सख्त कानूनों के बावजूद थम नहीं रहे बलात्कार | दुनिया | DW | 20.07.2018
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दुनिया

सख्त कानूनों के बावजूद थम नहीं रहे बलात्कार

भारत में पिछले सालों में बलात्कार कानूनों में लगातार सख्ती के बावजूद महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामलों में तेजी आई है. अभी भी अत्याचार के बहुत से मामले पुलिस तक नहीं पहुंचते.

भारत में वर्ष 2014 से 2014 के बीच रेप के 1.10 लाख मामले दर्ज किए गए. अकेले वर्ष 2016 में महिलाओं के खिलाफ अत्याचार के 3.39 लाख मामले दर्ज हुए हैं. यह सरकारी आंकड़ा है जो केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरेन रिजिजू ने इसी सप्ताह लोकसभा में पेश किया है. इस बीच केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को 12 साल से कम उम्र की लड़कियों के साथ बलात्कार के मामले में फांसी की सजा के प्रावधान वाले एक विधेयक को हरी झंडी दिखा दी है. इसे संसद को मानसून अधिवेशन के दौरान सदन में पेश किया जाएगा.

बढ़ते मामले

जम्मू-कश्मीर के कठुआ में आठ साल की बच्ची के साथ गैंगरेप के बाद उसकी हत्या, मध्यप्रदेश के मंदसौर में सात साल की बच्ची के साथ गैंगरेप, बिहार में एक स्कूल प्रिंसिपल समेत कई लोगों की ओर से एक छात्रा के साथ महीनों तक गैंगरेप, चेन्नई में 11 साल की एक किशोरी के साथ 17 लोगों ने सात महीने तक रेप किया और तमिलनाडु में एक रूसी महिला टूरिस्ट के साथ छह लोगों द्वारा गैंगरेप, यह कुछ चर्चित मामले हैं जिन्होंने हाल में सुर्खियां बटोरी हैं. लेकिन इनके अलावा भी देश के अलग-अलग शहरों में रेप के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2016 के दौरान रोजाना औसतन 106 ऐसे मामले दर्ज किए गए. अब यह तादाद बढ़ कर रोजाना 110 तक पहुंच गई है.

समाजविज्ञानियों के लिए चिंताजनक बात यह है कि हाल के महीनों में छोटी उम्र की बच्चियों के साथ रेप की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं. वर्ष 2012 में हुए निर्भया कांड के बाद तमाम कानूनों में संशोधन किया गया था और कुछ नए कानून बनाए गए थे. बावजूद इसके ऐसी घटनाएं थमने की बजाय लगातार बढ़ रही हैं. सरकारी आंकड़े भी इसकी पुष्टि करते हैं. नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक 2012 में जहां पूरे देश में बलात्कार के 24,923 मामले दर्ज हुए थे वहीं वर्ष 2016 में यह तादाद डेढ़ गुनी से भी ज्यादा बढ़ कर 38,947 तक पहुंच गई. बीच की अवधि में भी ऐसे मामले लगातार बढ़ते रहे. यह हालत तब है जब देश के कई राज्यों में 12 साल से कम उम्र की किशोरियों के साथ बलात्कार के अभियुक्तों को फांसी की सजा देने संबंधी नए कानून बनाए जा चुके हैं. मध्यप्रदेश में इसी कानून के तहत हाल में एक व्यक्ति को फांसी की सजा भी सुनाई जा चुकी है.

लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह आंकड़ा असलियत से बहुत कम है. रेप या महिलाओं के खिलाफ अत्याचार के ज्यादातर मामले पुलिस तक ही नहीं पहुंचते. देश के खास कर कई आदिवासी-बहुल राज्यों और ग्रामीण इलाकों में ऐसे मामले पंचायतों के स्तर पर ही निपटा लिए जाते हैं. इनकी सबसे बड़ी वजह ऐसे मामलों से बदनामी, कलंक और शर्म का जुड़ा होना है.

