हास्य व्यंग्य के फन्ने खां चले गए | दुनिया | DW | 31.10.2013
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दुनिया

हास्य व्यंग्य के फन्ने खां चले गए

आमिर खान ने के पी सक्सेना से ’लगान’ के संवाद लिखने की फरमाइश की जिसे उन्होंने कुबूल किया. फिर तो जो सिलसिला चला उसने लगान, स्वदेस, हलचल और जोधा अकबर जैसी कई सुपरहिट फिल्में दीं. वैसे केपी सक्सेना पहले ही काफी मशहूर थे.

हिंदी फिल्मों का रास्ता उन्हें आमिर ने जरूर दिखाया लेकिन उन्हें सबसे ज्यादा शोहरत दिलाई दूरदर्शन पर प्रसारित उनके सीरियल "बीबी नातियों वाली" ने. इसकी पटकथा, कहानी और संवाद, सब कुछ केपी ने ही लिखे थे. अस्सी के दशक के शुरुआती दिनों में केपी के इस सीरियल की इतनी धूम थी कि महफिलों में उन्हें हीरो जैसी इज्जत मिलती थी.

जानदार लेखनी से हंसाते हंसाते लोगों के पेट में बल डाल देने वाले केपी का असली नाम कालिका प्रसाद सक्सेना था. उर्दू और अवधी के शब्दों के इस जादूगर की जीभ में पिछले कुछ समय से कैंसर हो गया था. गुरुवार सुबह उनका लखनऊ में निधन हो गया.

केपी बरेली में पैदा हुए और रेलवे के स्टेशन मास्टर बनकर पचास के दशक में लखनऊ आए. रोहेली जैसी तेज बोली बोलने वाले केपी ने लखनऊ के लोगों को जब निहायत नाजुक जबान में बातें करते सुना तो उनके अंदर गुदगुदी सी हुई. यही गुदगुदी हास्य बनकर उनके कलम से निकली. लखनऊ में ही उन्होंने अवधी पढ़ी और उसके लफ्जों का खूब सलीके से इस्तेमाल किया. करीब दो दर्जन से अधिक पुस्तकों के रचयिता केपी को हास्य व्यंग्य में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए 2000 में पदमश्री से नवाजा गया.

अपनी एक रचना '...टिन टिन साइकिल हमारी' में केपी लिखते हैं, आपको भी अच्छी तरह याद होगा कि कई वर्ष पहले तक एक नेता जी हुए जो सिर पर हरा कपड़ा बांधते थे. यानी राज नारायण. ये श्रीमान कुछ अरसा तक केंद्र में हेल्थ मिनिस्टर भी रहे. अपने निवास से संसद भवन तक साइकिल से जाते थे. कनाट प्लेस में 'हटो बचो' मचती थी कि मंत्री जी की साइकिल रही है. मैने पेपर में उनकी फोटो देखी. अब राम जाने कि साइकिल चलाना मंत्री जी का शौक था या दिखावा. बहरहाल हर युग में साइकिल गरीब की सवारी ही नहीं बड़े बड़ों की भी प्रिय रही है. यह दीगर बात है कि मैं उम्र भर साइकिल चलाना सीख पाया. जब 75 रुपए में मिलती थी तो गरीब मां 75 रुपए अफोर्ड नहीं कर सकती थी. जब खरीदने लायक हुआ तो शौक खत्म हो गया. अलबत्ता इसी लखनऊ में एक से एक फन्ने खां को साइकिल चलाते देखा है.

केपी के समकालीन और प्रसिद्ध व्यंग्यकार गोपाल चतुर्वेदी कहते हैं,"केपी ने व्यंग्य की अपनी दुनिया गढ़ ली थी जिसकी शब्दावली खालिस लखनवी थी. मूल रूप से लखनऊ के नहीं होने के बावजूद उनकी भाषा पर कोई लखनऊ वाला भी उंगली नहीं उठा सका." कवि प्रेम जनमेजय के मुताबिक हिंदी व्यंग्य को विशाल पाठक वर्ग से जोड़ने और उसे लोकप्रिय विधा बनाने में केपी का महत्वपूर्ण योगदान है. शरद जोशी और केपी सक्सेना ने मंच पर गद्य पाठ को संभव किया और नए आयाम प्रस्तुत किए. केपी हिंदी दैनिक हिंदुस्तान में नियमित रूप से लिखते थे, इसके सहायक सम्पादक हरजिंदर उन्हें याद करते हुए कहते हैं, "कभी कभी मेरे काम में देरी हो जाती थी लेकिन उनका व्यंग्य समय पर ही आता. लाल और नीली स्याही से लिखे गए खूबसूरत हैंडराइटिंग वाले उनके लिफाफे का इंतजार हम सब करते थे."

साहित्यकार शकील सिद्दीकी के मुताबिक हैरत इस बात की है कि लखनऊ की जबान की चाशनी को जितना केपी ने इस्तेमाल किया उतना शायद किसी ने नहीं. उनकी हर रचना में 'अमां मियां', 'जनाबे वाला', 'हुजूर जनाब', 'तशरीफ का टोकरा', 'वल्लाह', 'सुब्हान अल्लाह', 'उम्दा बहुत उम्दा', 'फरमाइये जनाब'... जैसे शब्द और खालिस लखनवी जबान के फिकरे उनके लेखन की पहचान थे. पुराने मुहावरों का इस्तेमाल भी उन्होंने खूब किया. कथाकार विजय राय को उनके लखनऊ के न होने पर यकीन ही नहीं आता. कहते हैं 'उनकी जुबान तो लखनवी ही थी.' रंगकर्मी राकेश उन्हें याद करते हुए कहते हैं कि उनके संवादों पर अक्सर किसी नाटक में अभिनय कठिन था क्योंकि संवाद पूरा करने से पहले ही हंसी आ जाती या गुदगुदी जैसा अहसास होने लगता .

रिपोर्ट: सुहेल वहीद, लखनऊ

संपादन: निखिल रंजन

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