स्वर्ग के सफर की कहानी | विज्ञान | DW | 15.10.2012
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विज्ञान

स्वर्ग के सफर की कहानी

मौत के बाद की जिंदगी और स्वर्ग नर्क का चक्कर जाने अनजाने सबके मन में आता है लेकिन कुछ लोगों को इसका अनुभव भी है. कम से कम वो तो यही मानते हैं. स्वर्ग के सफर से वापस लौटे एक शख्स की कहानी.

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इबान एलेक्जेंडर के लिए स्वर्ग का छोटा सा सफर सिरदर्द से शुरू हुआ. नवंबर 2008 में वर्जीनिया यूनिवर्सिटी के इस न्यूरोसर्जन के दिमाग के नियोकॉर्टेक्स ने दिमागी बुखार के लिए जिम्मेदार वायरस की चपेट में आ कर काम करना बंद कर दिया. नियोकॉर्टेक्स दिमाग का वह हिस्सा है जो संवेदी अनुभव और जागरूक सोच का काम संभालता है.

एलेक्जेंडर याद कर बताते हैं, "सात दिन के लिए मैं कोमा में था." इसी दौरान वो एक दूसरे जहान में थे, एलेक्जेंडर के मुताबिक, "ब्रह्मांड के एक दूसरे बड़े आयाम के सफर पर चला गया, वह आयाम जिसके अस्तित्व के बारे में मैंने सपने में भी नहीं सोचा था." उस दूसरे जहान में एलेक्जेंडर ने,"गहरे काले नीले आसमान" की बजाय "बड़े, हल्के और गुलाबी सफेद" बादल देखे. एलेक्जेंडर को वहां, "पारदर्शी जीवों के झुंड दिखाई पड़े जो टिमटिमा भी रहे थे, वैसी कोई दूसरी चीज पृथ्वी पर नहीं देखी."

स्वर्ग के इस सफर में एलेक्जेंडर अकेले नहीं थे. उनके साथ भरे गाल, गहरी नीली आंखें और सुनहरी भूरी लटों वाली एक युवा महिला भी थी जिससे उन्होंने "लाखों तितलियों" की मौजूदगी में बिना "किसी शब्द का इस्तेमाल किए" बातें की. किसी फिल्मी सितारे जैसी उस युवती ने कहा, "तुम्हें हमेशा प्यार मिलेगा और तुम आंखों के तारे बने रहोगे. यहां डरने की कोई बात नहीं. यहां तुम कुछ गलत नहीं कर सकोगे." एलेक्जेंडर अपनी कहानी याद करते हैं और उसे लोगों को समझाना चाहते हैं. उनकी यह कोशिश "प्रूफ ऑफ हैवेनः ए न्यूरोसर्जन्स जर्नी इनटू द आफ्टरलाइफ" (स्वर्ग का सबूतः एक न्यूरोसर्जन की मौत के बाद की जिंदगी का सफर) नाम की एक किताब के रूप में छपी है.

यह किताब इसी महीने की 23 तारीख को बाजार में आ रही है. किताब के प्रकाशक ने फिलहाल इंटरव्यू देने से मना कर दिया लेकिन प्रूफ ऑफ हैवेन का कुछ हिस्सा न्यूजवीक पत्रिका में छपने के बाद मौत के बाद की जिंदगी पर बहस शुरू हो गई है. हावर्ड मेडिकल स्कूल में पढ़ाने वाले प्रोफेसर की असाधारण बातों पर लोग शंका जता रहे हैं. न्यूजवीक की वेबसाइट पर एक शख्स ने लिखा है, "ऐसा लगता है कि उन्होंने एक गहरे लुभावने सपने से ज्यादा कुछ नहीं देखा." एक दूसरे पाठक ने लिखा है,"निजी कहानी चाहे जैसी हो वो किसी बात का सबूत नहीं हो सकती."

हालांकि एलेक्जेंडर के साथ आने वाले लोगों की भी कमी नहीं है. रोमन कैथोलिक समाचार सेवा की वेबसाइट कैथोलिक ऑनलाइन ने इससे सहमति जताते हुए लिखा है, "अगर मौत के बाद जिंदगी का कोई सबूत है तो इससे अच्छी बात और क्या होगी." एक अनुमान के मुताबिक तीन फीसदी अमेरिकी लोगों को मौत जैसा अनुभव हुआ है. इनमें से कुछ लोगों ने नीयर डेथ एक्सपीरियंस रिसर्च फाउंडेशन की वेबसाइट पर अपने अनुभव लिखे हैं. इस मुद्दे पर कई मशहूर किताबों के सह लेखक रह चुके पॉल पेरी बताते हैं, "हर साल हजारों लोगों को मौत जैसा अनुभव होता है और उनमें से कई की कहानी बिल्कुल एलेक्जेंडर जैसी है. यह अनुभव चमत्कार से भरी अनोखी दुनिया की झलकियां भी हो सकती हैं. दुर्भाग्य यह है कि इस बारे में फिलहाल सही तरीके से रिसर्च बहुत कम हो रहा है."

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कोलंबिया यूनिवर्सिटी में न्यूरोबॉयलोजी और इंसान में डर के बारे में पढ़ाई कर रहे मनोविज्ञानी डीन मॉब्स एलेक्जेंडर के अनुभवों को खारिज नहीं करते लेकिन यह कैसे हुआ इस पर सवाल जरूर उठाते हैं. मॉब्स का कहना है, "मुझे नहीं लगता कि इसमें असाधारण जैसी कोई बात नहीं. मेरा मानना है कि खासतौर से उलझन और तकलीफ की अवस्था में हमारा दिमाग कई तरह के अनुभवों की रचना कर सकता है. हमारा दिमाग दुनिया और जो हो रहा है उसकी व्याख्या करने की कोशिश करता है."

मॉब्स ने यह भी बताया कि कई लोग जो मौत जैसे अनुभव की बात करते हैं वो दरअसल कभी उस अवस्था के करीब नहीं होते जबकि मर कर लौटने वालों में से ज्यादातर को मौत के ठीक पहले की कोई बात याद नहीं रहती. न्यूजवीक में जो हिस्सा छपा है उसमें एलेक्जेंडर ने अपने अनुभवों को धार्मिक सांचे में ढाला है. उन्होंने यह भी लिखा है कि इस कहानी चर्च तक ले जाने में उन्हें कोई एतराज नहीं है.

एनआर/एएम (एएफपी)

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