संसाधनों को बचाने की लड़ाई लड़ रहे ओडिशा के आदिवासी | दुनिया | DW | 18.06.2018
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दुनिया

संसाधनों को बचाने की लड़ाई लड़ रहे ओडिशा के आदिवासी

स्टरलाइट कॉपर के खिलाफ हुए हिंसक प्रदर्शन के बाद अब करीब एक हजार मील दूर स्थित एल्युमिनियम फैक्टरी को बंद कराने के लिए आदिवासी और पर्यावरणविद एक हो गए हैं. ओडिशा में एल्युमिनियम खनन का स्थानीय लोग विरोध कर रहे हैं

ओडिशा के नियमगिरि पहाड़ों में मौजूद एल्युमिनियम के अयस्क के खनन का स्थानीय लोग विरोध कर रहे हैं क्योंकि वे इसे पवित्र मानते हैं. वेदांता समूह की इस कंपनी का विरोध वर्षों से चला आ रहा है और तूतीकोरिन में 13 लोगों की मौत के बाद यहां का प्रदर्शन भी तेज हो गया है. पर्यावरणविद आदिवासियों की वेदांता समूह से लड़ाई की तुलना जेम्स कैमरून की फिल्म `अवतार` से करते हैं जिसमें एक काल्पनिक ग्रह के लोग प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार की लड़ाई लड़ते हैं.

नियमगिरि पहाड़ों की पूजा करते हैं आदिवासी

कंधे पर कुल्हाड़ी लिए डोंगरिया समुदाय के आदिवासी नेता लाडो सिकाका अपने समूह को कहते हैं, "हम नियमगिरि के पहाड़ों को बचाने के लिए अपना खून बहा देंगे. हम अपनी जान दे देंगे." सिकाका का प्रदर्शन रिफाइनरी के नजदीकी कस्बे लांझीगढ़ में चल रहा है. उनका मानना है कि वेदांता ने भले ही कुछ लोगों को रोजगार दिया हो, लेकिन नियम राजा (नियमगिरि के पहाड़) ने हमें सब कुछ दिया है. समुदाय का मानना है कि वे नियम राजा के वंशज है और उनका पहाड़ों पर एकाधिकार है.

16 हजार की आबादी वाले इस इलाके में पोस्टर देखे जा सकते हैं जिनमें लिखा हुआ है, प्रदूषण और लोगों को मारने वाली कंपनी वेदांता, देश छोड़े. तूतीकोरिन के शहीदों को श्रद्धांजलि. सिकाका के प्रदर्शन में स्थानीय आदिवासी महिलाएं भी हिस्सा ले रही हैं. सिकाका और डोंगरिया समुदाय के लोगों को डर है कि कंपनी पहाड़ों के अंदर से बॉक्साइट निकालना चाहती हैं.

पहाड़ों पर नहीं हो सकता खननः पर्यावरणविद

तूतीकोरिन में वेदांता समूह की कंपनी स्टरलाइट कॉपर के खिलाफ स्थानीय लोग महीनों से प्रदर्शन कर रहे थे. प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि फैक्टरी से इलाके में प्रदूषण फैल रहा था. पर्यावरणविदों का कहना है कि प्लांट की वजह से भूजल गंदा हो रहा था और इलाके में कैंसर समेत दूसरी बीमारियों का ख़तरा बढ़ गया था.अभी पूरा नहीं हो सकेगा वेदांता का सपना

अंतरराष्ट्रीय गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार से सम्मानित प्रफुल्ल समानत्रे का कहना है कि उन्होंने पहले ही नियमगिरि के पहाड़ों में खनन को रोकने के लिए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में याचिका डाली हुई है. समानत्रे के मुताबिक, "नियमगिरि में न तो खनन हो सकता है और न ही प्रदूषण फैलाने वाली फैक्टरी लग सकती है." इसके विपरीत वेदांता समूह का कहना है कि एल्युमिनियम रिफाइनरी ने क्षेत्र को प्रदूषित नहीं किया है और उनके पास पर्यावरण विभाग की क्लीरेंस है. समूह के आधिकारिक बयान में कहा गया है, "हमारे मानक अंतरराष्ट्रीय स्तर के है और हम लांझीगढ़ में व्यापार शुरू करने के लिए प्रतिबद्ध है."

ओडिशा में प्लांट लगाना चाहती है कंपनी

भारत में धातु का कारोबार कर अरबपति हो चुकी कंपनी के कर्ताधर्ता अनिल अग्रवाल तूतीकोरिन हिंसा को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हैं. वह कहते हैं कि कंपनी ने पर्यावरण से जुड़े किसी भी कानून को नहीं तोड़ा गया. मौजूदा हालात को देखते हुए तमिलनाडु सरकार ने फैक्टरी को बंद कर दिया है. कंपनी को लाखों का नुकसान हो चुका है और सूत्र बता रहे हैं कि कंपनी इसके खिलाफ अपील कर सकती है.

अग्रवाल का कहना है कि बिजनेस में हमेशा जोखिम उठाना पड़ता है और नियमगिरी में प्लांट लगाना कंपनी का लक्ष्य है. इसका मकसद लागत को कम करना है. पहले बॉक्साइट ब्राजील या गिनी से आयात होकर आता रहा है जो आंध्र प्रदेश के तटवर्ती इलाके से होकर पहुंचता है. नियमगिरि के जंगलों में प्लांट खुलने से कंपनी को फायदा होगा और स्थानीय डोंगरिया समुदाय के लोगों को रोजगार मिलेगा. यहां के युवा मुख्यधारा में आना चाहते हैं. वेदांता समूह के मुताबिक, वह बॉक्साइट की नीलामी के लिए तैयार है. अकेले ओडिशा में भारत के बॉक्साइट का 70 फीसदी भंडार है.

लांझीगढ़ के सीनियर पुलिस अफसर गोपीनाथ मोनिपात्रा की मानें तो वेदांता समूह ने स्थानीय लोगों को रिफाइनरी के फायदों के बारे में बताना शुरू कर दिया है. कई युवा मुख्यधारा में आना चाहते हैं, लेकिन आदिवासी और वाम नेताओं के आंदोलन ने उन्हें रोका है. पुलिस अफसर गुप्तेश्वर भोई मानते हैं कि रिफाइनरी की वजह से ही इलाके में सड़कें और मोटरसाइकिलें दिखनी शुरू हो गई है, वरना यहां तो सिर्फ जंगल था. प्लांट ने करीब 5300 लोगों को सीधे या परोक्ष रूप से रोजगार दिया है.  

वीसी/एमजे (रॉयटर्स)

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