सर्व शिक्षा का लक्ष्य पाने में 50 साल पीछे | दुनिया | DW | 06.09.2016
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दुनिया

सर्व शिक्षा का लक्ष्य पाने में 50 साल पीछे

दुनिया के सभी बच्चों को सेकेंडरी स्तर तक की मुफ्त शिक्षा मुहैया कराने के लक्ष्य को पूरा करने में फिलहाल पूरा विश्व ही पांच दशक पीछे चल रहा है. संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट में हुआ खुलासा.

दुनिया भर के नेताओं ने पिछले साल मिलकर साल 2030 तक सभी लड़के-लड़कियों को मुफ्त प्राइमरी और सेकेंडरी शिक्षा पूरा करवाने का लक्ष्य रखा था. लेकिन संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि इस मद में धन मुहैया कराने में कमी के कारण सभी बेहद पिछड़ गए हैं.

संयुक्त राष्ट्र ने 2000 में महात्वाकांक्षी योजना बनाई थी. सहस्राब्दी लक्ष्यों में गरीबों की तादाद घटाने, सबके लिए प्राथमिक शिक्षा की गारंटी देने, पांच साल से कम उम्र के बच्चों में मृत्यु दर को कम करने और साफ पेयजल मुहैया कराने जैसे लक्ष्य तय किए थे. इनका खर्च विकास सहायता के जरिए उठाने का इरादा था.

शिक्षा का हाल देखें तो, इस समय दुनिया के करीब 40 फीसदी बच्चे उन भाषाओं में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं जो उनकी मातृभाषा नहीं है. यूनिवर्सल शिक्षा का लक्ष्य पूरा करने में अमीरों और गरीबों के बीच बढ़ती खाई का असर पड़ रहा है. अगर स्थिति नहीं बदली तो सबको प्राइमरी स्तर की शिक्षा दिलाने में ही 2042 तक का और सेकेंडरी स्तर तक की शिक्षा में 2059 तक का समय लग जाएगा. यूएन का कहना है कि 2030 तक यह लक्ष्य पूरा करने के लिए शिक्षा के क्षेत्र में कम से कम छह गुना वृद्धि करनी होगी.

यूनेस्को का कहना है कि स्थायी विकास के सभी पहलुओं जैसे संपन्नता बढ़ाने, कृषि और सेहत सुधारने, हिंसा घटाने और ज्यादा से ज्यादा लैंगिक बराबरी लाने के लिए शिक्षा सबसे जरूरी है.

इस लक्ष्य में पिछड़ जाने का एक बड़ा कारण दुनिया के कई हिस्सों में चल रहे संघर्ष भी हैं. इन हिंसक संघर्षों के कारण विश्व के करीब 3.6 करोड़ बच्चे स्कूलों से बाहर हैं. शिक्षा की कमी के कारण ही बेरोजगारी और हिंसा और बढ़ती है. यूनेस्को का मानना है कि बच्चों को भविष्य में उनके जीवन में काम आने वाले शिक्षा नहीं मिल रही है. उनका मानना है कि बच्चों की पर्यावरण के बारे में समझ बढ़ाने, जलवायु परिवर्तन के बारे में बताए जाने और सही मायनों में ग्लोबल नागरिक बनाने वाली शिक्षा मिलनी चाहिए.

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