सीवर की सफाई में मशीनें झोंकिए, जिंदगियां नहीं | ब्लॉग | DW | 17.06.2019
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ब्लॉग

सीवर की सफाई में मशीनें झोंकिए, जिंदगियां नहीं

भारत में सीवर और सैप्टिक टैंकों की सफाई करने वालों का कोई निश्चित आंकड़ा किसी के पास नहीं है लेकिन एक आंकड़े के मुताबिक सीवर और सैप्टिक टैंक की सफाई के दौरान हर पांच दिन में औसतन एक आदमी की मौत होती है.

सीवर की सफाई के दौरान दम घुटने से गुजरात में पिछले दिनों सात लोगों की जान चली गई. पिछले कुछ सालों से सीवर से होने वाली मौतों की संख्या बढ़ती ही जा रही है. तमाम कानूनों और निर्देशों की धज्जियां उड़ाते हुए मशीनों, उपकरणों और सावधानियों की जगह गरीब मजदूरों को सीवरों और सैप्टिक टैंको में उतारा जाता है. गुजरात के वड़ोदरा जिले में एक होटल के सैप्टिक टैंक की सफाई के लिए चार सफाईकर्मी बुलाए गए थे. तीन होटल के कर्मचारी थे. एक के बाद एक, सातों लोग टैंक में उतरे और बाहर न आ सके. बताया गया कि टैंक में गैस का दबाव इतना अधिक था कि उनका जीवित बच निकलना नामुमकिन था. अग्निशमन दल ने लाशें निकाली.

इसके बाद टैंक की सफाई और ये सुनिश्चित करने के लिए कि और मौतों न हों, वड़ोदरा नगर निगम ने सक्शन टैंक वाहन का इस्तेमाल किया. सरकार ने मृतकों के परिजनों को चार लाख रुपये का मुआवजा और होटल मालिक के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का आदेश दिया है. ये वाहन पहले बुला लिया जाता तो शायद जिंदगियां बच जातीं. इसी साल मार्च में दिल्ली में एक होटल के सैप्टिक टैंक की सफाई में दो लोग मारे गए थे. मार्च में बंगलुरू में एक व्यक्ति एक इंटरनेशनल स्कूल के टैंक की सफाई करते हुए मारा गया और उसी महीने चेन्नई के पास श्रीपेरेम्बुदूर में छह लोगों की मौत हुई.

राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के एक आंकड़े के मुताबिक जनवरी 2017 से पूरे देश में सीवर और सैप्टिक टैंक की सफाई के दौरान हर पांच दिन में औसतन एक आदमी की मौत हुई है. आयोग के पास आंकड़े तो हैं लेकिन इन मौतों पर काबू पाने के लिए कार्ययोजना का अभाव है. और ये अभाव दरअसल आयोग से ज्यादा सरकारों, योजनाकर्ताओं के आलस्य और अनदेखी की वजह से भी आया है. 2014-2018 के दरम्यान सेप्टिक टैंक और सीवर की सफाई करते हुए 323 मौतें हुई हैं. लेकिन सफाई कर्मचारी आंदोलन के एक आंकड़े के मुताबिक पिछले पांच साल में ये आंकड़ा 1470 मौतों का है.

ये साफ है कि सीवर और सैप्टिक टैंकों की सफाई करने वालों का कोई निश्चित आंकड़ा किसी के पास नहीं है. सरकारी आंकड़ा भी अधिकांश उन लोगों का है जो हाथ से खुली नालियां, सिंगल पिट वाले टॉयलेट और टट्टियां साफ करते हैं. इसे मैनुअल स्केवेंजिग कहा जाता है जिस पर कानूनन रोक लगे हुए सालों गुजर गए लेकिन आज भी देश के कई हिस्सों में मैनुअल स्केवेंजरों से काम लिया जाता है. प्रधानमंत्री ने अपने पिछले कार्यकाल में एक भाषण के दौरान इन सफाई कर्मियों के कार्य को "आध्यात्मिक" करार दिया था. लेकिन अपने जीवन को दांव पर लगाकर, मल और दलदल में धंसकर, जीवित बच गए तो अनेक बीमारियों के शिकार बनकर, समाज में प्रताड़ित, लांछित और वंचित रहकर वे भला कौनसी आध्यात्मिकता कमा रहे होंगे?!

