सुप्रीम कोर्ट के आदेश क्यों नहीं माने जा रहे हैं? | दुनिया | DW | 09.11.2018
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दुनिया

सुप्रीम कोर्ट के आदेश क्यों नहीं माने जा रहे हैं?

बात दिवाली पर पटाखों की हो या फिर सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश की, सवाल उठता है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को कितना माना रहा है या उनकी कितनी परवाह की जा रही है?

भारतीय संविधान में व्यवस्था के तीनों अंगों यानी विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों के स्पष्ट बँटवारे और संतुलन की व्यवस्था को बनाने का प्रयास किया गया है.

बावजूद इसके कभी-कभी इनके बीच, खासकर न्यायपालिका के साथ कार्यपालिका और विधायिका के टकराव की स्थिति आती रहती है. हालांकि व्यवस्था ऐसी है कि न्यायपालिका उन्हीं कानूनों के आधार पर फैसला देगी जिन्हें संवैधानिक तरीके से संसद ने बनाया है और कार्यपालिका उन्हीं कृत्यों का निर्वहन करेगी जिन्हें उसे संविधान और संसद से मिले हैं.

कानून में यदि कोई खामी है तो उसमें संशोधन करने का अधिकार संसद के पास है लेकिन उसी तरह से न्यायपालिका के आदेशों के अनुपालन की जिम्मेदारी भी कार्यपालिका के पास है. यदि वह उसके किसी फैसले से सहमत नहीं है तो उसे संसद में संशोधन के जरिए बदल जरूर सकती है लेकिन अनुपालन न करे, ऐसा करना संभव नहीं.

न्यायपालिका के साथ विधायिका और कार्यपालिका के बीच टकराव की स्थिति अक्सर आती है लेकिन उसका हल भी इसी संवैधानिक व्यवस्था के तहत अब तक निकलता आया है. बहरहाल पिछले कुछ दिनों से जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की अनदेखी हो रही है, संविधानविद उसे लोकतांत्रिक और संवैधानिक परंपरा के लिए शुभ संकेत नहीं मानते.

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पटाखों पर लगी रोक क्या करेंगे लोग?

सुप्रीम कोर्ट ने भीषण पर्यावरण संकट को देखते हुए दिवाली पर पटाखों की बिक्री और उन्हें चलाने को लेकर स्पष्ट गाइडलाइन जारी की. लेकिन न तो उसके हिसाब से पटाखों की बिक्री हुई है और न ही तय समय सीमा तक उनका उपयोग हुआ.

सुप्रीम कोर्ट ने रात दस बजे के बाद पटाखे छुड़ाने की मनाही की थी लेकिन देश भर में शायद ही ऐसी कोई जगह हो जहां इसका पालन किया गया हो. देर रात तक पटाखे बजते रहे और उसके बाद पर्यावरण का जो हाल हुआ है, वह सभी देख रहे हैं.

सिर्फ यही मामला नहीं बल्कि ऐसे कई मामले हैं जहां जाने-अनजाने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों या उसके फैसलों की अनदेखी हो रही है बल्कि उससे भी ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि यह अनदेखी बाकायदा महसूस कराते हुए हो रही है. सोशल मीडिया पर लोगों ने न सिर्फ देर रात पटाखे फोड़ने की तस्वीरें पोस्ट कीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का जमकर मजाक भी उड़ाया गया.

सबरीमाला मंदिर प्रकरण में जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ बाकायदा लोग सड़कों पर उतरे हैं उसे भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिहाज से ठीक नहीं माना जा रहा है. जाने माने संविधानविद सुभाष कश्यप कहते हैं, "तीनों अंगों में ताल-मेल तभी बना रह सकता है जब प्रतिरोध का स्वर और कार्रवाई का तरीका भी संवैधानिक हो. संविधान में न्यायालय और विधायिका के बीच टकराव की स्थिति में कानून बदलने का तक का प्रावधान है, इसलिए टकराव की बात आनी ही नहीं चाहिए. हां, कानून में संशोधन को थोड़ा जटिल इसलिए बनाया गया है ताकि इतनी आसानी से इसमें बदलाव भी न हो सके और लोकतंत्र में जनभावना की कद्र बनी रहे.”

कानून बनाने या फिर उसके संशोधन की प्रक्रिया को ही कठिन नहीं बनाया गया है बल्कि संशोधन की सीमा को भी सुप्रीम कोर्ट ने केशवानंद भारती बनाम केरल मामले में स्पष्ट कर दिया है कि संसद को संविधान में संशोधन का अधिकार उसी सीमा तक है, जहां तक कि संविधान का ‘मूल ढांचा' प्रभावित न हो.

