साइबर कानून और कुछ कहने की आजादी | दुनिया | DW | 04.02.2015
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दुनिया

साइबर कानून और कुछ कहने की आजादी

इस कानून की धारा 66ए में सोशल मीडिया पर कमेंट लिखने के लिए बहुत से लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है. आखिर ये कानून साइबर अपराध रोकने के लिए है या अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक लगाने के लिए.

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इस कानून में सोशल मीडिया पर किसी को पीड़ा और असुविधा पहुंचाने के लिए तीन साल कैद की सजा है. भारत के विभिन्न प्रांतों में इस धारा के नियमित इस्तेमाल से यह सवाल उठा है कि क्या पुलिस का साइबर सेल यह तय कर सकता है कि किसी यूजर की टिप्पणी इतनी परेशान करने वाली है कि उसे गिरफ्तार किया जा सके. सुप्रीम कोर्ट के जजों ने इस मुकदमे पर की गई टिप्पणी से साफ कर दिया है कि न्यापालिका के उच्चतम स्तर पर अभिव्यक्ति की आजादी का जो मानक है भारतीय पुलिस का निचला स्तर उसपर अमल करने की हालत में नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट के पीठ ने अभिव्यक्ति की आजादी पर की जा रही पुलिस कार्रवाई पर सख्त रवैया दिखाते हुए सरकारी वकील से कहा कि आप पुलिस अफसरों का एक दल बनाते हैं, उसे साइबर सेल कहते हैं और वे अचानक विशेषज्ञ हो जाते हैं?

इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया पर कुछ पोस्ट करने के लिए यूजर की गिरफ्तारी के लिए आला अफसरों की मंजूरी को जरूरी बताया था. देश की सर्वोच्च अदालत की यह टिप्पणी मुंबई में दो लड़कियों की गिरफ्तारी के बाद आई थी, जिसे शिव सेना नेता बाल ठाकरे की मौत के बाद मुंबई बंद का विरोध करने के कारण गिरफ्तार कर लिया गया था. अब साइबर कानून पर अपीलों की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने उसके गलत इस्तेमाल पर चिंता व्यक्त की है.

स्वाभाविक है कि सोशल मीडिया के यूजर इसका स्वागत कर रहे हैं. भारत के अलग अलग जगहों पर सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणियों के कारण की गई गिरफ्तारियों ने फेसबुक और ट्विटर जैसे वेबसाइटों पर लोगों को सचेत कर दिया था.

केंद्र सरकार के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में आश्वासन दिया कि सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक टिप्पणियों के लिए गिरफ्तारी नहीं होगी. नरेंद्र मोदी की सरकार का समर्थन भी हो रहा है और उसके इरादे पर सवाल भी उठाए जा रहे हैं.

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