हिंसक चुनावों से बांग्लादेश में तनाव बरकरार | दुनिया | DW | 06.01.2014
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

हिंसक चुनावों से बांग्लादेश में तनाव बरकरार

बांग्लादेश में हिंसा के बीच रविवार को हुए 10वें आम चुनाव में अवामी लीग पार्टी ने बढ़त बनाई हुई है. सोमवार को मिले अंतरिम नतीजों से विपक्ष के इन चुनावों की वैधता पर उठाए गए सवालों को बल मिला है.

देश के इतिहास में हुए सबसे हिंसक चुनावों के दौरान सुरक्षा बलों से मुठभेड़ में कम से कम 18 लोगों की मौत हो गई. मुख्य विपक्षी पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के समर्थकों पर आरोप है कि उन्होंने रविवार को 100 से भी ज्यादा मतदान केन्द्रों को आग लगा दी. राजधानी ढाका के आम निवासी दोनों राजनीतिक दलों के बीच चले आ रहे गतिरोध और हिंसा से तंग आ चुके हैं. ढाका में अकाउंटेंट की नौकरी करने वाले अब्दुर रहमान कहते हैं, "हम डर और चिंता के बीच दिन काट रहे हैं. इन दोनों बड़ी पार्टियों को किसी बात की चिंता नहीं. सिर्फ अल्लाह जानता है कि आगे हमारे साथ क्या होने वाला है."

चुनाव के अंतरिम नतीजों में अवामी लीग संसद की 300 सीटों में से 232 पर आगे चल रही है, जो कि बहुमत की सरकार बनाने के लिए काफी है. विपक्ष के बहिष्कार की वजह से आधी से ज्यादा सीटों पर सत्तारूढ़ पार्टी निर्विरोध जीतती बताई जा रही है. वोट प्रतिशत को लेकर अभी तस्वीर साफ नहीं हो पाई है. समाचार एजेंसी एपी ने चुनाव अधिकारी के हवाले से रिपोर्ट दी है कि सिर्फ 22 फीसदी वोटिंग हुई है. जबकि समाचार एजेंसी एएफपी के मुताबिक राजधानी ढाका में 22.7 प्रतिशत मतदाताओं ने मताधिकार का प्रयोग किया और "अगर यह आंकड़े पूरे देश में ऐसे ही हैं, तो यह बांग्लादेश के इतिहास में सबसे कम प्रतिशत का मतदान होगा".

'बैटलिंग बेगम्स'

दक्षिण एशियाई देश में राजनीतिक गतिरोध कई दशकों से चला आ रहा है. वर्तमान प्रधानमंत्री शेख हसीना और विपक्ष की नेता खालिदा जिया धुर विरोधी हैं. पिछले करीब 22 सालों से इन दोनों नेताओं ने बारी बारी 16 करोड़ की आबादी वाले इस देश में राज किया है. इनके बीच के विवाद को ही देश के राजनीतिक संकट का सबसे बड़ा कारण माना जाता है.

Bangladesch Wahlen 2014 Unruhen

विद्रोह के बीच रविवार को 100 से भी ज्यादा मतदान केन्द्रों को आग लगा देने की बात सामने आ रही है.

शेख हसीना और खालिदा जिया 'बैटलिंग बेगम्स' के तौर पर जानी जाती हैं. प्रधानमंत्री हसीना 1971 के संघर्ष के युद्ध अपराधियों पर मुकदमा चलाना चाहती हैं, जबकि उनका आरोप है कि जिया इन युद्ध अपराधियों को बचाने की कोशिश कर रही हैं. खालिदा जिया का आरोप है कि हसीना विपक्ष को कमजोर करने को लिए ये मुकदमे चलाना चाहती है.

तय हैं चुनावी नतीजे

विपक्षी पार्टी बीएनपी और सहयोगी दलों ने यह कह कर चुनाव का बहिष्कार किया कि प्रधानंमत्री शेख हसीना की सरकार में निष्पक्ष चुनाव नहीं होंगे. उनकी मांग थी कि सरकार इस्तीफा देकर कार्यवाहक सरकार की निगरानी में चुनाव कराए जिसे ठुकरा दिया गया. यूरोपीय संघ और अमेरिका ने भी चुनाव की निगरानी के लिए पर्यवेक्षकों को बांग्लादेश भेजने से मना कर दिया. पिछले एक साल में ही विपक्ष ने कई बार विरोध प्रदर्शन, हड़तालें और यातायात अवरुद्ध कर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश की, जिसको रोकने की कोशिश में कम से कम 293 लोगों की जान जा चुकी है.

विपक्ष के चुनाव बहिष्कार के कारण अवामी लीग की जीत पहले से ही तय मानी जा रही थी. इस तरह चुनाव कराए जाने से इस बात की संभावना थी कि सरकार विपक्ष के साथ बातचीत के लिए राजी हो जाएगी. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर देश में संकट इसी तरह बरकरार रहा तो पहले से आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे देश में हालत और बिगड़ जाएगी.

ढाका के एक प्रमुख अखबार डेली स्टार ने अपने संपादकीय लेख में इस चुनाव को देश के इतिहास में अब तक का सबसे खतरनाक चुनाव बताया है. अखबार कहता है कि ऐसे में अवामी लीग को मिली जीत को "पूर्वानुमानित और खोखली जीत माना जाएगा, जिससे न तो उसे जनादेश मिलता है और न ही राज करने की नैतिक स्वीकृति." अखबार ने हिंसा को बढ़ावा देने में विपक्ष की भूमिका की भी आलोचना की.

आरआर/एजेए (एपी, एएफपी)

DW.COM

संबंधित सामग्री

विज्ञापन