सरोद को लोकप्रिय बनाना चाहते हैं आलम | मनोरंजन | DW | 11.01.2014
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मनोरंजन

सरोद को लोकप्रिय बनाना चाहते हैं आलम

आलम खां अप्रतिम सरोद वादक उस्ताद अली अकबर खां के सबसे छोटे पुत्र और शिष्य हैं. अमेरिका में पैदा हुए 31 वर्षीय आलम खां के कंधों पर खानदान की महान परंपरा को आगे चलाने का भार है.

भारत में तो अली अकबर खां को सरोद का सर्वश्रेष्ट कलाकार माना ही जाता है, विश्वविख्यात वायलिन वादक येहूदी मेनुहिन ने भी उन्हें बीसवीं शताब्दी का सबसे बड़ा वाद्ययंत्रकार बताया था. उनके पिता अलाउद्दीन खां भी महान सरोदवादक थे. उनके शिष्यों में अली अकबर खां, अन्नपूर्णा देवी, बहादुर खां, रविशंकर, वी जी जोग, तिमिर बरन, निखिल बैनर्जी, पन्ना लाल घोष और शरण रानी जैसे कलाकार शामिल हैं.

31 वर्षीय आलम खां के कंधों पर एक ऐसी महान खानदानी परंपरा का भार है जिसे वहन करना आसान नहीं. आलम की मां मेरी खां श्वेत अमेरिकी हैं और आलम का जन्म और लालन-पालन अमेरिका में ही हुआ है जहां अली अकबर खां ने संगीत का एक विद्यालय खोला था. लेकिन यह आलम खां की खूबी है कि वह शुद्ध भारतीय परंपरा के इस भार को आसानी से वहन कर रहे है.

इस छोटी उम्र में ही उनकी गिनती सर्वश्रेष्ठ सरोदवादकों में होने लगी है और उनके सांगीतिक विकास को देखकर लगता है कि बहुत शीघ्र वह अपने पिता और गुरु की तरह ही सरोद सम्राट कहलाने लगेंगे. इन दिनों वे एक माह की भारत यात्रा पर हैं. पिछले हफ्ते उन्होंने दिल्ली में एक अविस्मरणीय प्रस्तुति दी. इस अवसर पर उनसे हुई एक लंबी बातचीत के कुछ अंश:

आपकी संगीत शिक्षा किस उम्र में शुरू हुई? और किस तरह से?

मैं जब सात साल का था, तब मेरे हाथ में एक सरोद पकड़ाया गया था. मैं इसे कभी बजाता था, कभी काफी-काफी दिन तक छूता भी नहीं था. मैं गिटार भी बजाता था. आज भी मैं दूसरे किस्म के संगीत में भी काफी रुचि लेता हूं. अगर आप अमेरिका में पैदा हुए हैं और वहीं पले-बढ़े हैं तो यह स्वाभाविक है कि आप अनेक तरह के संगीत को सुनेंगे और पसंद करेंगे. लेकिन सरोद में मेरी गंभीर दिलचस्पी 14 साल की उम्र में शुरू हुई. यूं तो मैंने संगीत के बीच ही आंखें खोलीं और मैं छुटपन से ही किसी भी कक्ष में बैठ जाया करता था और शायद कभी-कभी गाता भी था. लेकिन मुझमें संगीत के प्रति गंभीर रुचि 14 साल की उम्र में ही जागृत हुई. मेरी मां ने यह देखा तो उन्होंने मेरे साथ एक चालाकी की. उन्होंने कहा कि चलो हम साथ-साथ सरोद सीखते हैं. इसके पहले वह 25 साल तक उस्ताद अल्लारक्खा से तबला सीख चुकी थीं. तो हम दोनों ने साथ-साथ सरोद की कक्षाओं में जाना शुरू कर दिया. वह तो कुछ खास नहीं कर पाईं लेकिन मैं सरोद में काफी आगे निकल गया.

आपके पिता उस्ताद अली अकबर खां का क्या रवैया था?

वह काफी खुश थे. कक्षा के अलावा मुझे घर पर अलग से भी सिखाते थे और मैं उनके कार्यक्रमों में तानपूरा बजाता था. बाद में मैंने उनके साथ भी बजाना शुरू किया. मुझे उनसे काफी सीखने का मौका मिला. जो कुछ भी आज मैं हूं, इसी की वजह से हूं.

आपका उनके साथ किस तरह का रिश्ता था? क्या उन्होंने भी आपके साथ वैसी ही मार-पीट की जैसी उनके पिता ने उन्हें सिखाते समय की थी?

नहीं, मेरे पिता बहुत ही दिलचस्प आदमी थे. वह मेरे साथ वैसा रिश्ता कायम नहीं करना चाहते थे जैसे उनका अपने पिता के साथ था. उन्होंने कभी भी मुझे कुछ भी करने के लिए मजबूर नहीं किया. जब मैं गिटार बजाता था, तो वह खुश होते थे और कभी-कभी खुद भी गिटार उठा कर बजाने लगते थे. यह अलग बात है कि वह गिटार की ऐसी-तैसी कर देते थे. लेकिन वह मुझसे कहते थे कि उन्हें मुझमें विश्वास है और उम्मीद है कि मैं मैहर घराने की परंपरा को आगे बढ़ाऊंगा. मुझे इस पर गर्व है, लेकिन साथ ही यह एहसास भी कि यह बहुत भारी वजन है जिसे मुझे ढोना है.

आप इस जिम्मेदारी को कैसे निभाना चाहते है?

इस समय न तो भारत में और न ही अमेरिका में शास्त्रीय संगीत में बहुत अधिक लोगों की रुचि है. मैं सरोद को लोकप्रिय बनाना चाहता हूं. इस समय मेरी प्राथमिकता महानतम संगीतकार बनने की नहीं बल्कि सरोद को अधिक से अधिक लोकप्रिय बनाने की है. जाहिर है कि इस प्रक्रिया में मेरा भी एक संगीतकार के रूप में विकास होगा.

अमेरिकी युवा क्या भारतीय शास्त्रीय संगीत में रुचि ले रहा है? 1960 के दशक में तो ले रहा था, पर आज क्या स्थिति है?

कुछ की रुचि सचमुच है, लेकिन अमेरिका में भी और भारत में भी मीडिया शास्त्रीय संगीत के प्रति गंभीर नहीं है और वह उसे कोई खास तवज्जो नहीं देता. देता भी है तो गेम शोज वगैरह के जरिये. यह सचमुच चिंता की बात है.

इंटरव्यू: कुलदीप कुमार

संपादन: महेश झा

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