′सुंदरता′ जैसा कुछ भी नहीं | लाइफस्टाइल | DW | 25.05.2012
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लाइफस्टाइल

'सुंदरता' जैसा कुछ भी नहीं

कहते हैं खूबसूरती देखने वाले की आंख में होती है. खूबसूरती का खिताब देने वाले जो पैमाने मिलान और न्यूयॉर्क फैशन शो में गढ़े जाते थे, उनका अब विरोध किया जा रहा है. शुरुआत की है जर्मनी की कुछ मशहूर फैशन पत्रिकाओं ने.

लंबाई 5 फुट 9 इंच. कूल्हों की चौड़ाई 90 सेंटीमीटर से ज्यादा नहीं होनी चाहिए और सुनहरा रंग तो सोने पर सुहागा जैसा है. ये खूबसूरती का वो पैमाना है जो अब तक हर जगह लागू था, पेरिस से लेकर न्यूयॉर्क तक. लेकिन अब इसके दिन लदते दिख रहे हैं. स्पेनिश मूल के कोलंबियाई फैशन डिजायनर रिकार्डो रामोस कहते हैं, "मैं बर्लिन में रहना ज्यादा पसंद करता हूं क्योंकि यहां ज्यादा आजादी है." रामोस अपने फैशन शो के लिए उन्ही मॉडलों को चुनते हैं जो थीम के मुताबिक फिट बैठती हैं. कुछ दिन पहले उन्होंने अपने शो के लिए एक 80 साल की मॉडल को चुना था.

इसे खूबसूरती की तलाश में एक कदम का सफर भी कह सकते हैं. स्वीडन के मशहूर कपड़ा ब्रांड एचएडएम की मॉडल केट मॉस हैं. कई और दूसरे ब्रांड भी प्रचार के लिए मॉडलों पर ही निर्भर करते हैं. फिर फर्क क्या है. जर्मन फैशन पत्रिका वोग की संपादक, क्रिस्टीना आर्प कहती हैं, "हर देश में सुंदरता के अलग-अलग पैमाने होते हैं. हम डिजायनरों को इस बात के लिए प्रोत्साहित करते हैं कि वो ज्यादा पतली मॉडल और जरूरत से ज्यादा छोटे कपड़ों के अंजाम के बारें सतर्क रहें. छोटे कपड़ों की वजह से कई मॉडल उन्हें नहीं पहन पातीं. "

आंद्रेआस माथिआज का कहना है, "पेरिस, मिलान और लंदन में फैशन के ट्रेंड गढ़े जाते हैं. मॉडल इस उम्मीद में तय की जाती हैं कि वो कंपनी की मांग के अनुकूल हों." लेकिन जर्मनी में ऐसा नहीं है. रामोस भी मानते हैं कि ये केवल जर्मनी में ही संभव है. कई बार विज्ञापन बनाने वाली एजेंसियां भी सुपरमॉडल के बजाय औसत चेहरे को ज्यादा तवज्जों देती हैं. रामोस अब उन चेहरों को तवज्जों देना चाहते हैं जो एलीट के तय किए हुए मानकों के खिलाफ हों. अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में मॉडल के नैन नक्श को दुनिया के किसी भी हिस्से के मुकाबले ज्यादा तवज्जो दी जाती है.

हालांकि एशिया में भी ऐसा ही है. लेकिन यहां बेदाग रंगत को ज्यादा महत्व दिया जाता है. भारत की विज्ञापन एजेंसियों के अपने ही पैमाने हैं. गोरी चमड़ी, लंबी काया और एकदम सटीक नैन नक्श, बेशक सुंदरता के अलग अलग पैमाने हो सकते हैं लेकिन आम सुंदरता जैसा कुछ भी नहीं. आलोचक कहते हैं कि भारत तथाकथित सुंदरता के मामले में पश्चिम की नकल करता है. इसकी शुरुआत अकसर फिल्म उद्योग से होती है.

रिपोर्ट: टिनी फोन पोजर/वीडी

संपादन: ओएसजे

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