दरअसल, संविधान में संशोधन के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत की जरूरत होती है, इसीलिए ये इतना आसान नहीं होता. इतना आसान इसे इसलिए नहीं बनाया गया है ताकि अल्पमत की सरकारें आसानी से ऐसा न कर सकें. ये जरूर है कि बहुमत की सरकारों को इस संदर्भ में लगभग मनमानी करने तक की छूट मिल जाती है, पर उसके लिए भी अब सुप्रीम कोर्ट ने हद तय कर दी है.

जहां तक सुप्रीम कोर्ट या फिर हाई कोर्ट के फैसलों का सवाल है तो वो संविधान और मौजूदा कानूनों के परिप्रेक्ष्य में ही दिए जाते हैं. इसलिए यदि विधायिका को उस पर आपत्ति हो तो उसके पास इसे बदलने का तो अधिकार है लेकिन अनदेखी करने या फिर अवमानना करने का अधिकार नहीं है.

हाल के सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों पर आम लोगों के साथ-साथ सरकार की भी अनदेखी ने इस मामले को और गंभीर बना दिया है. सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील डॉक्टर सुरत सिंह कहते हैं, "कानून में सुप्रीम कोर्ट की अवमानना को स्पष्ट किया गया है और इसके लिए दंड का भी प्रावधान किया गया है लेकिन यदि अवमानना सीधे सरकारी तौर पर हो रही हो तो मामला थोड़ा जटिल हो जाता है और गंभीर तो यह है ही.”

सुरत सिंह कहते हैं कि जब जनता के चुने हुए प्रतिनिधि संसद के माध्यम से कानून बनाते हैं तो उनकी स्वीकार्यता के साथ अनुपालन की भी संभावना बढ़ जाती है. लेकिन कई बार कानून की सीमाओं से परे जाकर यदि फैसले दिए जाते हैं तो कई तरह की विसंगतियां भी पैदा होती हैं. कानूनी जानकारों का कहना है कि संसद के कानून के ऊपर कुछ जजों के फैसलों को तो नहीं रखा जा सकता है लेकिन कोर्ट का कोई फैसला कानून की सीमा में है या फिर इसके बाहर, इसे सिर्फ सुप्रीम कोर्ट या फिर संसद ही तय कर सकती है, कोई और नहीं.

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क्या समलैंगिकों को अपनाएगा भारत?

समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर करने के फैसले पर भी कई सवाल उठे और जानकारों के मुताबिक समाज पर व्यापक असर डालने वाले ऐसे मामलों में बेहतर होता कि फैसले देने की बजाय सुप्रीम कोर्ट कानून में बदलाव के लिए उन्हें संसद के पास भेजता. ठीक वैसे ही जैसे दागी नेताओं को चुनाव लड़ने से रोकने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने किया या फिर तीन तलाक पर संसद को कानून बनाने के लिए कहा.

जानकारों के मुताबिक, कुछ मुद्दों पर या फिर कुछ फैसलों पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना ठीक नहीं है और इसे परंपरा बनने से कतई परहेज करना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट या फिर हाई कोर्ट के फैसलों की उस वक्त आलोचना होती है जब ये जनहित याचिकाओं की सुनवाई के दौरान दिए जाते हैं. कहा जाता है कि जनहित याचिकाओं पर ज्यादा ध्यान देने के कारण उच्चतम न्यायालय में लंबित दूसरे मामलों की सुनवाई में देर हो रही है.

संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत उच्चतम न्यायालय के आदेश देश का कानून माने जाते हैं, लेकिन दिल्ली में व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की सीलिंग के मामले में अदालती आदेशों की अवहेलना कोई शुभ संकेत नहीं. वहीं राम मंदिर मामले की सुनवाई को जनवरी तक टालने संबंधी फैसले के बावजूद अयोध्या में मंदिर बनाने के लिए अध्यादेश की चर्चाओं को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है. जानकारों के मुताबिक, या तो मुकदमे वापस लेकर कोई अध्यादेश लाया जाए या फिर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार किया जाए.

वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी जानकारी अनूप भटनागर कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट ऐसी संस्था है जिस पर हर व्यक्ति भरोसा करता है, भले ही लोग उसके तमाम फैसलों से इत्तिफाक न रखते हों. संकट की घड़ी में हर व्यक्ति और संस्था सुप्रीम कोर्ट की ओर आशा भरी निगाहों से देखती है और सुप्रीम कोर्ट ने जनहित के तमाम ऐसे फैसले दिए भी हैं. सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को राजनीतिक तराजू पर तौल कर कतई नहीं देखना चाहिए क्योंकि राजनीति से निराश लोगों के लिए भी आखिरी आस यहीं दिखती है.”

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