समाजवादी पार्टी का संकट संकीर्ण स्वार्थ का नतीजा | ब्लॉग | DW | 24.10.2016
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ब्लॉग

समाजवादी पार्टी का संकट संकीर्ण स्वार्थ का नतीजा

विधानसभा चुनाव से कुछ ही माह पहले उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी गहरे अंदरूनी संकट का शिकार हो गई है. कुलदीप कुमार के अनुसार जब तक राजनीतिक पार्टियां परिवारवाद की गिरफ्त में रहेंगी ऐसे संकट पैदा होते रहेंगे.

अभी यह कहना कठिन है कि उसमें औपचारिक रूप से विभाजन होगा या नहीं, और यदि होगा तो कब होगा, लेकिन फिलहाल यह कहा जा सकता है कि अनौपचारिक रूप से पार्टी दो खेमों में बंट चुकी है. एक खेमे का नेतृत्व पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई शिवपाल यादव कर रहे हैं और दूसरे का नेतृत्व मुलायम सिंह यादव के पुत्र और राज्य के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कर रहे हैं. पार्टी अध्यक्ष के रूप में मुलायम सिंह यादव की कोशिश दोनों खेमों के बीच सुलह-सफाई कराने की है और इसका एक संकेत उन्होंने आज यह कहकर दे दिया है कि अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री के पद से हटाया नहीं जाएगा.

लेकिन कमोबेश उन्हें भी शिवपाल यादव के साथ ही समझा जा रहा है. हमेशा विवादास्पद रहने वाले अमर सिंह भी झगड़े का एक प्रमुख कारण बताए जाते हैं क्योंकि अखिलेश यादव को वे फूटी आंखों नहीं सुहाते और मुलायम सिंह यादव ने आज ही घोषणा की है कि अमर सिंह के सभी गुनाह माफ किए जा चुके हैं और वे उनके नजदीकी सहयोगी हैं. इस बीच मुलायम सिंह के चचेरे भाई रामगोपाल यादव को अखिलेश के साथ होने के कारण पार्टी से निकाला जा चुका है और अखिलेश ने शिवपाल यादव और उनके तीन सहयोगियों को मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया है. यानी दोनों ओर से तलवारें खींच चुकी हैं. इस सार्वजनिक झगड़े का असर राज्य की राजनीतिक स्थिति और वोटरों की मानसिकता पर न पड़े, यह संभव नहीं है.

जानकारों का कहना है कि पिछले साढ़े चार साल में राज्य में कानून-व्यवस्था और सांप्रदायिक शांति तो गड़बड़ी का शिकार रही हैं लेकिन अन्य मोर्चों पर अखिलेश यादव सरकार का रिकॉर्ड अच्छा रहा है और विकास कार्यों का लाभ अल्पसंख्यकों और बुंदेलखंड जैसे पिछड़े इलाकों तक पहुंच सका है जिसके कारण जनता के बीच उनकी छवि काफी अच्छी है. समाजवादी पार्टी में टूट की स्थिति में अखिलेश यादव को इसी छवि का सहारा है. इसके अलावा अल्पसंख्यक समुदाय के एक हिस्से का वोट भी उनकी तरफ खिंच कर आने की संभावना है. ऐसी स्थिति में शेष अल्पसंख्यक वोट मुख्यतः बहुजन समाज पार्टी के खाते में जाएगा क्योंकि कांग्रेस अभी तक उसे अपनी ओर आकृष्ट करने में विशेष सफल नहीं हो पायी है और भारतीय जनता पार्टी उसे पाने की उम्मीद नहीं कर सकती क्योंकि मुजफ्फरनगर के दंगों, दादरी में गौहत्या के मुद्दे पर अखलाक की हत्या तथा इसी तरह की अन्य घटनाओं में उसके नेताओं की सक्रिय भूमिका के कारण अल्पसंख्यक समुदाय में उसके प्रति काफी रोष है.

अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव, दोनों ही राष्ट्रीय लोक दल, जनता दल (यूनाइटेड) तथा कुछ अन्य छोटी पार्टियों के साथ मिलकर गठबंधन तैयार करने की सोच रहे हैं. बिहार विधानसभा चुनाव के समय इस तरह का गठबंधन तैयार करने की कोशिश की गयी थी और मुलायम सिंह यादव को उसका नेता भी चुन लिया गया था, लेकिन ऐन मौके पर वे पलट गए. इसके लिए रामगोपाल यादव को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है जो अब समाजवादी पार्टी से निकाले जा चुके हैं. अखिलेश यादव और कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी के बीच गठजोड़ की संभावना भी व्यक्त की जा रही है ताकि युवा नेतृत्व पेश किया जा सके और युवा मतदाता, जिसकी तादाद काफी अधिक है, को आकृष्ट किया जा सके. संक्षेप में कहें तो समाजवादी पार्टी की अंदरूनी कलह के कारण उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति का मैदान अनेक प्रकार की संभावनाओं से भर गया है. इस कलह का चुनाव परिणामों पर निर्णायक असर पड़ेगा, इसमें कोई संदेह नहीं है. सब कुछ को देखते हुए अधिक संभावना इसी बात की लगती है कि अंततः इससे मायावती की बहुजन समाज पार्टी को ही सबसे अधिक लाभ होगा.

तमिलनाडु की डीएमके की तरह ही समाजवादी पार्टी भी एक परिवार के कब्जे में है. डीएमके में भी पार्टी प्रमुख करुणानिधि की संतानों के बीच भारी तनातनी रही है. उनकी तरह ही मुलायम सिंह यादव की भी दो पत्नियां थीं. अखिलेश खेमे का आरोप यह भी है कि पिता-पुत्र के बीच तनाव पैदा करने में दूसरी पत्नी की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है. हकीकत जो भी हो, यह तय है कि जब तक राजनीतिक पार्टियां परिवारवाद की गिरफ्त में रहेंगी और वैचारिक आधार को नजरअंदाज करेंगी तब तक उनमें इस प्रकार के संकट पैदा होते रहेंगे जिनके पीछे शुद्ध संकीर्ण स्वार्थ के अलावा और कुछ नहीं होगा.

 

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