अजीब पेशे, बढ़िया पगार

असल में सरकारों और सुविधाभोगी वर्गों और मुख्यधारा के एक बड़े तबके की अंततः यही सोच बनती है कि वे इसी काम के लिए बने हैं, जबकि ये भी जघन्य शोषण और भयानक संवेदनहीनता है. उनके पुर्नवास की बात की जाती है तो इसीलिए कि उन्हें इस ‘नरक' से बाहर निकाला जाना है, लेकिन आजादी के 72वें साल में भी पुनर्वास से वे कोसों दूर हैं और ‘नरक' का दायरा बढ़ता ही जा रहा है.

1993 में मैनुअल स्केवेंजिग पर देश में रोक लगा दी गई थी और 2013 में कानून में संशोधन कर सीवर और सैप्टिक टैंक की मैनुअल सफाई पर रोक को भी इसमें जोड़ दिया गया था. लेकिन शहरों की रौनक में अपना जीवन खपा देने वाले ये लोग विकास की कथित मुख्यधाराओं से बाहर हैं. वे पीढ़ियों से यही काम करने को अभिशप्त हैं. और उनके बारे में सोचने की फुर्सत तरक्की के लिए भागते टकराते लोगों के पास नहीं है. सरकारें भी जैसे अपने दायित्वों को फाइलों में दर्ज करती जा रही हैं.

हाथ से मैले की सफाई को पूरी तरह खत्म करने के लिए स्वच्छ भारत अभियान की व्यापकता, आकर्षण और संसाधनप्रचुरता वाले अभियान की तरह केंद्र सरकार को एक विस्तृत, डेडलाइन युक्त और पारदर्शी कार्ययोजना बनानी चाहिए जिसमें निगरानी और जवाबदेही का ढांचा भी स्पष्ट हो. इसके अनुरूप ही राज्यों को भी कार्रवाई करनी चाहिए. दिल्ली सरकार अगर सीवर और सैप्टिक टैंको की सफाई के लिए मशीनें दे सकती है तो अन्य सरकारें भी आगे आएं. शैक्षणिक संस्थानों, बैंको, होटलों, सरकारी एजेंसियों, शहर नियोजकों, हाउसिंग बोर्डों, निर्माण कंपनियों को सख्त आदेश हों कि वे सीवर या सैप्टिक टैंक की सफाई में लोगों का इस्तेमाल न करे. सफाई का ठेका लेने वाली कंपनियों को भी मशीनें ही रखनी होंगी. एनजीओ और सिविल सोसायटी के नुमायंदों को भी आगे आना चाहिए. वे इन संस्थानों को सचेत कर सकते हैं.

मैला साफ करने वालों के प्रति भेदभाव और छुआछूत खत्म करने के लिए सामाजिक जागरूकता चाहिए और उनके साथ होने वाली रोजमर्रा की नाइंसाफियों में उनके साथ एकजुटता और पक्षधरता भी. अगर सरकार वास्तव में उनके प्रति संवेदनशील है तो पुनर्वास न सिर्फ स्थायी बल्कि उसे बहुआयामी भी होना होगा. पैसे या कर्ज देकर नहीं बल्कि उन्हें साधन संपन्न और शिक्षित बनाकर. उनके परिवारों के स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण पर अलग से ध्यान देने की जरूरत है. वे भी देश के नागरिक हैं और सहज गरिमापूर्ण जीवन उनका भी संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार और मानवाधिकार है.

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