′सुमंगली′ नहीं बंधुआ मजदूर बनी लड़कियां | दुनिया | DW | 16.08.2015
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दुनिया

'सुमंगली' नहीं बंधुआ मजदूर बनी लड़कियां

तमिलनाडु में एक लाख से भी ज्यादा लड़कियां मिलों में "बंधुआ मजदूर" हैं. दलाल गरीब परिवारों को काम का कॉन्ट्रेक्ट दिलाने के बहाने ठगते हैं और उनकी बेटियां कताई मिलों में शोषण की शिकार बनती हैं.

कई सालों से एजेंटों का तमिलनाडु के गरीब परिवारों में जाकर उन्हें बेहतर जीवन का सपना दिखाने का सिलसिला चल रहा है. वे लड़कियों और महिलाओं को हजारों सूती मिलों में ले जाते हैं, जो भारत में कृषि के बाद सबसे ज्यादा लोगों को रोजगार देने वाली टेक्सटाइल इंडस्ट्री का हिस्सा हैं.

सुदूर, कम विकसित इलाकों से महिलाओं को ले जाकर काम दिलाना, पैसे कमाने का मौका देना तो भारत जैसे देश में महिला सशक्तिकरण की सशक्त गाथा होनी चाहिए फिर समस्या कहां है. असल में तमिलनाडु के इरोड जिले की ऐसी ही मिलों में काम कर चुकी कई पूर्व कर्मचारियों ने वहां के हालात का ब्यौरा दिया, जो कि शोषण और बंधुआ मजदूरी की दुखद दास्तान हैं. तमिल में "सुमंगली" नाम की इस स्कीम का अर्थ है "खुशहाल शादीशुदा महिला" - मिल मालिक एजेंटों को लड़कियां लाने के लिए 2,000 रूपये देते हैं. तीन साल की कड़ी मेहनत के बाद इन बंधुआ लड़कियों को 30,000 से 60,000 रूपए के बीच मिलने होते हैं, जिनमें से भी काफी रकम उनके रहने और खाने के खर्च के नाम पर काट ली जाती है.

घर जाने की अनुमति नहीं

23 साल की कविता ने वापस अपने गांव आने के बाद बताया, "मैं जिन भी औरतों से मिलती हूं उनको मिलों में ना जाने की ही सलाह देती हूं. मैं जानती हूं कि एजेंट क्या वादे करते हैं और सच्चाई क्या है. वह समान नहीं है." कविता आगे कहती है, "एक साल तक मुझे अपने घर जाने की अनुमति नहीं थी. यहां तक कि उस परिसर से बाहर जाने की भी नहीं जहां हॉस्टल और मिल थे. मुझसे दो-दो शिफ्टों में काम करवाया गया. मैं झूठ बोलकर वहां से बाहर आ सकी."

केवल 13 साल की उम्र में वहां जाने वाली कविता उन हजारों लड़कियों में से एक थी जिन्हें "मैरेज स्कीम" के अंतर्गत मिलों में काम पर रखा गया. 1990 में देश में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत के दौर में तमिलनाडु में ऐसी कई कपड़ा मिलें खुलने लगी थीं. "मैरेज स्कीम" जैसी कई योजनाओं के नाम पर मिलों में काम करने के लिए बहुत सारे सस्ते श्रमिक जुटाए गए. इनमें से ज्यादातर गरीब, अशिक्षित और निम्न-जाति या दलित समुदायों की कम उम्र की लड़कियां थीं. इन्हें उनके काम के बदले तीन साल के कॉन्ट्रैक्ट के पूरा होने पर एकमुश्त रकम दी जाती थी. इस योजना को लड़कियों की शादी के लिए दहेज जुटाने के आसान तरीके के तौर पर प्रचारित किया गया.

दहेज के नाम पर

कई पूर्व कर्मचारियों के अनुभवों और फ्रीडम फंड, एंटी-स्लेवरी इंटरनेशनल जैसे कई सामाजिक संगठनों की अनगिनत स्टडीज दिखाती हैं कि यहां काम करने वाली महिलाओं को क्षमता से ज्यादा भरे हुए, बंद हॉस्टलों में रखा जाता है और कम मेहनताने के साथ साथ कई बार उन्हें मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न भी झेलना पड़ता है. इंडस्ट्री की इकाईयां इन आरोपों को निराधार बताती हैं. देश से सालाना 42 अरब डॉलर का निर्यात करने वाली इस इंडस्ट्री का ज्यादातर काम पश्चिमी तमिलनाडु के नामाक्कल, कोयंबटूर, तिरुपुर, इरोड और सालेम जिलों में ही होता है, जिसके कारण ये "भारत की टेक्सटाइल वैली" कहलाते हैं.

यहां करीब 300,000 लोग इस काम में लगे हैं. बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण उत्पादन और मुनाफा बढ़ाने के लिए कई लोगों से बंधुआ मजदूरी करवाई जाती है. लड़कियों को ठग कर इन मिलों तक लाने वाले "एजेंट" कहलाते हैं. अपने दहेज की रकम खो देने के डर से शोषण के बावजूद लड़कियां सब कुछ सहती हैं. दहेज प्रथा को बंद हुए पांच दशक से भी ज्यादा हो चुके हैं लेकिन आज भी कई समुदायों में लड़की के घरवालों को दूल्हे के परिवार को शादी करने के एवज में बड़ी रकम चुकानी पड़ती है.

इलाके की करीब 400 मिलों के संगठन साउथ इंडियन मिल्स एसोसिएशन (एसआईएमए) के प्रमुख बताते हैं कि सरकार और एसआईएमए ने कर्मचारियों के लिए कई नियम बनाए हैं लेकिन फिर भी कहीं कहीं उनका उल्लंघन हो रहा है. महासचिव के सेल्वाराजू कहते हैं, "कुछ बेशर्म लोग इन नियमों का पालन नहीं कर रहे और उनके कारण सबका नाम खराब हो रहा है. अब जहां जरूरी हो वहां पुलिस ही कार्रवाई कर रही है."

आरआर/एमजे (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन)

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