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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ वर्चुअल रैली में हिस्सा लेते हुए
फाइल फोटो (सितंबर 2020): बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ वर्चुअल रैली में हिस्सा लेते हुएतस्वीर: Manish Kumar

सेनारी नरसंहार का दोषी कौन, सुप्रीम कोर्ट जाएगी बिहार सरकार

मनीष कुमार
२४ मई २०२१

बिहार के जहानाबाद जिले के सेनारी नरसंहार मामले में पटना हाईकोर्ट ने बीते 21 मई को निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए सभी 14 दोषियों को बरी कर दिया. इस फैसले के खिलाफ बिहार सरकार अब सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रही है.

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बिहार सरकार द्वारा अब सर्वोच्च अदालत में 90 दिनों के अंदर स्पेशल लीव पीटिशन (एसएलपी) दायर किया जाएगा. महाधिवक्ता ने इस संबंध में अपनी राय दे दी है. इधर, इस फैसले को लेकर यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर 22 साल पहले 18 मार्च, 1999 को 34 लोगों की हत्या को किसने अंजाम दिया था.

अरवल जिला मुख्यालय से महज 32 किलोमीटर दूर वंशी थाना क्षेत्र के इस गांव में माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) के दस्ते ने चुन-चुन कर सवर्ण जाति विशेष के 37 लोगों को गांव के ही मंदिर के पास इकट्ठा किया और गला रेतकर उन्हें मार डाला था. रात साढ़े सात से दस बजे के बीच वारदात को अंजाम दिया गया. इनमें अरुण शर्मा गला काटे जाने के बाद भी बच गए जबकि मोहन शर्मा घायल होते हुए शवों के ढेर में दब गए थे. जीवित बचे एक और जख्मी रिकेश कुमार की अगले दिन मौत हो गई थी. इस घटना के अगले दिन पटना हाईकोर्ट के तत्कालीन रजिस्ट्रार पद्मनारायण सिंह अपने गांव सेनारी पहुंचे. परिवार के आठ लोगों की लाशें देख उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उनकी भी वहीं मौत हो गई. कहा जाता है कि सेनारी गांव में भू-स्वामियों और भूमिहीनों के बीच कोई झगड़ा नहीं था. नक्सली भी सक्रिय नहीं थे. करीब 300 घरों वाले इस गांव में सभी अमन-चैन से रह रहे थे.

जहानाबाद की जिला अदालत ने इस लोमहर्षक हत्याकांड की सुनवाई पूरी करने के बाद 15 नवंबर, 2016 को अपने फैसले में 11 लोगों को मृत्युदंड तथा तीन अन्य को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. निचली अदालत के फैसले की संपुष्टि के लिए बिहार सरकार ने हाईकोर्ट में डेथ रेफरेंस दायर किया था जबकि दोषियों में मुंगेश्वर यादव व अन्य की ओर से हाईकोर्ट में फैसले के खिलाफ अपील दायर की गई थी. अंतत: सुनवाई की प्रक्रिया पूरी होने के बाद पटना हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अरविंद कुमार सिंह व न्यायमूर्ति अश्विनी कुमार सिंह की अदालत ने सभी दोषियों को बरी करते हुए तुरंत रिहा करने का आदेश दिया. इसी से जुड़े एक अन्य मामले में मौत की सजा पाए हुए दुखन राम को भी खंडपीठ ने बरी कर दिया है. इस मामले में वे अकेले अभियुक्त थे.

पूरा सिस्टम सवालों के घेरे में

हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद सेनारी एक बार फिर सुर्खियों में है. साक्ष्य के अभाव में अभियुक्तों की रिहाई के फैसले से पीडि़त पक्ष में एक ओर जहां मायूसी है वहीं यह चर्चा भी तेज हो गई है कि पुलिस जांच के दौरान पूरी कानूनी प्रक्रिया का अनुपालन नहीं किए जाने से ऐसा हुआ. कानून के जानकार बताते हैं कि कहीं न कहीं सही तरीके से इन्वेस्टिगेशन (पड़ताल) नहीं की गई. अभियुक्तों का पक्ष रखने वाले अधिवक्ता अंशुल कुमार के अनुसार ‘‘गवाहों के बयान में विरोधाभास तथा पुलिस अनुसंधान में खामियों की वजह से अदालत इस निष्कर्ष तक पहुंचा.'' अदालत के समक्ष आए आरोपितों में कोई एफआइआर में नामित भी नहीं था. रात में हुई इस घटना में गवाह इस स्थिति में नहीं थे कि अंधेरे में वे अभियुक्तों की पहचान कर सकें. जिस वक्त वारदात को अंजाम दिया गया उस वक्त वहां रोशनी का कोई अन्य स्त्रोत भी नहीं था. जानकार बताते हैैं कि दरअसल पुलिस की लापरवाही से ही ऐसे मामलों में दोषी बरी हो जाते हैं.

