स्टेटस या मजबूरी, एसयूवी जरूरी | जर्मन चुनाव 2017 | DW | 10.04.2014
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जर्मन चुनाव

स्टेटस या मजबूरी, एसयूवी जरूरी

आउडी क्यू सेवन की सन रूफ से बॉलीवुड की नाकाम अभिनेत्री नगमा जब मेरठ की सड़कों पर वोटों की आस में निकलती हैं, तो रेला लग जाता है. भीड़ संभाले नहीं संभलती.

कुछ ऐसा ही नजारा मथुरा का है जहां ड्रीमगर्ल हेमा मालिनी भी आउडी क्यू थ्री की सन रूफ से अपने लिए वोट मांग रही हैं. हेमा मालिनी और नगमा के लिए आउडी की सन रूफ चुनाव प्रचार का सुरक्षित तरीका है क्योंकि नगमा को इस चुनाव में कई बार अभद्रता तक झेलनी पड़ी. एक युवक को तो नगमा ने चांटा भी जड़ दिया. हेमा को भी बसंती की भाषा में कुछ को समझाना पड़ा. लेकिन आउडी हो या बीएमडब्ल्यू या फिर मर्सिडीज बेंज, नेताओं को बड़ी कारों के यही ब्रांड भाते हैं.

इसके बाद टोयोटा की एंडेवर है. कांग्रेस उपाध्यक्ष और अमेठी से चुनाव लड़ रहे राहुल गांधी इसी एंडेवर से चलते हैं, जिसे वे अक्सर खुद चलाते भी हैं. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के नामांकन के दिन राहुल ने खुद इसी एसयूवी में उन्हें बिठा कर कचहरी तक पहुंचाया. लेकिन प्रियंका वड्रा गांधी अमेठी और रायबरेली में प्रचार के लिए आती हैं तो लैंड क्रूजर से चलती हैं. उनका सुरक्षा अमला भी इसी एसयूवी से चलता है और प्रियंका इस कार के पैडल पर खड़ी होकर हाथ हिलाकर लोगों का अभिवादन करती हैं. जिन रास्तों पर आबादी है या उन्हें पता होता है कि लोग मिलेंगे, तो वह ड्राइवर के पड़ोस वाली सीट पर बैठ जाती हैं. लेकिन प्रियंका ने शायद कभी सन रूफ का इस्तेमाल नहीं किया.

बुकिंग के लिए लंबी लाइन

नेताओं के एसयूवी यानी स्पोर्ट यूटिलिटी व्हीकल से बढ़ते प्रेम का ही नतीजा है कि इन कारों के लिए चुनाव से पहले बुकिंग की लंबी लाइन लग जाती है फोर्ड कंपनी के एरिया मैनेजर सुधांशु मलिक के मुताबिक फोर्ड एसयूवी इकोस्पोर्ट की पिछले साल जुलाई में लॉन्च होते ही मांग अचानक बढ़ी. तब उन्हें नहीं पता था कि लोग इसे चुनाव के मद्देनजर गाड़ियां बुक करा रहे हैं क्योंकि यह सबसे सस्ती एसयूवी है जो छह लाख से शुरु होती है. बाकी सभी 18-20 लाख से शुरु होती हैं. उनके अनुसार इकोस्पोर्ट अभी भी एक महीने की बुकिंग पर ही मिल पा रही है. यह कार गैर राजनीतिक लोगों में भी लोकप्रिय है.

हालांकि इस लोकसभा चुनाव में एसयूवी की मांग में कमी रही. कारण चुनाव आयोग की चाबुक बताई जा रही है जिसने एक प्रत्याशी के साथ केवल तीन वाहन की ही इजाजत दी है और वाहन के खर्च को भी प्रत्याशी के चुनाव खर्चे में जोड़ा है. इसीलिए लखनऊ में पिछले साल फरवरी मार्च 2013-14 से अब तक केवल 163 एसयूवी पंजीकृत हुईं. इससे पहले जब भी चुनाव की बेला आई है तो एसयूवी की बिक्री में उछाल आया है. विधान सभा चुनाव से पूर्व लखनऊ में फरवरी-मार्च 2011-12 में लगभग 275 एसयूवी कारें बिकीं. इसी तरह जिला पंचायत चुनाव से पहले फरवरी-मार्च 2012-13 में भी करीब 400 एसयूवी बिकीं थीं. परिवहन अधिकारियों के मुताबिक हर चुनाव से पहले आठ सीटर वाहनों की बिक्री एकदम बढ़ जाती है. टोयोटा कंपनी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि यूपी में सबसे ज्यादा उनकी एसयूवी एंडेवर ही बिकती है. अक्टूबर 2013 से फरवरी 2014 तक लगभग 900 एंडेवर बिकीं. नाम नहीं बताया लेकिन मुस्कुराते हुए हामी भरी कि इसमें से 70 फीसदी से ज्यादा नेताओं ने ही खरीदीं.

नेता और बॉडीगार्ड चलें साथ

रेनो का डस्टर भी खूब पसंद आया. रेनो के सेल्स मैनेजर डीके सिंह इन कारों के अधिक बिकने का राज बताते हैं कि विदेशी ब्रांड छोड़ दें तो यहां की सभी एसयूवी डीजल वाहन हैं. इनका औसत माइलेज 15 किलोमीटर प्रति लीटर है. अंदर आठ दस लोगों के बैठने का पर्याप्त स्थान है. सिंह के मुताबिक नेता लोगों के साथ चार पांच लोग चलते ही हैं और एक दो गनर मिला लें तो किसी भी नेता के लिए एसयूवी ही उपयुक्त रहती है.

लेकिन बेहद चौड़े टायरों वाली ये बड़ी कारें राजनीतिक प्रतीक भी बन चुकी हैं. चुनाव में इनके इस्तेमाल का यह भी एक कारण है. भाजपा प्रवक्ता विजय पाठक कहते हैं कि इस कड़वी सच्चाई से कौन इनकार कर सकता है कि सत्ता के प्रतीक के रूप में विख्यात सफेद एम्बेस्डर कार का जमाना लद गया. यही वजह है कि मंत्रियों को छोड़ जिन्हें लाल बत्ती लगी सफेद अम्बेस्डर सरकार की ओर से मिलती है, अब कोई नेता अम्बेस्डर पर शायद ही नजर आता हो.

रिपोर्ट: एस वहीद, लखनऊ

संपादनः मानसी गोपालकृष्णन

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