सरकारों के रवैये पर निर्भर है आरोग्य सेतु जैसे कोरोना ऐप की सफलता | ब्लॉग | DW | 24.04.2020
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ब्लॉग

सरकारों के रवैये पर निर्भर है आरोग्य सेतु जैसे कोरोना ऐप की सफलता

दवा और टीके के अभाव में बहुत से देशों में स्मार्ट फोन ऐप को वायरस को रोकने का नुस्खा समझा जा रहा है. भारत ने इसके लिए आरोग्य सेतु की मदद ली है तो यूरोप में भी कोरोना ऐप पर बहस चल रही है.

लॉकडाउन का प्राथमिक मकसद वायरस के फैलाव के चक्र को तोड़ना था. दुनिया भर के उदाहरण यही दिखाते हैं कि इसमें कामयाबी भी मिली है. लोग अगर बाहर न निकलें तो वे दूसरों को संक्रमित भी नहीं कर सकते. और यदि पता चल जाए कि कौन संक्रमित है तो उसे अलग थलग कर दूसरों को संक्रमित होने से बचाया जा सकेगा. भारत में अब तक कोरोना बीमारी के 22,000 मामले हैं, लेकिन वायरस के फैलने के डर से 1.3 अरब लोगों को उनके घरों में बांध दिया गया है. जर्मनी में करीब 150,000 लोग संक्रमित हैं, लेकिन 8 करोड़ लोग लॉकडाउन में हैं. आर्थिक गतिविधियां रुकी हुई हैं. बहुत से लोगों को भविष्य की चिंता सता रही है.

ऐसे में अगर संक्रमित लोगों का पता चल जाए, तो राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की जरूरत ही खत्म हो जाएगी. स्वास्थ्य अधिकारी इस समय संक्रमित लोगों की शिनाख्त के लिए पारंपरिक साधनों का सहारा ले रहे हैं. संक्रमित लोगों से पूछा जाता है कि वे किस किस के संपर्क में आए. फिर उन लोगों को फोन किया जाता है, मेल भेजा जाता है या चिट्ठी लिखी जाती है. इसमें समय लगता है और जब तक संदिग्ध रूप से संक्रमित इंसान की पहचान हो, वह कुछ और लोगों को वायरस दे सकता है. ऐसे में संपर्क का पता लगाने वाला ऐप बहुत ही मददगार साबित हो सकता है. तेज और बेहतर.

एशियाई देशों में कामयाबी

एशियाई देशों में इसका इस्तेमाल किया भी गया है. खासकर सिंगापुर और दक्षिण कोरिया ने इसकी मदद से कोरोना को सीमित करने में सफलता पाई है. सबसे बढ़कर चीन ने, जहां के शहर वुहान से ये महामारी शुरू हुई, इसका इस्तेमाल किया है और अभी भी कर रहा है. भारत भी उन देशों में शामिल था जिसने बहुत ही जल्दी आरोग्य सेतु नाम का ऐप बाजार में उतारा और महामारी रोकने वाले अचूक नुस्खे के रूप में इसका प्रचार किया. बहुत से लोगों ने इस ऐप को अपने स्मार्टफोन पर डाउनलोड किया है ताकि उन्हें पता चल जाए कि वे किसी संक्रमित इंसान से तो नहीं मिले.

आरोग्य सेतु या इस तरह के संपर्क सूत्र पहचानने वाले ऐप के काम का तरीका बहुत ही आसान है. स्मार्टफोन की जगह के बारे में यूं भी रिले टॉवर के साथ जुड़ा होने के कारण पता होता है. इस ऐप की मदद से स्मार्टफोन यह भी रजिस्टर करता है कि कौन से दूसरे फोन उसके पास से गुजरे. संक्रमण का खतरा कम करने के लिए दो लोगों के बीच कम से कम डेढ़ मीटर की दूरी जरूरी है. अब किसे पता होता है कि वह बाजार में या बस में किस किस के संपर्क में आया. स्मार्टफोन सेंसर की मदद से यह काम नियमित रूप से कर सकता है. इतना ही नहीं यदि कोई एक यूजर कोरोना पॉजिटिव पाया जाता है तो स्मार्टफोन दूसरे स्मार्टफोन को चेतावनी भी देता है और साथ ही ये भी बताता है कि उसे क्या करना है. अब अगर किसी के संक्रमित होने की पुष्टि हो, तो अधिकारी फौरन पता कर सकते हैं कि उस फोन के धारक के आसपास कौन से लोग थे और उन्हें चेतावनी दी जा सकती है, उन्हें क्वारंटीन किया जा सकता है, या टेस्ट के लिए बुलाया जा सकता है.