हालात जस के तस

दिसंबर, 2012 के निर्भया कांड के बाद आपराधिक कानूनों की समीक्षा औऱ उनमें संशोधन सुझाने के लिए गठित न्यायमूर्ति जेएस वर्मा समिति की ओर से पेश 644 पेज की रिपोर्ट के आधार पर आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013 तैयार किया गया था. इसके तहत कई मौजूदा कानूनों में बदलाव किए गए और बलात्कार की सजा और कड़ी की गई. लेकिन बावजूद इसके पांच साल बाद भी हालात सुधरने की बजाय बदतर ही हुए हैं. बीते महीने जब थॉमसन रायटर्स फाउंडेशन के एक सर्वेक्षण में भारत को महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देश करार दिया गया था. सरकार ने इसके खिलाफ कड़ी प्रतिक्रिया जताई थी. केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने इस रिपोर्ट को खारिज करते हुए फाउंडेशन से सफाई भी मांगी थी. सरकार का कहना था कि फाउंडेशन ने इस रिपोर्ट को जारी करने से पहले संबंधित मंत्रालय से संपर्क नहीं किया था और इसमें सकारात्मक पहलुओं की अनदेखी की गई है.

गैर-सरकारी संगठनों का दावा है कि देश में अब भी रेप के ज्यादातर मामले पुलिस तक नहीं पहुंचते. लेकिन आखिर ऐसा क्यों है? महिला कार्यकर्ता रश्मि गोगोई कहती हैं, "देश में रेप को महिलाओं के लिए शर्म का मुद्दा माना जाता है औऱ इसकी शिकार महिला के माथे पर स्थायी तौर पर कलंक का टीका लग जाता है. उनको यह सीख दी जाती है कि भावी जीवन की बेहतरी के लिए कभी किसी से रेप की बात मत कहना.” गोगोई कहती हैं कि बलात्कारी इसी मानसिक व सामाजिक सोच का फायदा उठाते हैं. कई मामलों में रेप का वीडियो वायरल करने की धमकी देकर भी पीड़िताओं का मुंह बंद रखा जाता है. एक अन्य महिला कार्यकर्ता देवारति गाएन कहती हैं, "रेप की शिकार महिलाओं के लिए डर, शर्म और कलंक अब भी प्रमुख मुद्दे हैं. इसी वजह से कई महिलाएं रेप होने के बावजूद मुंह बंद रखना ही बेहतर समझती हैं.” महिला संगठनों का कहना है कि जब तक बलात्कार की शिकार महिलाओं के प्रति समाज का नजरिया नहीं बदलेगा तब तक रेप की ज्यादातर घटनाएं पर्दे में ही रहेंगी. इससे बलात्कारियों का मनोबल बढ़ता है. देवारति कहती हैं, "अब पहले के मुकाबले ऐसी ज्यादा पीड़िताएं सामने आ रही हैं. लेकिन अब भी यह तादाद बहुत कम है. लोग क्या कहेंगे, जैसे सवाल उनके या उनके घरवालों के मुंह पर ताला लगा देते हैं.”

नया कानून

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इसी सप्ताह एक नए कानून को हरी झंडी दिखा दी है जिसके तहत 12 साल से कम उम्र की किशोरियों के साथ बलात्कार के अभियुक्तों को फांसी की सजा का प्रावधान है. संसद के मौजूदा मानसून सत्र में इस विधेयक को पेश किया जाएगा. पारित हो जाने के बाद यह बीते 21 अप्रैल को जारी अध्यादेश की जगह लेगा. इसमें 12 साल या उससे कम उम्र की किशोरियों के साथ बलात्कार करने वाले को न्यूनतम 20 साल और अधिकतम आजीवन कारावास या फांसी की सजा का प्रावधान है जबकि गैंगरेप के मामले में यह सजा आजीवन कारावास या फांसी तक की होगी. 12 से 16 साल की तक युवती के साथ बलात्कार के मामलों में न्यूनतम 10 साल और अधिकतम आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान है. ऐसे अभियुक्तों की अग्रिम जमानत का प्रावधान खत्म कर दिया जाएगा. रेप के दूसरे मामलों में न्यूनतम सजा सात साल के सश्रम कारावास से बढ़ा कर 10 साल कर दी जाएगी.

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