पटना हाईकोर्ट के अधिवक्ता मनींद्र नाथ तिवारी कहते हैं, ‘‘ऐसा नहीं है कि सेनारी मामले में ही अदालत ने निचली अदालत के फैसले को पलटा है. जहां तक मुझे पता है, नरसंहार के अन्य मामलों में भी हाईकोर्ट ने दोषियों को बरी किया है. पुलिस कुछ दिनों तक तो सक्रिय रहती है, किंतु जैसे-जैसे समय बीतता जाता है सक्रियता कम होती जाती है. साक्ष्यों-सूबुतों को पुलिस सहेज कर न ही रख पाती है और न ही उसे दमदारी से अदालत में पेश कर पाती है. आखिर, अदालत तो साक्ष्यों के आधार पर ही फैसला सुनाती है.'' वहीं बिहार के पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) अभयानंद कहते हैं, ‘‘अगर पुलिस ने साक्ष्य इकट्ठा कर लिया, लेकिन प्रक्रियागत तरीके से ऐसा नहीं किया गया तो उसकी कोई विश्वसनीयता नहीं रह जाती है. अभियुक्तों का बरी होना साक्ष्य के अभाव के वजह से नहीं, बल्कि पुलिस अनुसंधान में तय प्रक्रिया का पालन नहीं होने की वजह से होता है.''

इधर, बिहार सरकार के एडवोकेट जनरल (महाधिवक्ता) ललित किशोर ने पटना हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च अदालत जाने की राय राज्य सरकार को दी है. जल्द ही इसकी प्रक्रिया शुरू की जाएगी. उनके अनुसार इस कांड में जो साक्ष्य थे, उसके आधार पर निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा जाना चाहिए था. इन्वेस्टिगेशन में कुछ खामियां जरूर थीं, किंतु जांच के दौरान जो साक्ष्य सामने आए थे उसमें हाईकोर्ट को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए था. कहते हैं, ‘‘अदालत ने पेश किए गए साक्ष्यों को नहीं माना और संदेह का लाभ देते हुए दोषियों को बरी कर दिया. इस फैसले के खिलाफ हम सुप्रीम कोर्ट जाएंगे.''

काफी पुराना है नरसंहारों का इतिहास

बिहार में जातीय हिंसा के चलते होने वाले नरसंहारों का इतिहास काफी पुराना है. राज्य में समय-समय पर अलग-अलग इलाकों में वर्ग संघर्ष की परिणति नरसंहारों के रूप में हुई. जानकार बताते हैं कि राज्य में भोजपुर जिले के अकोड़ी गांव से 1976 में जातीय हिंसा की शुरुआत हुई थी. भूमिहीनों और भू स्वामियों के बीच शुरू हुआ यह संघर्ष समय के साथ अगड़ों-पिछड़ों और दलितों की लड़ाई में तब्दील हो गया. यह दौर 2000 तक चला. सेनारी के अलावा लक्ष्मणपुर बाथे, मियांपुर, शंकरबिगहा, नारायणपुर, बेलछी, बथानी टोला व बारा में नरसंहार हुए. पटना जिले के बेलछी में 1977 में हुए नरसंहार में खास पिछड़ी जाति के लोगों ने ही 14 दलितों की हत्या कर दी थी. नरसंहार की यह सबसे पहली चर्चित घटना थी. इसी साल सत्ता से बाहर हुईं इंदिरा गांधी पीडि़त परिवारों से मिलने हाथी पर चढक़र बाढ़ प्रभावित इस गांव में पहुंचीं थीं. वहीं गया जिले के बारा में 1992 में 35 सवर्णों की हत्या कर दी गई थी. जबकि 1996 में भोजपुर के बथानी टोला गांव में 22 दलितों व मुस्लिमों को मौत के घाट उतार दिया गया था. कहा जाता है कि बारा की घटना के प्रतिशोध में बथानी टोला नरसंहार को अंजाम दिया गया था.

