सोशल मीडिया पर अंकुश लगाने की कोशिश | दुनिया | DW | 10.08.2018
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दुनिया

सोशल मीडिया पर अंकुश लगाने की कोशिश

क्या केंद्र सरकार अगले साल होने वाले आम चुनावों से पहले अपने सियासी हक में सोशल साइटों की निगरानी करना चाहती है? सोशल मीडिया की निगरानी और उस पर अंकुश लगाने की सरकार की मंशा की वजह से यह सवाल उठने लगा है.

बीते सप्ताह सुप्रीम कोर्ट की घुड़की के बाद भारत सरकार ने देश भर में सोशल मीडिया हब स्थापित करने संबंधी अपनी अधिसूचना तो वापस ले ली है. लेकिन दूसरी ओर, दूरसंचार विभाग ने इंटरनेट व टेलिकॉम सर्विस प्रोवाइडरों से फेसबुक, व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम और टेलिग्राम जैसी सोशल नेटवर्किंग साइटों को ब्लॉक करने के विकल्प तलाशने को कहा है. सरकार की दलील है कि राष्ट्रहित पर खतरा होने की हालत में ही ऐसा किया जाएगा.

निगरानी व नियंत्रण

इससे पहले सरकार ने देश के विभिन्न राज्यों में ऐसे हब स्थापित करने की योजना बनाई थी और इसके लिए दो हफ्ते के भीतर निविदाएं भी खोली जानी थीं. उसकी योजना डाटा प्रोटेक्शन एजेंसी (डीपीए) नामक एक नया नियमन प्राधिकरण की स्थापना करने की थी. लेकिन तृणमूल कांग्रेस विधायक महुआ मैत्र की एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने चेताया था कि प्रस्तावित निगरानी हब निजता का उल्लंघन और निगरानी का हथियार बन सकता है. उसके बाद ही सरकार ने उक्त अधिसूचना को वापस लेने का एलान किया.

अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने बीते दो अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि सरकार इस मुद्दे पर अपनी अधिसूचना वापस ले रही है. उक्त हब की स्थापना के लिए तैयार निविदा के कागजात में कहा गया था कि सफल बोलीकर्ता को तमाम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से डिजिटल मीडिया संबंधी सामग्री एकत्र करनी होगी, वह चाहे खबरों के तौर पर हो या फिर ब्लॉग के. केंद्रीय सूचना व प्रसारण मंत्रालय के तहत काम करने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी ब्राडकास्ट कंसल्टेंट इंडिया लि. ने इसके लिए एक साफ्टवेयर की आपूर्ति के लिए निविदा भी जारी की थी. सरकार का इरादा इसके तहत सोशल मीडिया के माध्यम से सूचनाओं को एकत्र करने का था. इसमें जिला-स्तर पर काम करने वाले मीडिया कर्मियों के जरिए सरकार सोशल मीडिया की सूचनाओं को एकत्र करके यह पता लगाने का प्रयास करती कि सरकारी योजनाओं पर लोगों का क्या रुख है.

याचिकाकर्ता महुआ मैत्र के वकील अभिषेक सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी थी कि सरकार ने सोशल मीडिया हब की स्थापना का फैसला किया है और इसके लिए 20 अगस्त को निविदाएं खोली जाएंगी. उनका कहना था कि सरकार प्रस्तावित हब की सहायता से सोशल मीडिया की सामग्री की निगरानी करना चाहती है. अदालत की खंडपीठ ने भी सरकार की मंशा पर सवाल उठाए थे. उसके बाद सरकार ने उक्त अधिसूचना वापस लेने का फैसला किया.

लेकिन अब वह दूरसंचार विभाग की नोटिस के जरिए घुमाकर नाक पकड़ने का प्रयास कर रही है. सरकार ने टेलिकॉम आपरेटरों और इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियों से इस मामले में तकनीकी जानकारी मांगी है कि जरूरत पड़ने पर विभिन्न सेवाओं को कैसे बंद किया जा सकता है?  विभाग ने बीती 18 जुलाई को इन सबको भेजे अपने पत्र में पूछा है कि अगर राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में है, तो क्या ऐसी सेवाओं को बंद किया जा सकता है? दूरसंचार विभाग ने सूचना तकनीक कानून की धारा 69ए के तहत उक्त राय मांगी है. केंद्र सरकार की दलील है कि वह सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफवाहों की वजह से भीड़ के हाथों पिटाई के बढ़ते मामलों पर अंकुश लगाने के लिए ऐसा कर रही है. लेकिन पर्यवेक्षक इस कदम को बीजेपी की सियासी रणनीति और अगले साल होने वाले आम चुनावों से जोड़ कर देख रहे हैं.

