स्कूल छोड़ते बच्चों की फिक्र कौन करेगा | ब्लॉग | DW | 15.07.2016
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

ब्लॉग

स्कूल छोड़ते बच्चों की फिक्र कौन करेगा

प्राइमरी शिक्षा में दाखिले को लेकर भारत का आंकड़ा बेशक सुनहरा है लेकिन आगे चलकर यही आंकड़ें बदरंग हो जाते हैं. यूनेस्को की रिपोर्ट में बताया गया है कि पांचवी के बाद बच्चे तेजी से स्कूल छोड़ रहे हैं

भारत सरकार के अपने आंकड़े भी कमोबेश यही बताते हैं और कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं की रिपोर्टें भी बताती हैं कि शैक्षिक ढांचे में ऐसी कई गड़बड़ियां निहित हैं जो हालात सुधरने नहीं देतीं. संयुक्त राष्ट्र की सांस्कृतिक और शैक्षणिक मामलो की एजेंसी यूनेस्को के सांख्यिकीय कार्यालय और ग्लोबल एजुकेशन मॉनिटरिंग रिपोर्ट के एक ताजा संयुक्त अध्ययन में पाया गया है कि भारत में करीब पांच करोड़ बच्चे अपर सेकेंडरी स्कूल तक पहुंच नहीं पाते हैं. यानी छठी, सातवीं और आठवीं की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते. वैश्विक स्तर पर, स्कूल से वंचित रह जाने वाले किशोरों की सबसे अधिक संख्या भारत में ही है.

2014 में यूनेस्को की रिपोर्ट ने भारत को सबसे निरक्षर देश आंका था. 2015 में देश का सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) महज साढ़े 23 प्रतिशत था जबकि साक्षरता दर थी 74 फीसदी से ज्यादा. देश में प्राइमरी और सेकेंडरी स्तर की शिक्षा पर अपने शोध, अध्ययन और सर्वे के लिए मशहूर संस्था प्रथम की 2014 की सालाना शिक्षा रिपोर्ट बताती है कि भले ही 96.7 फीसदी बच्चों ने स्कूलों में दाखिला लिया हुआ है, उनमें से 71 फीसदी जाते भी हैं लेकिन बच्चो का शैक्षणिक स्तर भी सोचनीय पाया गया. यानी दाखिले और एनरोलमेंट तो भरपूर हैं लेकिन शिक्षा का स्तर कमजोर है.

जाहिर है इसके जिम्मेदार बच्चे अकेले नहीं है. और यही तस्वीर जब रोजगार में लगे युवकों तक पहुंचती है तो वहां भी आंकड़े डराने वाले ही हैं. नेशनल स्किल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के आंकड़ों के मुताबिक तीस लाख स्नातकों में से सिर्फ पांच लाख ही नौकरी करने लायक होते हैं. यानी बाकी युवाओं में नौकरी के लायक गुणवत्ता या कौशल का अभाव पाया गया है. खतरे वाली बात ये है कि ये आत्मसम्मान और गरिमा भी छीन रही है. बुनियादी कौशल से वंचित शिक्षा एक कमजोर दयनीय नागरिक पैदा करती है.

सार्वभौम शिक्षा के लिए ड्रॉपआउट एक अहम चुनौती है. ये भी एक अनिवार्यता है कि बच्चों की शिक्षा बहाल रखी जा सके. वे दाखिले के बाद स्कूल न छोड़ दें. इस मामले में पांचवीं कक्षा और पहली कक्षा के छात्रों का अनुपात एक अहम सूचकांक है. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 2013 में 88 फीसदी से सुधर कर 2014 में 93 फीसदी तो हो गया लेकिन अभी भी स्थिति उत्साहजनक नहीं कही जा सकती है. मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सर्वे में बताया गया है कि प्राइमरी कक्षाओं में सालाना ड्रॉपआउट दर करीब पांच फीसदी है जबकि अपर प्राइमरी कक्षाओं में ये दर तीन फीसदी से कुछ ज्यादा है. लेकिन प्राइमरी में ये दर 2013 में साढ़े पांच फीसदी थी और इसके बरक्स अपर प्राइमरी में 2013 में ड्रॉपआउट दर ढाई फीसदी से कुछ ज्यादा थी. इसका अर्थ ये हुआ कि अपर प्राइमरी में स्कूल छोड़ने की दर बढ़ रही है.

ऐसा क्यों हो रहा है जबकि भारत में स्कूलों की संख्या बढ़ी हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2003 से 2014 के बीच करीब दो लाख प्राइमरी स्कूल खुले हैं जो भारत में कुल प्राइमरी स्कूलों का करीब साढ़े 24 फीसदी हैं. इनमें से 95 फीसदी स्कूलों की अपनी इमारत भी है. लेकिन ये इमारतें किस हाल में हैं, वहां की दीवारों, कक्षों, दरवाजों, खिड़कियों, शौचालयों की क्या स्थिति है- ये भी देखा जाना चाहिए. स्कूलों का बुनियादी ढांचा चरमराया हुआ है. क्लासरूम से लेकर खेल के मैदान तक हर जगह छेद ही छेद हैं. बिजली, पानी, शौचालय, बाउंड्री दीवार, लाइब्रेरी, कम्प्यूटर जैसी व्यवस्थाएं कहीं सही हैं तो कहीं सोचनीय.

स्कूल छोड़ने के इस तरह कई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कारण हम देख सकते हैं. जैसे टीचरों की संख्या का अभाव. पांच लाख से ज्यादा टीचर ठेके पर हैं. उनमें से आधे प्रशिक्षित भी नहीं हैं. वैसे प्रशिक्षित टीचरों का ही घोर अभाव है. टीचरों के प्रशिक्षण की व्यवस्था निजी हाथों में है और इस मामले में ये दुनिया का अकेला देश बताया जाता है जहां टीचरों की ट्रेनिंग का काम प्राइवेट हाथों में है. टीचर कम हैं तो जाहिर है उसका असर छात्र शिक्षक अनुपात पर पड़ रहा है. और नतीजा. नतीजा यही कि छह से 14 साल के सभी बच्चों को स्कूल में होना चाहिए, लेकिन करीब साढ़े तीन करोड़ अब भी बाहर हैं.

पढ़ाई लिखाई बीच में ही छोड़ देने की सबसे बड़ी वजहों में एक गरीबी भी है. बड़े होते बच्चे अपनी पारिवारिक विवशताओं और सामाजिक हालात की वजह से साधारण रोजगार की ओर मुड़ जाते हैं. दुकानों, ढाबों, गैराजों, छोटे होटलों, रेहड़ी जैसे छोटे व्यवसायों में इस उम्र के बच्चों को देखा जा सकता है. दरअसल बेहतर संरचना के अलावा ऐसी नीतियों की भी जरूरत है जिसमें सीखने की पूरी अवधि के विभिन्न चरणों में आने वाली बाधाओं को दूर करते रह सकें. एक ऐसी मानवीय और पारदर्शी और कर्तव्यनिष्ठ निगरानी व्यवस्था की जरूरत है जो अपने बच्चों को न सिर्फ स्कूल लाए बल्कि ये सुनिश्चित भी करे कि वे पूरी पढ़ाई करके निकलें.

DW.COM