इसी तरह जहानाबाद जिले के शंकरबिगहा में वर्ष 1999 में 22 दलितों की हत्या कर दी गई थी. इसी साल इसी जिले के नारायणपुर गांव में 11 दलितों को मार डाला गया था. सेनारी हत्याकांड को इन्हीं दो घटनाओं का बदला बताया जाता है. 1997 में लक्ष्मणपुर बाथे में राज्य का सबसे बड़ा नरसंहार हुआ था जिसमें 58 लोगों की जान गई थी. वारदात को अंजाम देने का आरोप रणवीर सेना पर लगा था. इस घटना ने पूरे जनमानस को झकझोर दिया था. मारे जाने वालों में गर्भवती महिलाएं व एक वर्ष तक का बच्चा भी शामिल था. औरंगाबाद के मियांपुर में 2000 में हुए नरसंहार में 35 दलितों को मार डाला गया था. इसके बाद खगड़िया जिले के अलौली में 01 अक्टूबर, 2007 में पिछड़ी जाति के एक दर्जन लोगों की हत्या कर दी गई थी. नीतीश कुमार के मुख्यमंत्रित्वकाल की यह पहली घटना थी. शुक्र है, इसके बाद बिहार में अब तक नरसंहार जैसी कोई भी घटना नहीं हुई.

तेज हुई सियासत

पटना हाईकोर्ट के इस फैसले पर अपने-अपने नफा-नुकसान का आकलन करते हुए राजनीतिक दलों ने एक-दूसरे पर सियासी हमले तेज कर दिए हैं. भाजपाा-जदयू ने राजद पर नरसंहारों पर राजनीतिक रोटी सेंकने का आरोप लगाया है वहीं कांग्रेस ने चुप्पी फिलहाल कुछ कहने से इंकार किया है जबकि राजद ने सुप्रीम कोर्ट जाने के बिहार सरकार के फैसले को राजनीति से प्रेरित करार दिया है. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री व भाजपा के वरिष्ठ नेता सुशील कुमार मोदी ने कहा है कि सेनारी नरसंहार के आरोपियों का बरी हो जाना दुर्भाग्यपूर्ण है. 34 लोगों का नरसंहार हुआ तो आखिर कोई तो गुनहगार होगा. उन्होंने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने के निर्णय की प्रशंसा करते हुए राजद से पूछा है कि आखिर क्या कारण था कि 2005 से पहले बिहार में जातीय हिंसा चरम पर थी. उन्होंने कहा कि दरअसल राजद एकसाथ रणवीर सेना और एमसीसी को संरक्षण दे अपनी राजनीतिक रोटी सेंकता रहा. दोनों को लड़ा कर राजद ने पंद्रह वर्षों तक राज किया.

भाजपा प्रवक्ता मनोज शर्मा ने कहा है कि यह फैसला तत्कालीन राजद सरकार की साजिश का परिणाम है. तत्कालीन सरकार ने उस समय ही मामले को कमजोर बना दिया था. यह सरकार की सोची-समझी साजिश थी. इस मुद्दे पर पूर्व मंत्री व जदयू के वरिष्ठ नेता नीरज कुमार कहते हैं, " सेनारी नरसंहार के अभियुक्तों का रिहा होना लालू-राबड़ी सरकार की अराजक पुलिसिंग का नतीजा है. उन्होंने कहा कि आखिर कोई तो कातिल होगा." वहीं इस फैसले पर कांग्रेस के विधान पार्षद प्रेमचंद मिश्रा ने फिलहाल कुछ भी कहने से इंकार किया जबकि राजद के वरिष्ठ नेता व पूर्व मंत्री श्याम रजक ने कहा कि इस फैसले के पहले भी कई नरसंहारों में फैसले आए थे. दोषियों को बरी कर दिया गया था, तब सरकार उसके खिलाफ ऊपरी अदालत में क्यों नहीं गई थी. उस समय सरकार ने क्यों चुप्पी साध ली थी.

जाहिर है, वजह जो भी रही हो हाईकोर्ट ने साक्ष्यों-सूबुतों के आधार पर अपना फैसला दे दिया है. आखिर अदालत में तो पुलिस के अनुसंधान की विश्वसनीयता की ही ट्रायल किया जाता है. अब यह तो विवेचना का विषय रह गया है कि सिस्टम में चूक आखिर कहां रह गई.

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