बीती चार जुलाई को दूरसंचार विभाग और आपरेटरों की बैठक में पहली बार इस मुद्दे पर चर्चा हुई थी. इसमें सरकार ने मोबाइल कंपनियों से इस बात की संभावना का पता लगाने को कहा था जिनकी सहायता से जरूरत पड़ने पर कुछ मोबाइल एप्लीकेशंस को बंद किया जा सके. इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स एसोसिएशन ने सरकार की पहल का समर्थन किया है. एसोसिएशन के अध्यक्ष राजेश छरिया कहते हैं, "अगर सेवा प्रदाता कंपनियां और सोशल मीडिया ऐप यहां काम करना चाहते हैं तो उनको देश के कानून का सम्मान करना होगा. अगर वह नियमों का उल्लंघन कर राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बनते हैं तो उनको ब्लॉक करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.”

लेकिन दूरसंचार कंपनियां ऐसा करने के पक्ष में नहीं हैं. सेलुलर्स आपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के महानिदेशक राजन मैथ्यूज कहते हैं, "बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाले किसी ऐप को बंद करना इस दिशा में आगे बढ़ने का बेहतर तरीका नहीं है. कुछ लोगों की कथित गलती की सजा किसी खास ऐप का इस्तेमाल करने वाले तमाम लोगों को देना ठीक नहीं है.”

देश में नफरत फैलाने वाली और अपमानजनक खबरों के खिलाफ कानूनी प्रावधान तो हैं लेकिन सोशल या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर निगरानी के लिए कोई समुचित साइबर कानून नहीं है. ऐसे में सरकार सोशल मीडिया नेटवर्क पर अंकुश लगाने के लिए इंटरनेट बंद करने जैसे वैकल्पिक उपाय अपनाती रही है. इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स रिलेशंस की ओर से बीते साल किए गए एक अध्ययन में कहा गया था कि 21 महीनों के दौरान जिन 54 देशों में इंटरनेट बंद करने की घटनाएं हुई हैं उनमें ऐसी 30 घटनाओं के साथ भारत पहले स्थान पर है. बीते पांच वर्षों के दौरान ऐसे मामले लगातार बढ़े हैं. अकेले 2017 में देश के विभिन्न राज्यों में इंटरनेट सेवाएं आठ हजार घंटे से भी ज्यादा समय के लिए बंद की गई थीं.

साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को इंटरनेट पर नियंत्रण करने की बजाय जमीनी स्तर पर कानूनी प्रावधानों को लागू करने पर ध्यान देना चाहिए. एक विशेषज्ञ सुबीर जाना कहते हैं, "सरकार को भीड़ के हाथों पिटाई जैसी घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए मौजूदा कानूनों को कड़ाई से लागू करने पर ध्यान देना चाहिए. लेकिन लगता है कि उसकी मंशा कुछ और है.” एक अन्य साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ देवेश भाडुड़ी की दलील है कि मौजूदा दौर में कोई सरकार अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश नहीं लगा सकती. वह कहते हैं, "इंटरनेट और सोशल मीडिया नेटवर्क पर पाबंदी लगाने और उनकी निगरानी करने के प्रयासों की बजाय सरकार को वैकल्पिक तरीकों पर विचार करना चाहिए. उसे हिंसा के मामलों में राज्य सरकारों व संबंधित एजेंसियों के साथ तालमेल बना कर भीड़ के हाथों पिटाई के मामलों की जांच कर दोषियों को कड़ी सजा दिलाने की पहल करनी चाहिए.” विशेषज्ञों का कहना है कि इंटरनेट या सोशल मीडिया को पाबंदी की बेड़ियों में जकड़ना इस समस्या का समाधान नहीं है.

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