सड़क के गड्ढों से परेशान भारत | दुनिया | DW | 27.07.2018
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दुनिया

सड़क के गड्ढों से परेशान भारत

भारत में सड़क पर बने गड्ढे हर साल सैकड़ों लोगों की मौत का कारण बनते हैं. लगातार हो रहे हादसों के बाद भी सबंधित विभाग कोई सबक लेने को तैयार नहीं है.

विकास के लिए सड़कों का होना और सही हालत में होना जरूरी है. भारत में केंद्र और राज्य सरकारें सड़कों को विकास का पर्याय मान, इसके निर्माण पर राजस्व का एक बड़ा हिस्सा खर्च करती हैं. फिर भी सड़कें ऐसी बनती हैं जिनमें कुछ समय बाद ही गड्ढों का बसेरा बन जाता है. सड़कों पर इन गड्ढों की वजह से हर साल हजारों हादसे होते हैं.

गड्ढों का आतंक

किसी देश में हुए विकास को उसकी सड़कों से समझा जा सकता है. अगर इस पैमाने पर भारत के विकास को परखें तो विकास में कई छेद नजर आयेंगे. सड़कों पर जगह जगह गड्ढे, विश्व स्तर की सड़कें बनाने के सरकारी दावे को मुंह चिढ़ाते हैं. एक अनुमान के मुताबिक अकेले मुंबई में सड़कों पर लगभग 4 हजार गड्ढे हैं. मानसून में ये गड्ढे रौद्र रूप धारण कर लोगों का जीवन लीलना शुरू कर देते हैं. देश भर में गड्ढों के चलते औसतन प्रतिदिन 10 जानें जा रही हैं. बीते साल इन गड्ढों ने 3597 जिंदगियां लील ली. साल 2016 से इसकी तुलना करें, तो एक साल में यह आंकड़ा लगभग 50 फीसदी तक बढ़ गया है.

साल 2017 में महाराष्ट्र में 726 लोगों को सड़क पर गड्ढे होने की वजह से अपनी जान गंवानी पड़ी. 2016 की तुलना में महाराष्ट्र में गड्ढों के चलते होने वाली मौतों का यह आंकड़ा दोगुना है. सड़क दुर्घटनाओं के चलते हुई मौतों के आंकड़ों से यह सामने आया कि गड्ढों के चलते सबसे ज्यादा मौतें उत्तर प्रदेश में हुईं. यहां 987 लोगों का जीवन गड्डों ने असमय समाप्त कर दिया. इस मामले में हरियाणा और गुजरात की स्थिति भी ठीक नहीं है.

बीते साल यानी 2017 में देश में नक्सलवादी और आतंकवादी घटनाओं में 803 जानें गई, इनमें आतंकवादी, सुरक्षाकर्मी और आम नागरिक तीनों शामिल हैं.जबकि इसी दौरान सड़कों के गड्ढों ने साढ़े तीन हज़ार से अधिक लोगों से जिंदगी छीन ली.

भ्रष्टाचार के गड्ढे 

सड़क पर गड्ढों के चलते बड़ी संख्या में होने वाली मौतों ने एक बार फिर इस बात पर बहस छेड़ दी है कि सड़क निर्माण से जुड़े विभाग अपना काम ठीक से नहीं कर रहे हैं. नगर निगमों,नगरपालिकाओं और लोक निर्माण विभाग में भ्रष्टाचार ने ऐसे गड्ढे कर दिए हैं कि इसका परिणाम सड़कों पर गड्ढे के रूप मे सामने आता है. ठेकेदारी के काम से जुड़े अनिल मोटवानी (बदला हुआ नाम) कहते हैं कि काम पाने के लिए बाबू से लेकर अधिकारियों तक की जेब गर्म करनी पड़ती है, जिसका असर निर्माण की गुणवत्ता पर पड़ता है. अनिल कहते हैं कि कोई भी ठेकेदार घटिया काम नहीं करना चाहता लेकिन कभी कभार समझौता करना पड़ता है.

महाराष्ट्र में सड़कों की खराब हालत के लिए राज्य के लोक निर्माण मंत्री चंद्रकांत पाटिल ठेकेदारों को जिम्मेदार मानते हैं. उनका मानना है कि राज्य और शहरों का विकास अच्छी सड़कों के माध्यम से ही हो सकता है, लेकिन इस समय राज्य की सड़कों की हालत विकास को गति देने लायक नहीं है. चंद्रकांत पाटिल गड्ढा मुक्त महाराष्ट्र का सपना पूरा पूरा करने के लिए काम कर रहे हैं.

2016 में  सड़क घोटाला सामने आया था जिसमे मुंबई के दो इंजीनियरों ने सुधर चुकी सड़कों की जांच किए बगैर ही ठेकेदारों के बिल मंजूर कर दिए थे. इस कथित घोटाले में 354 करोड़ रुपये की लागत से दक्षिण मुंबई, पश्चिमी और पूर्वी उपनगरों में 34 सड़कों की मरम्मत के कार्य में लगे ठेकेदारों ने घटिया काम किया था.

अर्थव्यवस्था को नुकसान

अर्थव्यवस्था की गाड़ी सीधी सपाट सड़क पर तेज भागती है. सड़कों पर गड्ढों की वजह से हर साल देश को हजारों करोड़ रूपये का नुकसान उठाना पड़ता है. सेवानिवृत्ति के बाद सामाजिक कार्यों से जुड़े पुरषोत्तम जाधव कहते हैं कि सड़कों पर गड्ढों ना हों तो  व्यापार-कारोबार तो बढ़ेगा ही साथ ही लोगों की जिंदगी बचेगी और करोड़ों रूपये की भी बचत होगी जो इलाज में खर्च होता है.

गड्ढा मुक्त सड़क होने पर केले और ऐसे ही अन्य उत्पाद को मंडी तक सही सलामत पहुंचाने से किसानों और अंततः देश का भला होगा. पका केला, पपीता, आम और इसी तरह के अन्य फलों को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने में खराब सड़कों की वजह से काफी नुकसान होता है. टमाटर की खेती बड़े पैमाने पर करने वाले हर्ष गोहिल कहते हैं कि पहले के मुकाबले अब सड़कें बेहतर हो चुकी हैं लेकिन और सुधार की जरूरत है. उनका कहना है कि सड़कों में गड्ढों की वजह से पैकिंग पर खर्चा अधिक करना पड़ता है, इसके बावजूद मंडी तक पहुँचते-पहुँचते 15-20 फीसदी का नुकसान हो जाता है.

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