सम विषम ट्रायल से बहुत कुछ सीखा सबने | ब्लॉग | DW | 15.01.2016
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ब्लॉग

सम विषम ट्रायल से बहुत कुछ सीखा सबने

भारत की राजधानी दिल्ली में प्रदूषण की बिगड़ती समस्या पर काबू पाने के लिए प्राइवेट कारों पर लगाया गया सम विषम ट्रायल पूरा हो गया है. इसने रोड पर भीड़ तो कम की लेकिन यह साफ नहीं है किया इससे वायु प्रदूषण भी घटा.

बीते 15 दिन दिल्‍ली और देश के लिए यादगार बन गए. दिल्‍ली के दो करोड़ लोगों ने सम विषम नंबर नियम को जिस तरह से सेलीब्रेट किया उससे आदतन नियमों का पालन न करने की भारतीय लोगों की छवि को धक्‍का भी लगा है. सही मायने में लोगों ने इसे नियम का पालन करने के बजाय एक उत्‍सव की तरह आयोजित किया और यही स्‍वत:स्‍फूर्ति इसकी कामयाबी की मुख्‍य वजह बनी.

समस्‍या और सबक

बीते एक साल में दिल्‍ली दुनिया के सर्वाधिक दूषित शहरों में शुमार हो गई थी. हवा के दूषित होने का आलम यह हो गया है कि देश के मुख्‍य न्‍यायाधीश को भरी अदालत में बताना पड़ा कि दमे से पीडित उनके पोते को घर में भी मास्‍क लगाकर रहना पड़ता है. सांस संबंधी बीमारियों का घर बनती दिल्‍ली इस समस्‍या का एक पहलू मात्र है. समाधान के तौर पर अब तक महज कागजों पर ही सरकारें काम करती रहीं और नतीजतन समस्‍या विकराल होती गई. इसमें सबसे बड़ी भूमिका वाहन जनित प्रदूषण और विकास परियोजनाओं के बेतहाशा और बेतरतीब निर्माणकार्यों से उठने वाली धूल निभा रही है. वाहनों के धुंए से निकले खतरनाक कार्बन तत्‍व धूल में मिलकर शहर के वायुमंडल में धुंध की परत के रूप में जमा हो गए. इससे खतरनाक प्रदूषक कणों, पीएम 2.3 और पीएम 10 का स्‍तर खतरे के निशान से दस गुना तक आगे चला गया.

जब बात समाधान की आई तो केजरीवाल सरकार बड़ी ही सावधानी से कदम दर कदम आगे बढी. 22 अक्‍टूबर को पहले कार फ्री डे का आयोजन किया गया. सरकार ने सबसे भीड़ भाड़ वाले पुरानी दिल्‍ली इलाके में लाल किले से इंडिया गेट तक के मार्ग पर एक दिन के लिए कारों का प्रयोग बंद कर दिया. सरकार ने पहले दो कार फ्री डे में ही लोगों के मूड को भांप कर सम विषम नंबर नियम को एक पखवाड़े तक लागू करने का फैसला किया. हालांकि शुरु से ही इसकी कामयाबी पर संशय के सवाल उठने लगे लेकिन चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर ने इस पहल का स्‍वागत कर खुद कार पूल करने की बात कहकर सरकार की पहली और निर्णायक हौसला अफजाई की. इसके बाद शुरु हुई युद्धस्‍तर पर तैयारियां और फिर दिल्‍ली ने 15 दिन तक मुड़कर पीछे नहीं देखा.

कामयाबी की वजह

हर आम और खास वर्ग के लोगों ने खुशी खुशी कार पूलिंग, साइकिल और सार्वजनिक परिवहन का जमकर इस्‍तेमाल किया. इसमें जनता की स्‍वत:स्‍फूर्त भागीदारी के पीछे मूल कारण सरकार की जनता को साथ लेने की कोशिश रही. सीएम केजरीवाल ने मंत्रियों के साथ कार पूलिंग की, कोई मंत्री साइकिल से सचिवालय आया तो किसी ने बस पकड़ी और किसी ने बाइक तथा ई रिक्‍शा की सवारी की. समूची सरकार को अपने बीच पाकर जनता ने खुद को इस मुहिम से जोड़ने में पल भर की देर नहीं लगाई.

इससे एक बात और साफ हो गई कि अब तक सरकारी मुहिमों की अंतहीन नाकामियों के पीछे बड़ी वजह सरकार और जनता के बीच कभी न भरी जा सकने वाली खाई थी. स्‍पष्‍ट हो गया कि सरकार में बैठे लोग जनता को नियमों के पेंच में उलझा कर खुद को उन्‍हीं नियमों से मुक्‍त कर लेते हैं. इस मनोविज्ञान को समझना होगा कि बीते सात दशक से जनता नियमों का पालन न कर अपना मूक विरोध दर्ज कराकर नेताओं को ठेंगा क्‍यों दिखा रही है.

फैसला सोमवार को

पिछले 15 दिनों से बीजिंग और पेरिस सहित दुनिया के उन तमाम शहरों की नजर दिल्‍ली पर टिकी थी. इन शहरों के नगर प्रशासन नंबर नियम के असर को लेकर यह जानने के लिए इच्‍छुक हैं कि क्‍या वाकई में इससे प्रदूषण पर कुछ असर पड़ सकता है. इसकी कामयाबी से उत्‍साहित दिल्‍ली सरकार के लिए पहले हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट से राहत भरी खबर आई कि दोनों ही शीर्ष अदालतों ने नंबर नियम के खिलाफ दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया.

केंद्र और दिल्‍ली सरकार नंबर नियम के बहुआयामी असर को परख रही है. पिछले 15 दिनों में दिल्‍ली की आबोहवा पर पड़े असर और भविष्‍य में इस नियम की रूपरेखा पर केजरीवाल सरकार सोमवार को खुलासा करेगी. दरअसल सरकार पर जनता की ओर से नंबर नियम को स्‍थाई तौर पर लागू करने का दबाव तेजी से बढ़ा है. लेकिन इस व्‍यवस्‍था को कुछ समय के लिए लागू कर सकने की सम विषम की प्रक्रियागत बाध्‍यता को देखते हुए ऐसा नहीं हो सकता है. इसलिए अब सरकार हर महीने की 22 तारीख को आयोजित होने वाले कार फ्री डे की तर्ज पर नंबर नियम को भी निश्चित अंतराल पर लागू करने की योजना बना रही है.

राजनीति तो इस पर भी होगी

सियासत भारतीय जनमानस की रक्‍तशिराओं का अहम हिस्‍सा है इसलिए इस पर भी सियासत होना लाजिमी है, आम आदमी की शक्‍ल में नमूदार हुए केजरीवाल भी इसका सियासी लाभ उठाएंगे और विपक्ष्‍ा मातमी धुन बजाकर रुदाली करेगा. लेकिन इन सबके बीच जनता ने एक बार फिर चुनावी फैसलों की तरह अपनी मंशा का इजहार कर दिया है कि नेक नियती से किए गए हर फैसले का इस्‍तकबाल है बाकी सब बेकार है. कम से कम दिल्‍ली से चले इस संदेश को देश भर के सियासतदानों को राजनीति के बदलते मिजाज के रूप में समझना पड़ेगा. अन्‍यथा सम विषम की राजनीति तो महज एक छोटी सी बानगी है, दिल्‍ली के दिल से अभी बहुत कुछ नुमाया होना बाकी है.

ब्लॉग: निर्मल यादव

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