सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बीजेपी-कांग्रेस का चंदा मुश्किल में | ब्लॉग | DW | 12.04.2019
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ब्लॉग

सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बीजेपी-कांग्रेस का चंदा मुश्किल में

सर्वोच्च न्यायालय का फैसला चुनावी बॉन्ड को बनाए रखने के पक्ष में है लेकिन उसने केंद्र सरकार की इस दलील को स्वीकार नहीं किया है कि राजनीतिक दलों को धन देने वालों की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखी जाए.

सरकार का पक्ष रखते हुए महाधिवक्ता केके वेणुगोपाल ने कहा था कि मतदाताओं को यह जानने की कोई जरूरत नहीं है कि राजनीतिक दलों को कहाँ से धन मिलता है. उनका यह भी कहना था कि यदि राजनीतिक दलों को दानदाताओं की पहचान पता चल गई तो सत्ता में आने पर वे उन्हें परेशान कर सकते हैं.

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा है कि चुनावी बॉन्ड योजना जारी रहेगी लेकिन 30 मई तक सभी राजनीतिक दलों को एक सीलबंद लिफाफे में सारी जानकारी निर्वाचन आयोग को सौंपनी होगी. यानी तब तक चुनाव प्रक्रिया पूरी हो चुकी होगी और लोकसभा चुनाव के नतीजे भी 23 मई को घोषित हो चुके होंगे.

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दिलचस्प बात यह है कि जब भारतीय जनता पार्टी विपक्ष में थी, तो वह सार्वजनिक जीवन में शुचिता और पारदर्शिता की बड़ी-बड़ी बातें किया करती थी. लेकिन सत्ता में आते ही उसके सुर पूरी तरह बदल गए. उसने राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे के कानूनों में इस तरह के बदलाव किए कि अब विदेशी कंपनियों की भारत-स्थित शाखाएँ भी चंदा दे सकती हैं.

चुनावी बॉन्ड के जरिए दिए गए चंदे के बारे में भी बैंक के अलावा किसी को कुछ पता नहीं चल सकता था कि धन का स्रोत क्या है. जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने वेणुगोपाल से पूछा, धन शेल यानी फर्जी कंपनियों के जरिए भी भेजा जा सकता है.

चुनावी बॉन्ड योजना में निहित गोपनीयता का यह असर हुआ कि इसके तहत दिए गए कुल 221 करोड़ रुपए में से 210 करोड़ रुपए सिर्फ भाजपा की झोली में आए. देश की शेष सभी राजनीतिक पार्टियों को केवल 11 करोड़ रुपए ही मिले. इनमें से पाँच करोड़ रुपए कांग्रेस पार्टी के हिस्से में आए. इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि यदि इस योजना का वर्तमान स्वरूप जारी रखा जाए तो इसका लाभ मुख्यतः सत्तारूढ़ पार्टी को ही मिलेगा.

जाहिर है कि यह विपक्षी दलों के साथ अन्याय है. यूँ भी लोकतंत्र में पारदर्शिता सार्वजनिक जीवन का एक बुनियादी मूल्य है और जनता को अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है. पिछली कांग्रेस सरकार ने सूचना के अधिकार वाला कानून बना कर जनता के इसी बुनियादी हक को सुरक्षित करने की कोशिश की थी. लेकिन इस कानून की धार को कुन्द करने की हरचंद कोशिश की गई है.

इसका सबसे बड़ा उदाहरण तो यही है कि आज तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की शैक्षिक योग्यता संबंधी दस्तावेज़ पेश नहीं किए जा सके. अब जाकर स्पष्ट हुआ है कि स्मृति ईरानी केवल बारहवीं कक्षा पास हैं क्योंकि उन्होंने लोकसभा चुना के लिए नामांकन पत्र भरते हुए स्वयं उसमें अपनी शैक्षणिक योग्यता यही लिखी है.

लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से पारदर्शिता पूरी तरह बहाल नहीं होती. क्योंकि राजनीतिक दल धन के स्रोत को सार्वजनिक नहीं करेंगे. वे केवल गोपनीय ढंग से निर्वाचन आयोग को बताएंगे. अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि क्या आयोग के पास यह अधिकार होगा कि वह इस जानकारी को चाहे तो सार्वजनिक कर सके? जो भी हो, फिलहाल पारदर्शिता की दिशा में ताजा आदेश से एक कदम तो आगे बढ़ाया ही गया है. आशा की जानी चाहिए कि इस दिशा में आगे भी कदम बढ़ाए जाते रहेंगे.

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