Australien Sydney Coronavirus App (picture-alliance/NurPhoto/I. Khan)

ऑस्ट्रेलिया का ऐप

प्राइवेसी का सवाल

सिद्धांत में तो ये बात बहुत अच्छी लगती है लेकिन फोन रखने वाले की प्राइवेसी का क्या? यूरोप में भी इस तरह के ऐप के इस्तेमाल पर बहस चल रही है, लेकिन इसके काम करने का तरीका यूरोपीय प्राइवेसी नियमों के अनुकूल नहीं है. यूरोप के लोगों के लिए ये स्वीकार करना मुश्किल है कि सरकार को आपके बारे में सबकुछ पता हो, कि आप कहां गए थे, किस किस से मिले थे. सवाल ये था कि इसका सिर्फ चीनी तरीके से इस्तेमाल हो सकता है या निजता को बरकरार रखते हुए भी इसका फायदा संभव है.

जर्मन सरकार ने एक प्रोजेक्ट की मदद की है जिसका नतीजा अखिल यूरोपीय प्राइवेसी प्रोटेक्टिंग प्रोक्सिमिटी ट्रेसिंग के रूप में सामने आया. इससे जुड़े 130 विशेषज्ञों के सामने चुनौती थी कि ऐसा ऐप बने जो ब्लूटूथ की मदद से जगह और जगह को रिकॉर्ड किए बिना संक्रमण के चेन को दिखा सके. लेकिन वैज्ञानिकों के बीच इस ऐप पर विवाद छिड़ गया है और दुनिया भर के 280 रिसर्चरों ने एक खुले पत्र में चेतावनी दी है कि इसकी मदद से पूरे के पूरे इलाके की निगरानी की जा सकती है. उनका कहना है कि इसे रोकने के लिए डाटा को केंद्रीय रूप से सेव न कर अलग अलग जगहों पर सेव करना चाहिए.

भले ही इस खुले पत्र में खास ऐप का नाम नहीं लिया गया है, लेकिन ये झगड़ा सिर्फ रिसर्चरों का झगड़ा नहीं है, यह देशों का भी झगड़ा है. जर्मनी और फ्रांस इस ऐप से मिले डाटा को एक जगह पर जमा करना चाहते हैं, जबकि स्विट्जरलैंड इसे अलग अलग जगहों पर जमा करना चाहता है ताकि उसके दुरुपयोग संभव न हो. इस झगड़े का एक पहलू गूगल और एप्पल भी हैं. सारे स्मार्टफोन एंड्रॉयड और आईओएस ऑपरेटिंग सिस्टम इस्तेमाल करते हैं. दोनों कंपनियां जर्मनी में विकसित ऐप के साथ सहयोग करना चाहती हैं लेकिन वे भी डाटा को अलग अलग जगहों पर सेव करने की समर्थक हैं. वे चाहती हैं उनके स्मार्टफोनों पर डाटा जमा हो. इस झगड़े में संभव है कि लोगों का इस ऐप पर भरोसा न रहे.

तकनीकी मदद की जरूरत

जैसे जैसे लॉकडाउन में ढील दी जाएगी, इस तरह के ऐप का महत्व बढ़ता जाएगा. ढील के साथ लोग स्कूलों, कॉलेजों, दुकानों और रेस्तरां में, सिनेमा और थिएटर में, कॉफी हाउस में और काम पर जाना शुरू करेंगे. संक्रामक रोगों को रोकने के प्रयासों में संपर्क का पता लगाना हमेशा से प्रमुख कदम रहा है. लेकिन इसकी प्रक्रिया बहुत ही मुश्किल रही है. अब तकनीक की वजह से ये प्रक्रिया आसान हो सकती है. लेकिन चुनौतियां भी हैं. भारत में पहले दो हफ्तों में करीब 6 करोड़ लोगों ने ऐप को डाउनलोड किया है. भारत में करीब 30 प्रतिशत लोगों के पास ही स्मार्टफोन है.

एक और समस्या सरकारी तंत्र पर भरोसे की भी है. विभिन्न राज्यों की पुलिस ने जिस तरह से पिछले सालों में सोशल मीडिया पर अपनी स्वतंत्र राय रखने वालों के खिलाफ केस दर्ज किए हैं, या कोरना से संक्रमित होने की सूचनाएं खुलेआम इंटरनेट पर जारी किया है, इस ऐप के साथ अपनी पूरी जानकारी उपलब्ध कराने को लोग स्वीकार नहीं करेंगे.

इस हफ्ते भी कश्मीरी पत्रकारों के खिलाफ सोशल मीडिया पर उपलब्ध विचारों के आधार पर देशद्रोह जैसे मामले दर्ज किए गए हैं. भविष्य में राष्ट्रीय स्वास्थ्य के लिए जरूरी आरोग्य सेतु जैसे ऐप तभी कामयाब हो सकेंगे जब सरकारी अधिकारी लोगों की निजता का सम्मान करें और उपलब्ध सूचनाओं का इस्तेमाल लोगों को तंग करने के लिए न करें.

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