स्कूलों में भी हैं बच्चे असुरक्षित | दुनिया | DW | 28.07.2014
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दुनिया

स्कूलों में भी हैं बच्चे असुरक्षित

बंगलोर में छह वर्ष की एक बच्ची के साथ स्कूल में ही हुए बलात्कार की घटना के बाद स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा का सवाल अहम हो गया है. बच्चों के उत्पीड़न के लगातार बढ़ते मामले चिंता पैदा करते हैं.

भारत में स्कूलों को ज्ञान का मंदिर समझा जाता है. इन्हें बच्चों के वर्तमान और भविष्य गढ़ने का केन्द्र माना जाता है. लेकिन पिछले कुछ सालों से स्कूलों के भीतर ही बच्चों के शोषण और यौन उत्पीड़न की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं. महिला एवं बाल विकास कल्याण मंत्रालय द्वारा कराए गए एक अध्ययन के अनुसार हर तीन में से दो स्कूली बच्चे यौन उत्पीड़न का शिकार होते हैं.

बढ़ रहे हैं बच्चों के खिलाफ अपराध

बच्चों की सुरक्षा भारत में गंभीर समस्या के रूप में उभर रही है. बच्चों के खिलाफ हैवानियत की घटनाओं में लगातार वृद्धि हो रही है. स्कूलों में भी बच्चे सुरक्षित नहीं हैं. राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के मुताबिक बीते तीन सालों में स्कूलों के भीतर बच्चों के साथ होने वाले शारारिक प्रताड़ना, यौन शोषण, दुर्व्यवहार और हत्या जैसे मामलों में तीन गुना बढ़ोतरी हुई है. शिक्षकों और स्कूल कर्मचारियों के द्वारा ही बच्चों के उत्पीड़न की घटनाएं पिछले कुछ सालों में काफी बढ़ी हैं.

बाल सुरक्षा एक्ट 2012 के अस्तित्व में आने के बाद ऐसे मामले ज्यादा सामने आए हैं. अधिवक्ता राजकुमार सिंह का कहना है की पहले अपराधों को दर्ज नहीं कराया जाता था लेकिन अब पालकों में जागरूकता आने के कारण बच्चों के खिलाफ अपराध के दर्ज मामले में वृद्धि देखी गयी है. मनोविज्ञानी प्रोफेसर अन्शुला कृष्णा कहती हैं कि बच्चों के खिलाफ हो रहे अपराध खासतौर पर यौन अपराध के ज्यादातर मामले सामने नहीं आ पाते क्योंकि बच्चे समझ ही नहीं पाते कि उनके साथ कुछ गलत हो रहा है. अगर वह समझते भी हैं तो डांट के डर से अभिभावकों से इस बारे में बात नहीं करते हैं. महिला एवं बाल विकास कल्याण मंत्रालय के अध्ययन में भी यही बात सामने आई है.

अदालती पेचीदगियां

राजकुमार सिंह कहते हैं कि बच्चों के खिलाफ यौन उत्पीड़न के ज्यादातर मामले लम्बी अदालती कार्यवाई के शिकार हो जाते हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार 2013 में केवल 15.3 प्रतिशत मामलों का ही अदालत में ट्रायल पूरा हो पाया. लगभग 85 प्रतिशत मामले देश भर की अदालतों में लंबित हैं. अदालत में दोष सिद्ध कर पाना भी अभियोजन पक्ष के लिए टेढ़ी खीर साबित होती है. पिछले साल केवल साढ़े इकतीस प्रतिशत मामलों में दोषी को सजा हो पायी.

बाल अधिकार कार्यकर्त्ता और अधिवक्ता आरती चंदा का कहना है कि अदालती प्रक्रिया के प्रति अभिभावकों की उदासीनता भी मामलों के निपटारे में बाधक बनती है. उनके अनुसार ज्यादातर पालक अपने बच्चों को हादसे की याद से भी दूर रखना चाहते हैं और ऐसे में अदालत आने से परहेज करना स्वाभाविक है.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार बच्चों के खिलाफ अपराध के मामलों में दिल्ली अगुआ है. पिछले साल दिल्ली शहर में 6199 अपराध दर्ज किये गए. आंकड़ों के अनुसार दिल्ली में रोजाना 16 बच्चों के खिलाफ अपराध होते हैं. मुम्बई इस मामले में दिल्ली से बेहतर है जहां सिर्फ 902 मामले दर्ज किये गए. इस दौरान कोलकाता में 281 जबकि चेन्नई में केवल 112 मामले प्रकाश में आये. शहरों में श्रीनगर बच्चों के लिए सर्वाधिक सुरक्षित शहर के रूप में सामने आया है. राज्यों में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में बच्चों के खिलाफ काफी अपराध सामने आये हैं.

जागरूकता जरूरी

प्रोफेसर अन्शुला कृष्णा कहती हैं कि बच्चों के खिलाफ बढ़ रहे यौन उत्पीड़न के मामलों पर जागरूकता के जरिये रोक लगाई जा सकती है. उनका कहना है कि अकेले कानून से कुछ नहीं हो सकता. उन्होंने दो स्तरों पर जागरूकता की आवश्यकता जताते हुए कहा कि बच्चों के साथ ही अभिभावकों को भी जागरूक किया जाना जरूरी है. स्मिता रावत कहती हैं, “यौन अपराधों को रोकना है तो स्कूली पाठ्यक्रम में इसे शामिल करना चाहिए. अभिभावकों और शिक्षकों के बीच बेहतर तालमेल से बच्चों समझाना आसान होगा.”

बाल अधिकार कार्यकर्त्ता आरती चंदा के अनुसार ज्यादातर मामलों में बच्चों को शिकार बनाने वालों में उनके करीबी ही होते हैं. ये स्कूल बस का ड्राइवर, कंडक्टर, शिक्षक या स्कूल का कोई कर्मचारी हो सकता है. इनसे बचने के लिए बच्चों को यह सिखाना होगा कि वे इस बात की पहचान कर सकें कि कोई उन्हें गलत इरादे से छू रहा है. आरती चंदा कहती हैं, "अभिभावकों को अपने बच्चों को ऐसे मामलों की तुरंत शिकायत करने के लिए प्रेरित करना चाहिए."

रिपोर्ट: विश्वरत्न श्रीवास्तव, मुंबई

संपादन: महेश झा

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