सुप्रीम कोर्ट ने विज्ञापनों पर बदला फैसला | दुनिया | DW | 18.03.2016
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दुनिया

सुप्रीम कोर्ट ने विज्ञापनों पर बदला फैसला

भारत में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सरकारी विज्ञापनों पर अपना पुराना आदेश बदल दिया है. केंद्र और राज्य सरकारों ने विज्ञापनों में सिर्फ राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री की तस्वीर होने के पुराने फैसले के खिलाफ अपील की थी.

सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले में सरकारी विज्ञापनों में सिर्फ राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश की तस्वीरों का इस्तेमाल करने की बात कही गई थी. इस फैसले के खिलाफ अपील करने वाले प्रांतों में चुनाव में जा रहे प्रांत पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु भी शामिल हैं. उनका कहना था कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला मौलिक अधिकारों और संघीय ढांचे के खिलाफ है.

जस्टिस रंजन गोगई और पीसी घोष की खंडपीठ ने नया फैसला सुनाते हुए कहा, "हम अपने उस फैसले में संशोधन करते हैं जिसमें हमने सरकारी विज्ञापनों में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की तस्वीरों के प्रकाशन की अनुमति दी थी. अब हम समबंधित विभागों के केंद्रीय मंत्रियों, मुख्य मंत्रियों, गवर्नरों और संबंधित विभागों के प्रांतीय मंत्रियों की तस्वीरों के प्रकाशन की अनुमति देते हैं."

केंद्र सरकार की ओर से मुकदमे में पेश होते हुए अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने फैसले को बदलने के लिए अपनी दलील में कहा कि यदि प्रधानमंत्री की तस्वीर के प्रकाशन की अनुमति दी जाती है तो मंत्रियों को भी समान अधिकार मिलना चाहिए क्योंकि प्रधानमंत्री बराबर वालों में पहले हैं. उन्होंने विज्ञापनों में मुख्यमंत्रियों और उनके कैबिनेट सहयोगियों को भी शामिल करने की अनुमति दिए जाने की वकालत की.

केंद्र सरकार के अलावा कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और छत्तीसगढ़ ने फैसले का रिव्यू करने की अपील की थी. केंद्र ने अपनी अपील में कहा था कि संविधान का आर्टिकल 19 राज्य और नागरिकों को सूचना देने और पाने का अधिकार देता है और इसे अदालतों द्वारा कम नहीं किया जा सकता. अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा कि यदि सिर्फ प्रधानमंत्री की तस्वीरों के प्रकाशन की अनुमति दी जाती है तो कहा जाएगा कि यह व्यक्तिवाद को बढ़ावा है.

गैर सरकारी संगठन कॉमन कॉज की ओर से वकील प्रशांत भूषण ने मूल अपील में शिकायत की थी कि कुछ प्रांतीय सरकारें सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना कर रही हैं. मई 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने कई आदेश दिए थे जिनमें से एक में सरकारी विज्ञापनों के नियमन के लिए सरकार से एक तीन सदस्यों वाली समिति बनाने को कहा था.

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