबुक और यूट्यूब ऐसे एल्गोरिदम का इस्तेमाल करती हैं, जिससे यूजर के सामने ऐसी पोस्ट आती है, जिससे वह सहमत हो. इसे फिल्टर बबल कहा जाता है. विचारधारा के बुलबुले में फंसे यूजर्स ऐसी सामग्री देखते हैं, जहां उनके विचारों को कभी चुनौती नहीं दी जाती है.

कॉनराड आडेनाउअर फाउंडेशन से जुड़ी आतंकवाद विरोधी सलाहकार लिंडा श्लेगल कहती हैं कि इस तरह का बुलबुला ''डिजिटाइज्ड आतंकवादियों'' को जन्म दे सकता है. उन्होंने डॉयचे वेले से कहा, "वे कट्टरता को बढ़ावा दे सकते हैं. अगर चरमपंथी दृष्टिकोण है, तो उसे बार-बार सत्य के रूप में सूचित किया जाता है."

यूट्यूब के एल्गोरिदम के लिए बतौर इंजीनियर काम कर चुके गीऑम शासलॉट मानते हैं कि फिल्टर बबल का लोगों में नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. इससे निपटने के लिए उन्होंने 2016 में एल्गोट्रांसपरेंसी नाम की वेबसाइट शुरू की. यह वेबसाइट कोशिश करती है कि यूट्यूब के एल्गोरिदम को आसान बनाया जाए और पता चल सके कि यह कौन से वीडियो प्रमोट करती है.

शासलॉट बताया कि 2013 में उन्होंने यूट्यूब की नौकरी छोड़ी और उसके बाद वहां कई बदलाव किए गए, हालांकि ये नाकाफी थे. उनके मुताबिक, ''वे समस्या के मूल तक नहीं जाते हैं कि एल्गोरिदम का मकसद ही देखने के समय को बढ़ाना है.'' वे इसकी तुलना सड़क पर चल रही लोगों की लड़ाई-झगड़े से करते हैं जिसमें कुछ लोग शामिल होते हैं, कुछ लड़ाई को रुकवाते हैं और कुछ बस देखते रहते हैं.

जिन वीडियो को ज्यादा लोगों ने देखा होगा, उसे देखने और भी ज्यादा लोग आएंगे और साइट पर अधिक समय बिताएंगे. इससे ज्यादा विज्ञापन आएंगे और यूट्यूब को ज्यादा आमदनी होगी. लेकिन इसका मतलब है कि साइट विवादित वीडियो को बढ़ावा दे रही है. सूचनाओं के संचालन को लेकर टेक कंपनियों के तौर-तरीकों पर लोग चिंता जाहिर कर रहे हैं क्योंकि जिससे वीडियो या कंटेंट से अधिक विज्ञापन मिलेगा, उसी से समुदायों के बीच हिंसक झड़प भी हो सकती है. शासलॉट मानते हैं कि यह आगे चल कर समाज के लिए बेहद नुकसानदेह साबित होगा, लेकिन अफसोस एल्गोरिदम अभी इस बात को मापने के काबिल नहीं हैं.

रिपोर्ट: मॉर्गन मीकर/वीसी

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