सवालों भरी ऐतिहासिक घड़ी | ब्लॉग | DW | 03.04.2015
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ब्लॉग

सवालों भरी ऐतिहासिक घड़ी

ईरान के साथ परमाणु विवाद में हुई सहमति इलाके और विश्व समुदाय के लिए अच्छी खबर है. लेकिन डॉयचे वेले के जमशीद फारुगी का कहना है कि उससे परमाणु विवाद का सचमुच हल होगा या नहीं यह कहना फिलहाल मुश्किल है.

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श्टाइनमायर, मोगेरिनी, जवाद शरीफ

बारह साल तक सवाल यह था कि डील होगी या नहीं. दुनिया लुजान की ओर देख रही थी जहां उम्मीद और निराशा का पलड़ा करीब करीब बराबर था, और सफलता और विफलता के बीच अंतर काफी कम. फिर देर शाम अच्छी खबर आई, ऐसे इलाके में जहां अच्छी खबरों की तंगी रहती है. परमाणु विवाद में सैद्धांतिक सहमति बेशक ना केवल ईरान के लिए बल्कि विश्व समुदाय के लिए ऐतिहासिक घड़ी है. लेकिन लुजान की सहमति को सावधानी के साथ देखना होगा. जर्मन कहावत है कि शेतान विवरण में छुपा होता है.

विवेक की जीत

यह पहली बार नहीं था कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर होने वाली बातचीत एक बड़ा चक्र बन गई, परमाणु वार्ता परमाणु पोकर बन गई. खेल की मेज पर अंत में दो पत्ते थे, जीत-जीत का समाधान और हार-हार की त्रासदी. जीत विवेक की हुई. भविष्य के मुश्किल सवालों पर विश्व राजनीति पर अप्रत्याशित असर करने वाला गंभीर खेल. विश्व के प्रमुख राजनीतिज्ञों ने इस बातचीत के इतना समय लिया, यह दिखाता है कि सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों और जर्मनी के लिए इस वार्ता का कितना महत्व था और ईरान के लिए भी.

जब लुजान में परमाणु पोकर शुरू हुआ तो अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी और उनके ईरानी साथी मोहम्मद जवाद शरीफ को अच्छी तरह पता था कि वे खाली हाथ वापस नहीं लौट सकते. उनकी जिम्मेदारी तय थी: तब तक बातचीत करें जब तक सहमति न हो जाए, और उन्होंने यही किया. अब एक सैद्धांतिक सहमति हो गई है. क्या इसके लिए इतनी मेहनत काम की थी? क्या वह नतीजा निकला है जिसकी ईरान और पश्चिमी राजधानियों में उम्मीद की जा रही थी? जवाब है, हां.

Deutsche Welle Persische Redaktion Jamsheed Faroughi

जमशीद फारूगी

ईरान के लिए संजीवनी

ईरान के शासकों के लिए यह समझौता संजीवनी की तरह है. अर्थव्यवस्था प्रतिबंधों के बोझ तले दबी है, वित्तीय संरचनाएं बिखर गई हैं, महंगाई ने लोगों का जीना हराम कर दिया है. बेरोजगारी और निराशा ने खासकर युवा लोगों को बेचैन कर दिया है. और सऊदी अरब के नेतृत्व में अरब देशों के गठबंधन के साथ युद्ध की संभावना ने ईरान से आखिरकार हामी भरवा ही ली. स्थित गंभीर है, यमन में अरब देशों के हवाई हमलों के बाद यमन के सत्ता संघर्ष की आग पूरे इलाके में फैलने का खतरा है.

परमाणु वार्ता के इस दौर की विफलता से सहमति के विरोधी मजबूत होते. यह बात ईरान की सरकार और सर्वोच्च नेता आयातुल्लाह अल खमेनाई के अति अनुदारवादी समर्थकों को भी पता थी. ईरान के साथ परमाणु विवाद का कूटनीतिक समाधान अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के लिए भी सबसे बड़ी विदेशनैतिक कामयाबी है. लेकिन असल काम अब शुरू हो रहा है. लुजान की सहमति संभवतः ईरान के साथ परमाणु विवाद का हल है. लेकिन जोर संभवतः पर है. क्योंकि इस सहमति के अनगिनत और ताकतवर विरोधियों के पास तीन महीने का समय है कि वे अब तक हासिल हुए को फिर नष्ट कर सकें.

समझौते पर अमल

लुजान की कामयाबी की खबर आने के बाद इस्राएल के प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतन्याहू ने ईरान के साथ हुई सहमति की कड़ी आलोचना की है. ईरान और पश्चिमी देशों की सहमति के विरोध में वे अकेले नहीं हैं. इसके लिए बस तालियों की उस गड़गड़ाहट को याद करना होगा जो नेतन्याहू को अमेरिकी कांग्रेस में उनके जोशीले भाषण के बाद मिली था. अमेरिका के 47 सीनेटरों के ईरान सरकार को लिखे गए पत्र को भी नहीं भूलना चाहिए जिसमें उन्होंने ओबामा शासन की समाप्ति के बाद सहमति को वापस लेने की धमकी दी थी.

सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र जैसी क्षेत्रीय ताकतें भी ईरान के साथ परमाणु समझौते के खिलाफ हैं. इसी तरह ईरान के अंदर हार्डलाइनर भी समझौते का विरोध कर रहे हैं. परमाणु विवाद की समाप्ति का नतीजा ईरान और अमेरिका की नजदीकी और ईरान की अंतरराष्ट्रीय समुदाय में वापसी के रूप में हो सकता है. विरोधी इसे रोकना चाहते हैं. लंबे समय से प्रतीक्षित समझौते को जल्द से जल्द अमली जामा पहनाना होगा. विरोधियों की तादाद काफी है और वे ताकतवर भी हैं.

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