संगीत में संतुलन जरूरी: अमजद | मनोरंजन | DW | 25.01.2014
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मनोरंजन

संगीत में संतुलन जरूरी: अमजद

भारत के मशहूर सरोद वादक उस्ताद अमजद अली खान को इस बात का अफसोस है कि सरकार की ओर से देश में शास्त्रीय संगीत को कोई प्रोत्साहन नहीं दिया जाता.

पद्म पुरस्कारों समेत देश-विदेश में बहुत सारे अवार्ड्स से सम्मानित अमजद अली खान का कहना है कि संगीत के दो समानांतर स्वरूप हैं. पहला ध्वनि-आधारित विशुद्ध संगीत और दूसरा भाषा पर आधारित. पिछले दिनों उन्होंने कोलकाता में अपने पिता हाफिज अली खान पर लिखी एक पुस्तक का भी लोकार्पण किया. इस मौके पर उन्होंने अपने अब तक के करियर और संगीत की दशा-दिशा पर डॉयचे वेले के कुछ सवालों के जवाब दिए. पेश है उस बातचीत के खास अंश:

अपने पिता पर किताब लिखने का ख्याल कैसे आया?

दरअसल, अस्सी के दशक में मैं विभिन्न मुद्दों पर डायरी लिखता था. बाद में मैंने उस डायरी को फाड़ कर कूड़ेदान में फेंक दिया. लेकिन घरवालों ने मेरी जानकारी के बिना उसे निकाल कर एक किताब के तौर पर प्रकाशित कराया और मुझे भेंट कर दिया. उससे मुझे काफी प्रेरणा मिली और मैंने गंभीरता से लेखन शुरू किया. मुझे महसूस हुआ कि मेरे पिता के बारे में बहुत कम लिखा गया है और संगीतकारों की मौजूदा पीढ़ी उनके व्यक्तित्व से परिचित नहीं है. इसलिए मैंने किताब लिखने का फैसला किया.

साठ के दशक में आपके शुरूआती दौर के मुकाबले क्या अब शास्त्रीय संगीत के प्रति लोगों का रुझान बदला है?

शास्त्रीय संगीत के कद्रदान तो अब भी हैं. लेकिन पश्चिमी देशों की तरह हम विभिन्न तरह के संगीत के बीच संतुलन नहीं बना सके हैं. वहां लोग हर तरह का संगीत सुनते हैं. लेकिन भारत में बॉलीवुड का भारी क्रेज है. इससे शास्त्रीय कलाओं को नुकासन होता है. शास्त्रीय संगीत की राह हाथी के चलने की तरह गरिमामय है. यह मनोरंजन नहीं, बल्कि एक समृद्ध परंपरा है.

क्या भारत में लोकप्रिय मनोरंजन ने शास्त्रीय संगीत को पीछे छोड़ दिया है?

पश्चिम ने अपनी कला व संस्कृति को फिल्म जैसे लोकप्रिय साधन के साथ संतुलित कर लिया है. उसके मुकाबले हम असंतुलित हैं. यहां बॉलीवुड की पूजा की जाती है. कहा जाता है कि जो दिखता है वो बिकता है. लेकिन मैं कुर्ता उतार कर सरोद नहीं बजा सकता. दुर्भाग्य की बात यह है कि सरकार, नौकरशाही या आम लोगों को राष्ट्रीय विरासत की खास चिंता नहीं है. अब व्यवसायीकरण ही सबसे अहम मानक बन गया है. कला से लोकप्रियता या पैसा हासिल करना कभी मेरा मकसद नहीं रहा.

क्या देश में शास्त्रीय संगीत का भविष्य खतरे में है?

चालीस साल पहले अपनी शुद्धता और गुणवत्ता के लिए शास्त्रीय संगीत ज्यादा लोकप्रिय था. लेकिन उन गुणों में गिरावट की वजह से अब यह अपनी चमक खो रहा है. लेकिन यह संगीत हमेशा कायम रहेगा.

इस विरासत को मजबूत बनाने के लिए क्या किया जाना चाहिए?

दुर्भाग्य की बात यह है कि हमारे देश में सरकार इसको बढ़ावा देने के लिए कुछ नहीं करती. देश में प्रतिभावान संगीतकारों की कोई कमी नहीं है. लेकिन उनको खासकर सरकार की ओर से कोई सहायता नहीं मिलती. सरकार किसी शास्त्रीय संगीतकार को 80 या 90 साल की उम्र में सम्मानित करती है. तब उसके लिए इन सम्मानों का कोई मतलब नहीं होता. आखिर यह काम पहले क्यों नहीं हो सकता.

संगीत में भाषा की क्या भूमिका है?

देखिए, संगीत के दो समानांतर स्वरूप हैं. एक ध्वनि पर आधारित विशुद्ध संगीत और दूसरा भाषा पर आधारित. लेकिन भाषा कई तरह की रुकावटें पैदा करती है. मेरा संगीत ध्वनि पर आधारित है.

आपने कभी फिल्मों में संगीत नहीं दिया. कोई खास वजह?

कोई खास वजह नहीं है. वैसी कोई पटकथा ही नहीं मिली. अगर ऐसी कोई कहानी मिले जिसमें मेरी तरह के संगीत की जरूरत हो तो मैं बॉलीवुड या हॉलीवुड की फिल्मों में गीत देने के लिए तैयार हूं.

इंटरव्यू: प्रभाकर, कोलकाता

संपादन: महेश झा

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